वामपंथ को अपनी ताकत को पहचानना होगा

वैसे वामपंथ की ओर से किसी भी प्रकार की चुनौती के न होने ने आज की राजनीति में इतना योगदान जरूर किया है कि मोदी-आरएसएस पर सत्ता का नशा पूरी तरह से छा चुका है...

-अरुण माहेश्वरी

सब जानते हैं यह समय भारतीय राजनीति में वामपंथ के लिये अस्तित्वीय संकट का समय है। जिस काल में भारतीय राष्ट्र के सारे अर्जित प्रगतिशील मूल्य दाव पर लगे हुए दिखाई देते हैं, चारो ओर एक प्रकार की आदिम विवेकहीनता का बोलबाला है, एक केंद्रीय सरकार संगठित रूप में प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र पर भी अंध-विश्वासों और कुसंस्कारों को थोपने की कोशिश कर रही है, वैज्ञानिकों को विमानों और प्लास्टिक सर्जरी की वैदिक विधियों पर शोध की तरह की बेतुकी हिदायतें दी जा रही है और डार्विन के विकासवाद के सिद्धांतों का अनपढ़ राजनीतिज्ञों के द्वारा खुले आम मजाक उड़ाया जा रहा है — ऐसे समय में जब विज्ञान-मनस्कता के प्रसार की हमारी संवैधानिक निष्ठा को पूरी ताकत से उठाने वाली प्रगतिशील शक्तियों की हमारी राजनीति को सबसे अधिक जरूरत है, उस समय वामपंथ का अजीब किस्म की अपनी दुविधाओं के पाशों में फंस कर जड़ सा हो जाना बेहद चिंताजनक है। वामपंथ के इस अजीब से आत्म-निर्वासन ने राजनीति के वर्तमान परिदृश्य से ही उसे जैसे अदृश्य कर दिया है। 

वैसे वामपंथ की ओर से किसी भी प्रकार की चुनौती के न होने ने आज की राजनीति में इतना योगदान जरूर किया है कि मोदी-आरएसएस पर सत्ता का नशा पूरी तरह से छा चुका है। फासीवाद के उदय के व्याख्याताओं ने सत्ता के लिये मजदूर वर्ग की चुनौती को फासीवाद के उदय की एक शर्त बताया था। लेकिन सचमुच आज के भारत में लगता है जैसे ऐसी किसी चुनौती की पूरी तरह से अनुपस्थिति की भी फासीवाद के बरक्स एक बड़ी भूमिका है। जनतंत्र के जिंदा रहते ये ताकतें जल्द ही सत्ता के मद में उन्मत्त होकर सरे बाजार निपट नंगे, सीना फुलाये घूमने लगती हैं। आज पूरा देश इनकी उद्दंडताओं को देख रहा है। और इसीलिये, एक स्वेच्छाचारी शासन के खिलाफ जनता के तमाम हिस्से स्वतःस्फूर्त ढंग से लामबंद भी हो रहे हैं।

बहरहाल, एक ऐसे समय में वामपंथ की दो प्रमुख पार्टियों, सीपीआई(एम) (18-22 अप्रैल) और सीपीआई (25-29 अप्रैल) की क्रमशः हैदराबाद और कोल्लम में पार्टी कांग्रेस हो रही हैं। एक तेजी से बदल रहे समय और राजनीति के नये परिदृश्य में कम्युनिस्ट पार्टियों के सांगठनिक ढांचों में पार्टी कांग्रेस ही उनके लिये बचा हुआ एक प्रमुख अवसर है जब वे कोरी गुटबाजी पर टिकी झूठी सैद्धांतिक बहसों के रोग से मुक्त हो कर, भारतीय संविधान और जनतंत्र के परिप्रेक्ष्य में अपनी आगे की राजनीति के पथ को नये सिरे से निर्धारित कर सकती हैं।

