वाम के हार की इबारत मोदी ने नहीं स्वयं वाम ने लिखी है

मार्क्सवाद अच्छी चीज है लेकिन यह किसने कहा कि मार्क्सवाद के साथ वाजिब पारिश्रमिक नहीं लेना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टियाँ वाजिब वेतनमान के लिए त्रिपुरा में कभी प्रयास करती नजर नहीं आईं, ...

त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के परिणाम और वाम

जगदीश्वर चतुर्वेदी

त्रिपुरा में चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हुए। आशा के विपरीत वाम हार गया। वाम की हार में जनता की जीत है। इसके कई कारण हैं।पहली बात यह कि इस राज्य को सुचिंतित ढंग से वाम शासन ने अविकसित रखा। वाम के हार की इबारत मोदी ने नहीं स्वयं वाम ने लिखी है। मसलन्, राज्य अभी तक चौथे वेतन आयोग में जी रहा है। कल्पना कीजिए देश में सातवें वेतन आयोग को लागू करने की कोशिशेंहो रही हैं, लेकिन त्रिपुरा में अभी तक मात्र चौथा वेतन आयोग लागू हुआ है। यह माकपा का मजदूरविरोधी फैसला ही कहा जाएगा। यह कैसे संभव है कि देश सातवें वेतन आयोग में दाखिल हो और त्रिपुरा में मजदूरों कर्मचारियों के वेतन में कोई वृद्धि न हो। मोदी ने उम्मीदें पैदा कीं, सातवें वेतनमान देने का वायदा किया है यही वजह है कि अधिकांश राज्य कर्मचारियों का उनको समर्थन मिला है। उल्लेखनीय है बंगाल में भी वाम ने छठे वेतनमान को लागू किया लेकिन पचास फीसदी से ज्यादा महंगाई भत्ता रोक लिया दिया ही नहीं, मेरे जैसे शिक्षक सालाना सात लाख रुपये का नुकसान उठाकर वहाँ नौकरी कर रहे थे।

वाम नेताओं का मानना है कर्मचारियों को बहुत तनख़्वाह मिलती है, शिक्षकों को बहुत तनख़्वाह मिलती है इसलिए इनकी पगार काटी जानी चाहिए। मजदूरों -कर्मचारियों को सही वेतनमान न देना, सही महंगाई भत्ता न देना आर्थिक लूट है, जिसे वाम सरकार करती रही हैं। मेरा निजी तौर पर बीस लाख से ऊपर पैसा राज्य सरकार खा गयी। अब आप सोचिए एक शिक्षक के लाखों रुपये राज्य सरकार खा जाए तो उस सरकार को क्या कहेंगे ?

त्रिपुरा में सादगी के आदर्श मुख्यमंत्री थे लेकिन इससे जनता पर क्या असर होगा ? आदिवासियों से लेकर गैर आदिवासियों तक बेकारी का राज्य छाया हुआ है, राज्य सरकार उनके लिए किसी भी किस्म का काम जुगाड़ नहीं कर पाई है।

मार्क्सवाद अच्छी चीज है लेकिन यह किसने कहा कि मार्क्सवाद के साथ वाजिब पारिश्रमिक नहीं लेना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टियाँ वाजिब वेतनमान के लिए त्रिपुरा में कभी प्रयास करती नजर नहीं आईं, त्रिपुरा में आम आदमी भाजपा को वैचारिक तौर पर नापसंद करता है लेकिन स्वार्थवश मजबूर होकर भाजपा के पास गया है। भाजपा की जीत का एक बडा कारक है माइग्रेशन, जो लोग बंगलादेश से स्थानांतरित होकर त्रिपुरा में रह रहे हैं उन्होंने भय के कारण अपनी सुरक्षा हेतु भाजपा को वोट दिया है। इसके अलावा पार्टी की कार्यप्रणाली के अधिनायकवादी रूप भी हैं जिनकी चर्चा फिर कभी।

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