विश्वनाथ तिवारी : सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख

तिवारीजी का लेखकीय आचरण लेखकों की हत्या के प्रसंग में शून्य है। सवाल यह है विश्वनाथ तिवारी नामक लेखक इस विरोध में सबसे पहले शामिल क्यों नहीं हुआ ॽ...

विश्वनाथ तिवारी : सत्ता की पीड़ा बनाम लेखक का सुख

जगदीश्वर चतुर्वेदी

कल नेशनलिस्ट ऑनलाइन नामक वेबसाइट पर साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी का लिखा विस्तृत लेख छपा है, इस लेख का शीर्षक है असहिष्णुता की आंधी और पुरस्कार वापसी की अंतर्कथा

इस लेख में ऐसा कुछ भी नहीं है जो नया हो। सवाल यह है इस समय यह लेख क्यों लिखा ॽ पहले पद पर रहते हुए क्यों नहीं लिखा ॽ

मैं निजी तौर पर तिवारी जी से एक बार मिला हूँ, वह भी दैनिक जागरण के लखनऊ आयोजन के मौके पर वह भी होटल के रेस्तरां में। मैं निजी तौर पर उनको नहीं जानता। हमारे लिए उन्होंने पहले क्या लिखा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस लेख में क्या लिखा और, क्यों लिखा, किस मंशा से लिखा, वह सबसे महत्वपूर्ण है।

सबसे पहली बात यह कि इस लेख के प्रकाशन के लिए उन्होंने जो वेबसाइट चुनी वह माने रखती है,यह वह वेबसाइट है जिसमें आरएसएस-मोदी की प्रचार सामग्री ठूंस-ठूंसकर भरी है, इसमें भहुत सारे लेख शुद्ध झूठ को आधार बनाकर लिखे गए हैं। इस वेबसाइट के सामान्य फ्लो का आधार है संघी प्रौपेगैण्डा, इसी के फ्रेम में उनका यह लेख लिखा गया है।

एक लेखक के नाते आप कहां लिखते हैं, क्या लिखते हैं, किस विचारधारा के फ्लो में लिखते, किस मंशा के तहत लिखते हैं और किनकी सेवा के लिए लिखते हैं आदि सवाल महत्वपूर्ण हैं।

   तिवारीजी आरएसएस के नहीं हैं लेकिन उनके चिन्तन और तर्क का आरएसएस से गहरा संबंध है। वे एक लेखक की तरह स्वतंत्रचेता की तरह लेखकों के उठाए सवालों और समस्याओं को नहीं देख रहे। पुरस्कार वापसी से जुड़े सवालों को जब आप पक्ष-विपक्ष में बांटकर देखेंगे तो यह मुश्किल रहेगी। लेखक दलीय विचारधारा में बंध जाएगा या फिर बांध दिया जाएगा।

तिवारीजी ने समूचे प्रसंग को पक्ष-विपक्ष में वर्गीकृत करके लेखकों की समस्या को मोदी बनाम विपक्ष के फ्रेमवर्क में पेश किया है। जबकि लेखकों की चिंता यह नहीं है। लेखकों को गुस्सा इसलिए नहीं आया था वे मोदी से लड़ रहे थे। या फिर बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए पुरस्कार वापसी कर रहे थे। ये सारी बातें तिवारीजी के लेख में हैं।

राजनीतिक दलों के परिप्रेक्ष्य में लेखकों के सवालों को नहीं देखना चाहिए। लेखकों ने संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अपहरण और हिंसा –असहिष्णुता से जुड़े सवालों को संविधान के परिप्रेक्ष्य में उठाया है, तिवारीजी ने संविधान के नजरिए से देखने की बजाय आरएसएस के प्रौपेगैंडा के नजरिए से पुरस्कार वापसी पर अपनी राय व्यक्त की है, इससे एक बात साफ है कि तिवारीजी लेखक के नाते नहीं देख रहे बल्कि संघी के नजरिए से देख रहे हैं। यह लेखक विश्वनाथ तिवारी के लोप की सूचना भी है!

सवाल यह है कि विगत 4 चार वर्षों में देश में असहिष्णुता बढ़ी है या घटी है ॽ हिंदुत्व के पक्षधर हत्यारों ने लेखकों-बुद्धिजीवियों पर हमले किए हैं या नहीं ॽ क्या संविधान उनको यह सब करने की इजाजत देता है ॽ लगता है तिवारीजी को ये सब सवाल परेशान ही नहीं करते, वरना उनके जैसा प्रबुद्ध लेखक स्वतंत्र रूप से साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के नाते खुलकर हत्यारे और असहिष्णु गिरोहों के खिलाफ लिखता,उनको किसने रोका था ! वे चुप क्यों रहे !