आजादी के इन सत्तर सालों में कम्युनिस्ट पार्टियों को एकाधिक राज्यों में सरकारें बनाने का मौका मिला हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा की सरकारों ने खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार और पंचायती राज के कामों के जरिये गांव के गरीबों के जीवन को जिस प्रकार एक हद तक शोषण के जुएं से मुक्त किया, वह स्वयं में भारतीय राजनीति के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय रहा है। इसने केंद्र की नीतियों पर भी बड़ा असर डाला; पश्चिम बंगाल में रेकर्ड 34 सालों तक लगातार वाम मोर्चा सरकार का शासन कायम रहा। लेकिन भूमि सुधार के कामों के अलावा शहरी और औद्योगिक क्षेत्र में वामपंथी सरकारें अपनी भूमिका को दूसरी पार्टियों से अलगाने में असमर्थ रही। उल्टे, नौकरशाही पर उनकी निर्भरशीलता ने मौके-बेमौके उन्हें जनता की ही आकांक्षाओं के विरूद्ध खड़ा कर दिया। शहरी विकास के लिये जमीन के अधिग्रहण के मामले में इनका नजरिया गरीब जनता के हित में होने के बजाय उनके खिलाफ चला गया, और भारतीय वामपंथ को इसका एक भारी राजनीतिक खामियाजा चुकाना पड़ा। वह सीधे तौर पर वामपंथ के जन-मुक्तिकारी चरित्र के साथ समझौता था।

यह वक्त है जब सत्ता के विकेंद्रीकरण, पंचायती राज और भारत के संघीय ढांचे की रक्षा के सवाल पर वाम की उल्लेखनीय सफलता और शहरी तथा औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उसकी विफलताओं को सही ढंग से निरूपित करते हुए उनसे उचित शिक्षा ली जाए। जिस वस्तु तत्व का निरूपण नहीं किया जाता, उससे किसी भी प्रकार के अज्ञान का निराकरण संभव नहीं है।

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर के बाद हाल में केरल के कन्नूर जिले के एक छोटे से गांव में एक बाईपास बनाने के लिये जमीन के अधिग्रहण के मामले में विवाद ने जो रूप लिया, वह भी कुछ ऐसा ही मामला था। यह विवाद इतना बढ़ गया कि राष्ट्रीय ख़बरों तक में शामिल हो गया। एलडीएफ़ सरकार और पार्टी गाँव के अंदर से ही सड़क को ले जाने पर तुले हुए थे, और किसान अपनी ज़मीन को न देने पर आमादा थे। यह अनायास ही बंगाल की नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं की याद दिलाने वाली घटना थी। सत्ता पर आकर राजनीति को भूल सिर्फ अर्थनीतिक ‘विकास’ के प्रति मोहांधता सचमुच एक कथित क्रांतिकारी पार्टी के द्वारा जनता के अराजनीतिकरण का काम करने की तरह है। समाज में कोई भी परिवर्तन सर्व-मान्य चालू धारणाओं से चिपके रह कर संभव नहीं है, बल्कि नया कुछ करने के लिये प्रचलित सोच से अपने को काटना पड़ता है। उसी से राज्य की अपनी जड़ता भी टूटती है। राज्य को जनता की आकांक्षाओं, उसके विश्वास, समानता और उसके डर से चालित होना होगा। इसमें जनता के साथ वैर की कोई जगह नहीं हो सकती है। पार्टी का नौकरशाही ढाँचा अक्सर अपने को जनता की आंतरिक सक्रियता, उसके आंदोलन के खिलाफ खड़ा कर लेता है।

बहरहाल, अंत में केरल के वामपंथी नेतृत्व में शुभ बुद्धि का उदय हुआ और उन्होंने समस्या के समाधान का वैकल्पिक रास्ता खोज लिया - जमीन के अधिग्रहण के बजाय फ़्लाईओवर के जरिये काम को आगे बढ़ाने का रास्ता।

