मित्रता के मायने : सत्य की कसौटी साहित्य नहीं, मनुष्य का जीवन है

मित्रता के लिए जरूरी है "मैं" भाव को न छोड़ें। सबसे अच्छी दोस्त होती है माँ! दोस्त बनना है तो माँ जैसा त्याग और निस्वार्थ प्रेम पैदा करो।...

 

जगदीश्वर चतुर्वेदी

एक जमाना था जब राजनीति देखकर मित्र बनाया जाता था। मित्रता की राजनीति पर बातें होती थीं, केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के बीच का मित्र संवाद जगजाहिर है।

मित्रता में राजनीति की तलाश का दौर क्या अब खत्म हो गया है ?मुझे लगता है अब खत्म हो गया है, अब स्वार्थों की मित्रता रह गयी है। यह उत्तर शीतयुद्धीय मित्रता का दौर है। इसमें मित्रता नहीं स्वार्थ बड़ा है।

सबसे अच्छी मित्रता वह है जो अज्ञात से ज्ञात की ओर ले जाए, लेकिन इन दिनों बीमारी यह है कि मित्रता में हम ज्ञात से ज्ञात की ओर ही जाते हैं। इस क्रम में वर्षों दोस्त रहते हैं लेकिन एक-दूसरे से कुछ नहीं सीखते। इस तरह के मित्र अज्ञात से डरते हैं, अज्ञात सामने आता है तो नाराज हो जाते हैं, बुरा मान जाते हैं। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें "यह तो अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहना है। यह अच्छा नहीं है। इसलिए अज्ञात से डरने की जरूरत नहीं है। "

मुक्तिबोध ने मित्रता की पेचीदगियों के समाधान के रूप में बहुत महत्वपूर्ण समाधान पेश किया है, मैं स्वयं भी मुक्तिबोध के समाधान का कायल रहा हूँ और इसका पालन करता रहा हूँ।

मुक्तिबोध के अनुसार-

"हम अपने जीवन को एक-उपन्यास समझ लें, और हमारे जीवन में आनेवाले लोगों को केवल पात्र, तो ज्यादा युक्ति-युक्त होगा और हमारा जीवन भी अधिक रसमय हो जाएगा। "

सवाल यह उठता है मैं आज यह सब क्यों लिख रहा हूँ इसलिए कि आज की जिन्दगी में एक-दूसरे को लेकर जहर बहुत उगला जा रहा है, इस जहर से बचने का एकमात्र रास्ता है मुक्तिबोधीय समाधान।

हमारे जो मित्र साहित्य में सत्य खोज रहे हैं, सत्य की कसौटी खोज रहे हैं, साहित्य की प्रासंगिकता के सवालों के उत्तर खोज रहे हैं, वे एकायामी नजरिए के शिकार हैं। सत्य की कसौटी साहित्य नहीं, मनुष्य का जीवन है, उसका अन्तर्जगत है।

साहित्य में सत्य नहीं होता, सत्य का आभास होता है। इसी तरह जो मित्र साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश खोज रहे हैं, वे भूल कर रहे हैं, साहित्य का प्रकाश सत्य से भिन्न होता है। इसी प्रसंग में मुक्तिबोध ने एक बहुत ही मार्के की बात कही है, "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है। "

मुक्तिबोध के अनुसार

"आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है, स्वयं का चरित्र साक्षात्कार अत्यन्त कठिन है।"

यहीं पर हमारी मित्रता की अनेक गुत्थियों के सवालों के उत्तर छिपे हैं।

अनेक मित्र मेरी तरह-तरह से आलोचना और विश्लेषण करते हैं, मैं उनकी बातों को आमतौर पर चुप सुन लेता हूँ, बाद में सोचता हूँ, उसमें कोई बात ऐसी लगे जो मेरी कमजोरियों को सामने लाए तो तत्काल मान भी लेता हूँ। लेकिन मैं किसी भी मित्र के द्वारा किए गए व्यक्तित्व विश्लेषण को अंतिम मानने को तैयार नहीं हूँ। क्योंकि मैंने अपने को लगातार सुधारा है। लेकिन मुझे मुक्तिबोध की ही तरह स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण अविवेकपूर्ण लगता है। मौजूदा दौर उसी का है।

इस दौर में हमारे मित्र स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण को बड़ी निष्ठा और दृढ़ आस्था के साथ करते हैं। इस तरह के विश्लेषण को मुक्तिबोध ने अविवेकपूर्ण माना है।

मित्रता के लिए जरूरी है "मैं" भाव को न छोड़ें। अनेक मित्र हैं जो अपने स्वार्थ के लिए मुझे "मैं" भाव से दूर ले जाना चाहते हैं। इसके कारण अविवेकपूर्ण अधिकार भावना का भी प्रदर्शन करते हैं, इससे बचने की सलाह मुक्तिबोध देते हैं। नए दौर में मित्रता का मुहावरा सीखना हो तो मुक्तिबोध से सीखना चाहिए।

मित्रता में जब प्यार नाटकीय रूपों में व्यक्त होने लगे तो समझो मित्रता गयी पानी भरने ! मुक्तिबोध को घिन आती थी ऐसी मित्रता और इस तरह के मित्रों से ! इस तरह की मित्रता घनघोर आत्मबद्ध भाव की शिकार होती है। वह इल्जाजिक पर सवार होकर आती है। इस तरह की मित्रता तथाकथित "हृदय की गाथाओं" से गुजरकर हम तक आती है। इसमें अहंकार कूट-कूटकर भरा है। इसमें खास किस्म का मनोवैज्ञानिक स्वार्थ भी है।

मित्रता का नया पैमाना है आत्मरक्षा और उसके संबंध में अपनी दृढता के भावबोध का प्रदर्शन, मुक्तिबोध इसके गहरे आलोचक थे।

सबसे अच्छी दोस्त होती है माँ! दोस्त बनना है तो माँ जैसा त्याग और निस्वार्थ प्रेम पैदा करो।

सबसे अच्छा दोस्त वह जो एकांत दे!

सबसे अच्छा मित्र वह जो परेशान न करे !

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