अकादमी यदि स्वायत्त है, और उसका अध्यक्ष किसी दल का गुलाम नहीं है तो वे लेखकों की हत्याओं और उन पर हो रहे हमलों पर स्वतंत्र रूप से लिखने से कन्नी क्यों काटते रहे ॽ जाहिर है तिवारीजी के पास इसका कोई उत्तर नहीं है, वे अपने लेखन के पुराने हवाले दे रहे हैं, सवाल वर्तमान का है, लेखक अतीत में नहीं वर्तमान में जीता है, अतीत में लेखक ने क्या किया यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है वह वर्तमान में क्या करता है। तिवारी का निजी तौर पर इस मामले में लेखकीय रिकॉर्ड बेहद खराब है वरना अपने लेख में वे अपने लिखे किसी संपादकीय या लेख का जिक्र कर सकते थे कि उन्होंने हिंदुत्ववादी गुंडों द्वारा लेखकों पर किए हमलों का किस रूप में प्रतिवाद किया, दूसरी बात यह कि लेखक का प्रतिवाद लिखकर होता है, वाचिक नहीं।

तिवारीजी के नजरिए की बानगी देखें,लिखा ,

‘‘ सत्य की यही विशेषता होती है कि आरंभ में असत्य द्वारा चाहे जितना आच्छादित होता रहे, अंत में वह प्रकट हो जाता है। तो इस समूचे प्रकरण में शिक्षित समुदाय जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वह यह था कि पुरस्कार लौटाने वालों का मुख्य प्रयोजन राजनीतिक था। असहिष्णुता का मुद्दा मात्र एक पैसे और 99 पैसे राजनीति। बल्कि कहें उनके मन में छिपी राजनीतिक गांठ को दो-तीन असहिष्णु घटनाओं ने खोल कर फैला दिया। यदि ये घटनाएं न भी घटतीं तो कोई अन्य घटना इनकी अभिव्यक्ति के लिए मिल ही जाती। या यों भी कह सकते हैं कि यदि ये घटनाएं दूसरी शासन सत्ता में हुई होती तो कुछ लेखक इतने उत्तेजित न होते। इस निष्कर्ष पर पहुंचने वाले शिक्षित समुदाय के पास कुछ अकाट्य प्रमाण हैं। एक पुष्ट प्रमाण यह कि आम चुनाव (2014) के आखिरी दिनों में मीडिया के शोर से जब यह स्पष्ट होने लगा कि मोदी के नाम पर भाजपा सत्ता में आ रही है तो कन्नड़ लेखक यू.आर. अनंतमूर्ति ने यह बयान दिया था –‘‘यदि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्राी होंगे तो मैं देश छोड़ कर चला जाऊंगा।’’

सवाल यह है सत्य क्या है ॽ लेखकों की हत्या सत्य है या नहीं ॽ

लेखकों को गुस्सा इसलिए आया क्योंकि हिंदुत्ववादी गुंडे लेखकों की हत्या कर रहे हैं, उन पर शारीरिक हमले कर रहे हैं, इस तरह के हमले पहले किसी भी शासन में नहीं हुए, यहां तक कि आपातकाल में भी किसी लेखक की हत्या नहीं हुई,1984 के दंगों में भी किसी लेखक की हत्या नहीं हुई, लेखक-बुद्धिजीवियों की हत्या एकदम नया फिनोमिना है और सत्य और तथ्य यह है कि इन हमलों को संगठित किया हिंदुत्ववादियों ने और पीएम मोदी एंड कंपनी ने इन हमलों की निंदा करना तक जरूरी नहीं समझा, उलटे उनके दल के लोग इन हमलावरों के मददगार की भूमिका निभाते रहे हैं।

एक अन्य चीज वह है कानून और लोकतंत्र का शासन, वही लेखक के सर्जनात्मक माहौल की रक्षा करता है, इससे शांति बनाए रखने में मदद मिलती है, भय का वातावरण नष्ट होता है, लेकिन हिंदुत्ववादी गुंडे तो सीधे इस शांत माहौल को ही नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। लेखकों को तरह-तरह की धमकियां दी जा रही हैं, तीन बड़े लेखकों की वे हत्या तक कर चुके हैं लेकिन तिवारीजी को यह सामान्य ठोस सत्य नजर ही नहीं आया, इसे क्या कहें ॽ क्या यह लेखक के लिए शोभनीय है कि वो गुंडों के खिलाफ उनकी विचारधारा के खिलाफ न बोले !

