श्रीमान जेटली ! मोदी-आरएसएस टोली का गुलाम नहीं भारत का नागरिक

सभी देशभक्त राजनीतिक ताकतों को इस समय एकजुट होकर इनके खिलाफ उतरना होगा। देश रहेगा, तभी कोई राजनीति और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएं रहेगी। ये तो इस देश की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं।...

श्रीमान जेटली ! मोदी-आरएसएस टोली का गुलाम नहीं भारत का नागरिक

-अरुण माहेश्वरी

एनआरसी के विषय में अमित शाहों की थोथी फुत्कारों के बाद अब रोग शैया से अरुण जेटली को आरएसएस की ओर से मैदान में उतारा गया है। उन्होंने राहुल गांधी और विपक्ष के सारे नेताओं को उपदेश दिया है कि भारत की सार्वभौमिकता कोई खिलौना नहीं है। सार्वभौमिकता और नागगरिकता का सवाल भारतीयता के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा सवाल है।

असम में एनआरसी का मसौदा जारी होने के बाद ही, जिसमें चालीस लाख लोगों को फिलहाल उस सूची से बाहर रखा गया है, अमित शाह और भाजपा के सारे हुड़दंगी नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि ये सब बचे हुए या छांट दिये गये लोग बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। इनसे सारे नागरिक अधिकार छीन लिये जाने चाहिए।

भाजपा के इन हुड़दंगियों की भड़काऊ हरकतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को यह तत्काल निर्देश देना पड़ा कि इस मसौदे के आधार पर असम के एक भी निवासी के विरुद्ध जरा सी भी कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है। यह कोरा मसौदा है, एक कच्ची सूची। इसे अंतिमम रूप देने के लिये असम में नागरिकता के प्रत्येक दावेदार के आवेदन की सही ढंग से जांच को पूरा करना होगा।

सभ्य समाज में इंसाफ का यह न्यूनतम तकाजा है कि एक भी मासूम व्यक्ति के साथ नाइंसाफी नहीं की जा सकती है, भले ही दोषी व्यक्ति को सजा न मिल पाए। इसीलिये एनआरसी को अंतिम और क्रियात्मक रूप देने के पहले राज्य को बहुत संजीदगी और धीरज के साथ हरेक आवेदन को जांच-परख कर उस पर न्याय करना होगा। यह निश्चित तौर पर एक दीर्घकालीन प्रक्रिया के जरिये ही संभव हो पायेगा। अभी जितने साल इस मसौदे को तैयार करने में लगे हैं, शायद उससे कई गुना ज्यादा साल उसे अंतिम रूप देने में लगेंगे।

एनआरसी को लेकर भाजपाई पागलों के उन्माद को देखते हुए चुनाव आयोग को भी यह साफ ऐलान करना पड़ा कि एनआरसी के इस मसौदे से मतदाता सूची का कोई संपर्क नहीं हो सकता है। इस सूची का क्रियात्मक रूप से अभी कोई मूल्य नहीं है।

इन सबके बावजूद, तेजी से जन-समर्थन गंवा रही मोदी-आरएसएस टोली अपनी बदहवासी में इसे ही अपनी नफरत और जनता को बाटने की राजनीति के एक और औजार के रूप में प्रयोग करने के लिये उतर पड़ी है।

जेटली कहते हैं, भारत की सार्वभौमिकता कोई खिलौना नहीं है। हमारा जेटली से यह प्रति-प्रश्न है कि क्या भारत का नागरिक मोदी-आरएसएस गिरोह का गुलाम है ? जब तक यह पूरी तरह से, बिना किसी शक-सुबहे के प्रमाणित नहीं हो जाता कि फलां व्यक्ति इस देश का नागरिक नहीं है, तुम्हें किसने अधिकार दिया कि तुम उनको गैर-नागरिक घोषित कर दो ?

क्या जेटली दुनिया में नागरिकता के प्रश्नों की बारीकियों से परिचित नहीं है। खुद मोदी-जेटली के ढेर सारे एनआरआई मित्रों ने दोहरी नागरिकता ले रखी है। आज या कभी भी, किसी देश की नागरिकता का खाता अंतिम रूप से बंद नहीं होता है। नाना कारणों से, नाना शर्तों पर इसमें नई-नई प्रविष्टियां होती रहती है। पूरी मानव सभ्यता का निर्माण आप्रवासनों से ही हुआ है। यही मानव समाज की वैश्विकता का प्रकट रूप है। इस विषय पर अति-शुद्धतावादी और उत्तेजक रवैया वही अपनाता है जो संकीर्ण नजरिये वाला, किसी न किसी स्तर पर एथनिक क्लिनजिंग, नस्लों की शुद्धता पर विश्वास करने वाला नस्लवादी पशु होता है। पशु पर ही किसी नए ज्ञान-अज्ञान का कोई असर नहीं पड़ता है।

जेटली से कोई पूछे कि जब यह देश दुनिया में बसे हुए एनआरआई को अपनी नागरिकता देने के लिये पलक पावड़े बिछाता है, तब क्यों उन्हें देश की सार्वभौमिकता और नागरिकता के नाजुक विषय का खयाल नहीं आता ? क्यों आपकी कुदृष्टि हमेशा कमजोर और असहाय लोगों पर ही पड़ती है जो खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों, तमाम निर्माण-विनिर्माण के स्थलों आदि में मेहनत-मजूरी करके अपना जीवन यापन और इस देश का निर्माण करते हैं। कभी नोटबंदी के नाम पर आप उन्हें बुरी तरह नचाते हैं, तो कभी साधारण व्यापारियों से जीएसटी की मनमानियों का खेल खेलते हैं, और अभी यह नया एनआरसी का सोसा शुरू कर दिया है। क्यों आप गरीब लोगों पर अपनी फासीवादी राजनीति का प्रयोग करते रहते हैं ?

राष्ट्र की सार्वभौमिकता राज्य के दमन और अत्याचारों से नहीं, उसके नागरिकों की एकता, आपसी सौहार्द्र  और कानून के प्रति सबकी निष्ठा से बनती है। लेकिन जेटली ने देश की सार्वभौमिकता का मायने हिटलरी राज्य समझ लिया है। जिनके पास जनता के जीवन में उन्नति, सुरक्षा और कल्याण की कोई राजनीतिक दृष्टि और कार्यक्रम नहीं है, वे शुद्ध रूप से आम लोगों को डरा कर उनका समर्थन पाने, और इंसान के अंदर के पशु भाव को जागृत करके अपना वोट बैंक बनाने की राजनीति में लगे हुए हैं। हमारे देश की सार्वभौमिकता के असली शत्रु तो मोदी-आरएसएस टोली है, जो देश को खाक करके अपना भगवा लहराना चाहते हैं।

समय आ गया है जब एक-एक विवेकवान भारतीय को हमारे इस देश को बाटने की साजिश में शुरू से लगे इन सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों के खिलाफ सचेत और सन्नद्ध होना होगा। सभी देशभक्त राजनीतिक ताकतों को इस समय एकजुट होकर इनके खिलाफ उतरना होगा। देश रहेगा, तभी कोई राजनीति और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताएं रहेगी। ये तो इस देश की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं।

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