पता नहीं हुक्मरानों को कब अक्ल आएगी, कश्मीर कोई प्रयोगशाला नहीं है

जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक प्रयोग का मैदान या ताकत प्रदर्शन का अखाड़ा न समझा जाए, बल्कि वहां के लोगों को, खासकर युवाओं को भरोसे में लेकर, धैर्य के साथ उनका पक्ष समझकर समस्या को सुलझाया जाए। ...

देशबन्धु

सीजफायर नहीं सस्पेंशन ऑफ ऑॅपरेशन है

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने घाटी में रमजान के दौरान एकतरफा सीजफायर की मांग की थी। जिसके बाद केंद्र सरकार ने फैसला लिया था कि रमजान महीने के दौरान सेना जम्मू-कश्मीर में अपना ऑपरेशन स्थगित रखेगी। सेना इस दौरान किसी तरह का ऑपरेशन नहीं चलाएगी लेकिन उस पर इस दौरान हमला होता तो वह जवाबी करने के लिए आजाद होगी। कुछ लोगों ने इसे सीजफायर मानकर इसकी आलोचना भी की थी, लेकिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में फिर स्पष्ट किया कि यह सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन है, न कि सीजफायर।

बहरहाल, नाम जो भी हो, कुछ दिनों तक गोलीबारी रूकने से घाटी के लोगों को राहत महसूस हुई और यह कहा जाने लगा कि रमजान के बाद भी इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

दरअसल कश्मीर एक युद्ध क्षेत्र में बदल चुका है और इसकी पीड़ा केवल वहां की आम जनता ही समझ सकती है।

पिसना तो आम जनता को ही पड़ता है

दिल्ली में बैठी सरकार नीतियां बनाती है, जम्मू-कश्मीर की सरकार अपने नफे-नुकसान के आधार पर उसे लागू करती है, विपक्ष आलोचना करता है और सुरक्षा बल अपना कर्तव्य निभाते हैं। इन सबके बीच सबसे ज्यादा आम जनता को पिसना पड़ता है। जो कश्मीर प्रकृति और पर्यटन के लिए जाना जाता था, वह अब आतंकवाद और पत्थरबाजी के लिए कुख्यात हो गया है। देश और लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात जवानों को वहां के लोग संदेह की नजर से देखने लगे हैं, क्योंकि उनके बच्चों के माथे पर भी पत्थरबाज का विशेषण चस्पा कर दिया गया है। न नरेन्द्र मोदी तय कर पा रहे हैं कि वे अपने कश्मीर के भाइयों, बहनों, मित्रो के साथ क्या व्यवहार करें और न महबूबा मुफ्ती तय कर पा रही हैं कि वे कश्मीर के लोगों पर सख्ती से राज करना चाहती हैं या उनका हमदर्द बनना चाहती हैं। इस दुविधा का खामियाजा सुरक्षाबल भी उठा रहे हैं और कश्मीर की अवाम भी।

दोनों के बीच संदेह की खाई गहरी करके आखिर फायदा किसका हो रहा है, यह सोचने वाली बात है। लोग अब भी उस मंजर को नहीं भूले हैं, जब एक युवक को मानव ढाल बनाकर जीप पर बांधा गया था। अमानवीयता की वह जीती-जागती तस्वीर थी। उस युवक को पत्थरबाज कहा गया था, हालांकि इससे उसने साफ इंकार किया। अब एक बार फिर सीआरपीएफ की जीप से एक युवक की कुचलकर मौत हो गई और इसे भी पत्थरबाज की मौत ही प्रचारित किया जा रहा है।

प्रशासन की नीतियों पर फिर सवाल

दरअसल शुक्रवार को राजधानी श्रीनगर के नौहट्टा इलाके की जामा मस्जिद से लोग जुमे की नमाज पढ़कर बाहर आ रहे थे तो युवाओं की एक बड़ी तादाद शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए मस्जिद के बाहर जमा हो गई थी। पुलिस पर आरोप है कि उसने रमजान के दौरान शहर की मस्जिद में चरमपंथियों के छिपे होने को लेकर छापेमारी की थी। खबरों के मुताबिक यह प्रदर्शन कथित तौर पर पुलिस की इसी ज़्यादती के खिलाफ हो रहा था। युवा एक जगह एकत्र थे और इसी दौरान सीआरपीएफ की एक गाड़ी भीड़ की तरफ आती दिखी तो युवा गुस्से में आ गए। उन्होंने सीआरपीएफ की गाड़ी को घेर लिया।

भीड़ से बचकर निकलने की कोशिश में गाड़ी ने दो युवाओं को कुचल दिया। जिसमें एक युवक कैसर अहमद बट की अस्पताल में मौत हो गई। इस मौत से लोगों का गुस्सा और भड़का, जब कैसर को दफनाने के बाद लोग वापस आ रहे थे तो सुरक्षाबलों और युवाओं के बीच फिर झड़पें हुईं। रमजान के मौके पर हुई इस घटना ने सरकार, प्रशासन की नीतियों पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में पुलिस ने दो मामले दर्ज किए हैं, एक सीआरपीएफ के खिलाफ, दूसरा दंगे का। यानी सीआरपीएफ और प्रदर्शनकारी युवाओं दोनों पर ही आरोप लग रहे हैं। इधर पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तंज भरा ट्वीट किया है कि सीजफायर का मतलब है बंदूक का इस्तेमाल नहीं बल्कि जीप का इस्तेमाल? ये तंज, आरोप, सवाल उठते ही रहेंगे, जब तक कश्मीर की समस्या को कानून-व्यवस्था या आतंकवाद-पत्थरबाज जैसी शब्दावली से ऊपर उठकर संवेदनशीलता के साथ नहीं समझा जाएगा। ये मामला केवल पाकिस्तान को दोषी ठहराकर भी नहीं सुलझेगा।

पाकिस्तान तब भी वहीं था, जब कश्मीर में गोलीबारी नहीं पर्यटकों की खिलखिलाहट गूंजती थी। जम्मू-कश्मीर को राजनीतिक प्रयोग का मैदान या ताकत प्रदर्शन का अखाड़ा न समझा जाए, बल्कि वहां के लोगों को, खासकर युवाओं को भरोसे में लेकर, धैर्य के साथ उनका पक्ष समझकर समस्या को सुलझाया जाए। लेकिन इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है, क्या नरेन्द्र मोदी वह दिखा पाएंगे?

(देशबन्धु का संपादकीय)

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