एक अन्य चीज जिसका जिक्र तिवारीजी ने किया है, लिखा,

‘‘अनंतमूर्ति ने यह बयान दिया था –‘‘यदि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होंगे तो मैं देश छोड़ कर चला जाऊंगा।’’

यह बयान जो भारत के किसी विपक्षी नेता, यहां तक कि लालू प्रसाद यादव ने भी नहीं दिया, एक लेखक द्वारा दिया गया। क्रोध और घृणा युक्त यह बयान कोई तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्तिवादी और अलोकतांत्रिक व्यक्ति ही दे सकता है, स्वस्थ चित्त लेखक नहीं। अनंतमूर्ति के मित्र श्री अशोक वाजपेयी जिन्हें अकादेमी पुरस्कार अनंतमूर्ति के साहित्य अकादेमी अध्यक्ष काल में मिला था, मोदी विरोधी अभियान के एक स्तंभ थे जो आम चुनाव के ठीक पहले कुछ लेखकों द्वारा चलाया जा रहा था। 9 अप्रैल, 2014 के दैनिक ‘जनसत्ता’ (दिल्ली) के माध्यम से इन लेखकों (लगभग 40) ने वोटरों से भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। इनमें अशोक वाजपेयी के साथ राजेश जोशी और मंगलेश डबराल के नाम शामिल हैं जिन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाए।’’

पहली बात यह कि अनंतमूर्ति को ’तानाशाही प्रवृत्ति’ का लेखक कहना बुनियादी तौर पर गलत है, यह बात उनके लेखन से पुष्ट नहीं होती। एक लेखक या अनेक लेखक यह तय कर ही सकते हैं कि वे पीएम का विरोध करें या मोदी का विरोध करें, विरोध करना, अपील जारी करना उनका लोकतांत्रिक हक है, वे लेखक और नागरिक दोनों हैं। लोकतंत्र के दर्शक या सत्ता के गुलाम नहीं हैं। सत्ता के गुलाम बोलते नहीं हैं वे चुपचाप रहते हैं, जैसे तिवारीजी चुपचाप रहे, वे चुनाव के समय चुप रहे, उसके बाद भी चुप रहे, जिस तरह बोलना लोकतांत्रिक हक है,चुप रहना भी लोकतांत्रिक हक है, सवाल यह है लेखक चुप क्यों है या बोल क्यों रहा है और किस जमीन पर खड़ा होकर बोल रहा है, कहां से चीजों को देख रहा है ॽ

अनंतमूर्ति और अन्य पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों का अनुमान विगत चार सालों के शासन ने सही साबित किया है, लेखक सच बोलकर अपनी मुक्ति करता है, वह यह नहीं सोचता कि नेता का क्या होगा,जनता का क्या होगा, उसकी चिन्ताएं अपने मन के भावों की निच्छल अभिव्यक्ति से जुड़ी हैं। पीएम मोदी ने अपने आचरण से सिद्ध किया है कि वे अधिनायक की तरह कामकरते हैं, जनविरोधी नीतियां लागू कर रहे हैं, उन्होंने देश की जनता को आर्थिक तौर पर पामाली के गर्त में धकेला है, संविधान को उपहास की चीज बना दिया है,अपने को संविधान से ऊपर स्थापित करके लोकतंत्र के स्वतंत्र विकास के मार्ग में तरह-तरह की बाधाएं खड़ी की हैं।

दूसरी बात यह कि लेखकों की अपील का वोट पर कम लेकिन सांस्कृतिक माहौल पर असर जरूर होता है। सवाल यह है मोदी या भाजपा के खिलाफ वोट मांगने में गलत क्या है ॽ लेखक तो पहले कांग्रेस के खिलाफ भी बयान देते रहे हैं, उनके बयानों से चुनाव प्रभावित नहीं होते।

विश्वनाथ तिवारी ने लिखा

‘‘वास्तव में विरोध करने वालों में वह अपनत्व भाव था ही नहीं। उनका प्रच्छन्न एजेंडा सरकार और साहित्य अकादेमी पर प्रहार करना था। उन्हें सुधारना नहीं, उनसे बदला लेना था। यह लेखकों का लेखकीय नहीं, उनका राजनीतिक आचरण था। इसीलिए उन्होंने इसे प्रायोजित ढंग से एक आंदोलन का रूप दिया और इसे देशव्यापी तथा विश्वव्यापी बनाने की कोशिश की। यह भीतर से सद्भाव प्रेरित नहीं, दुर्भाव प्रेरित था।’’