कम्युनिस्ट विचारों और राजनीति का मूल तत्व है मुक्ति, जनता के जीवन को तमाम बंधनों से अधिक से अधिक मुक्त करते हुए उसकी सर्जनात्मक शक्ति को उन्मोचित करना। उसका लक्ष्य कभी भी किसी दमनकारी राजसत्ता का निर्माण नहीं हो सकता है। समाजवादी व्यवस्था भी वास्तव में सभी प्रकार की राजसत्ता को खत्म करने में ही पूरी तरह से चरितार्थ हो सकती है, जो उसके साम्यवाद में उत्तरण की दिशा है। जब समाजवादी राज्य भी जनता पर अनंत काल तक शासन करने के महज एक और तंत्र के रूप में काम करने लगता है, उसमें वे सारी विकृतियां उत्पन्न होने लगती है, जो समाजवाद के मुक्तिदायी तत्व को क्षीण करती है। तत्वतः, सोवियत संघ और दुनिया में समाजवाद के पराभव का मूल कारण यही था, जब देश-दुनिया की परिस्थितियों की किसी भी वजह से क्यों न हो, समाजवादी व्यवस्था ने एक दमनकारी नौकरशाही जड़ीभूत व्यवस्था का रूप ले लिया था। समाजवाद के मुक्तिकामी चरित्र और अन्य शोषणकारी व्यवस्थाओं के चरित्र के बीच का फर्क ओझल होने लगा था।

इसीलिये देश और दुनिया की आज की बिल्कुल नई प्रकार की चुनौतियों के वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों की कांग्रेस के ये आयोजन बहुत ही अर्थपूर्ण साबित हो सकते हैं। इसीलिये देश और दुनिया की आज की बिल्कुल नई प्रकार की चुनौतियों के वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों की कांग्रेस के ये आयोजन बहुत ही अर्थपूर्ण साबित हो सकते हैं। जनता के जो भी हिस्से अपने जीवन की समस्याओं के लिये आंदोलनों में उतरे हुए हैं, वामपंथी ताकतों को उन आंदोलन में अपनी मौजूदगी और उनके साथ अपनी एकजुटता के लिये हमेशा तत्पर रहना चाहिए। यह समस्या आम लोगों की अपनी जातीय पहचान से जुड़ी हुई भी हो सकती है, वर्ण-वैषम्य से मुक्ति की भी हो सकती है, गांव के किसानों के उत्पाद के वाजिब मूल्य की मांग की हो सकती है या संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों और विभिन्न पेशेवरों की जीविका के सवालों से भी जुड़ी हो सकती है। क्रांतिकारी राजनीति का दायित्व शासन की समस्याओं का समाधान नहीं है, जनता की समस्याओं का समाधान है।

आज भारतीय गणतंत्र की रक्षा का सवाल एक सबसे प्रमुख सवाल है। मोदी-आरएसएस सरकार के रूप में एक ऐसी शक्ति ने आज राजसत्ता पर अपना कब्जा कर रखा है जो इस देश के धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक संविधान पर, नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर विश्वास नहीं करती है। हिटलर की प्रेरणा से निर्मित इस संगठन का एक मात्र लक्ष्य है सारी सत्ता को केंद्रीभूत करके एक अधिनायकवादी शासन-व्यवस्था कायम करना। नागरिकों की हैसियत इनकी नजर में गुलामों से बेहतर नहीं है। पिछले चार सालों में अपने अनेक कदमों से इसने अपने इन इरादों को पूरी नंगई के साथ प्रकट किया है। नोटबंदी और जीएसटी की तरह के कदम एक वही स्वेच्छाचारी सरकार उठा सकती है जो जनता को अपना गुलाम मानती है। इसीप्रकार, जिस धृष्टता के साथ ये न्यायपालिका के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जज की हत्या तक के मसलों को दबाने की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे हैं, उसने जनतांत्रिक राजनीति के सभी रूपों के सामने संकट पैदा कर दिया है। पूरी अर्थ-व्यवस्था ठप है।

आज भारत के कम्युनिस्टों को अपनी मुक्तिकामी राजनीति को नये सिरे से अर्जित करना है। अभी के फासिस्ट रूझान के शासन में यह काम सभी जनतंत्र-प्रेमी और धर्म-निरपेक्ष ताकतों को लामबंद करने की एक व्यापक राजनीतिक दृष्टि के जरिये ही मुमकिन है।

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