यह सच है पुरस्कार वापसी का फैसला, लेखकों का राजनीतिक फैसला था, लेकिन उसके पीछे वोटबैंक की राजनीति नहीं थी, कहीं पर भी कोई लेखक चुनाव नहीं लड़ रहा था, बल्कि वे तो हिंदुत्व की गुंडई, हिंसाचार और असहिष्णुता का विरोध कर रहे थे। सवाल यह है विश्वनाथ तिवारी नामक लेखक इस विरोध में सबसे पहले शामिल क्यों नहीं हुआ ॽ तिवारीजी को जब लेखकों का प्रतिवाद प्रभावित नहीं कर पाया तो क्या वह बिहार की जनता को प्रभावित कर पाया होगा !

तिवारी जैसे लेखकों की मुश्किल यह है कि वे लिखने के बाद अपने लिखे को भी नहीं पढ़ते, उन्होंने कहीं पर भी विगत चार सालों में लोकतंत्र पर हुए हमलों का कोई जिक्र तक नहीं किया, उन्होंने अपने लेख में साहित्य अकादमी अध्यक्ष के नाते अपनी भूमिका को वैध ठहराने की कोशिश की है। जबकि लेखक को अपने लिखे के आधार अपने को वैध बनाना चाहिए।

तिवारीजी का लेखकीय आचरण लेखकों की हत्या के प्रसंग में शून्य है।

अकादमी के अध्यक्ष के नाते क्या उन्होंने कभी हिंसक गिरोहों के खिलाफ अकादमी की पत्रिका या अपनी पत्रिका में कोई संपादकीय या लेख लिखा, किसने रोका था,वे मोदी के पक्ष में खड़े होकर हिंसा का विरोध कर ही सकते थे,क्यों नहीं किया। अकादमी के प्रस्ताव को अध्यक्ष के बयान के रूप में देखा जाएगा,लेकिन लेखक के नाते विश्वनाथ तिवारी ने क्या कोई लेख है ॽ क्या नामवर सिंह ने आलोचना पत्रिका में कोई संपादकीय या लेख विगत चार सालों में हुई हिंसा के खिलाफ लिखा ॽ किसने रोका था !

सच यह है सत्ता की गुलामी लिखने नहीं देती, मन मसोसकर रह जाना पड़ता है, दाएं-बाएं झांकने लगते हैं, लेखक का दाएं-बाएं झांकना,यथार्थ के बरक्स खड़े होकर न बोलना,स्वयं में बड़ी चुनौती है, उसके लिए जिस साहस की जरूरत है वह न तो नामवर सिंह में है और न तिवारी जी में है !

तिवारी जी ने जिस अंतर्कथा की बात कही है उसे लेखक समाज जानता है। लेखक यह भी जानते हैं कि वे राजनीति कर रहे हैं,लेखन तो राजनीति है। लेखन रामनाम संकीर्तन नहीं है।

तिवारीजी आपने इस लेख में जो लिखा है वह शुद्ध साहित्य नहीं है वह भी राजनीति ही है। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है आपने अपने लेख में हिंदुत्ववादी गुंडई और गुंडों पर एक शब्द भी नहीं लिखा, यह इस बात का प्रमाण है कि आप उनके साथ खड़े हैं। आप इतने भोले नहीं हैं कि विगत चार सालों में हिंदुत्ववादी गुंडों की गुंडई के कारनामों से वाकिफ न हों,सवाल यह फिर आपने उनके बारे में क्यों नहीं लिखा, क्यों उनके खिलाफ आपकी आवाज बंद हो जाती है, के. शिवकुमार, नामवर सिंह आदि की आवाज बंद हो जाती है !

हिंदुत्ववादी गुंडई आज देश, लोकतंत्र, लेखक और साहित्य -कला -संस्कृति के साथ-साथ अल्संख्यकों और दलितों के लिए सबसे बड़ा खतरा है, वे सरेआम हमले कर रहे हैं और आपके और नामवर सिंह के पास उनके खिलाफ बोलने के लिए शब्द नहीं होते, हमें बेहद तकलीफ होती है जब आपको और नामवर सिंह जैसे लेखकों को हिंदुत्ववादी गुंडई के खिलाफ गूंगा-बहरा देखते हैं। सच में हिंदी के लिए यह सबसे गहरे दुख का समय है।

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