नोटबंदी जीएसटी के बाद अर्थव्यवस्था में हाहाकार मचा है और मोदीजी हवावादी आशावाद से देश चला रहे

मोदी को यह भी बताना चाहिए कि इस धर्मयुद्ध में वे खुद को अर्जुन मानते हैं या कर्ण? वे पांडवों के साथ हैं या कौरवों के?...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

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प्रधानमंत्री जी पुरानी सरकारों को कृपया कोसना बंद करें। यूपीए ने अच्छे दिन आएंगे, ऐसा जुमला नहीं चलाया था। ये आप ही थे जो 2014 में लोगों के खाते में 15 लाख रुपए पहुंचाने, करोड़ो रोजगार देने और अच्छे दिन लाने का वादा करके सत्ता में आए थे।

उम्मीद पर दुनिया कायम है, यह तो सुना था, लेकिन यह देख कर छाती 56 इंच से भी ज्यादा चौड़ी हो जाना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री कितने आशावादी हैं,  वे केवल उम्मीद पर ही पूरा देश चला रहे हैं। जब वे प्रधानमंत्री नहीं थे, तब उन्होंने कहा था कि गिलास आधा पानी से भरा हो, तो बाकी आधे हिस्से को मैं खाली नहीं देखता हूं, बल्कि हवा से भरा देखता हूं। आज देश उनके इसी हवावादी, आशावाद से चल रहा है। नोटबंदी और जीडीपी के बाद देश की अर्थव्यवस्था में हाहाकार मचा है। साधारण जनता से लेकर व्यापारी वर्ग तक एक के बाद एक पड़ी इन चोटों से अब तक कराह रहे हैं। अमर्त्य सेन, डा.मनमोहन सिंह, यशवंत सिन्हा जैसे कई अर्थशास्त्री इन फैसलों को घातक बता चुके हैं।

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संघ परिवार और भाजपा से जुड़े लोग सरकार के फैसलों की आलोचना कर रहे हैं। हाल ही में अरुण शौरी ने भी नोटबंदी को मनीलाड्रिंग स्कीम बताया। गलती इंसानों से होती है और इंसान ही है जो अपनी गलती स्वीकार भी करता है। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री तो शायद आम इंसानों से ऊपर हैं, दिव्य पुरुष हैं, वे भला कोई गलती कैसे कर सकते हैं। उनके हर कार्य में कोई अलौकिक लीला छिपी होती है। इसलिए वे अब महाभारत की बात कर रहे हैं किकर्ण के सारथी शल्य उन्हें निराश करते थे, ऐसा ही काम आज भी कुछ लोग कर रहे हैं। मोदीजी ने महाभारत की बात छेड़ी है और कर्ण का उदाहरण दिया है, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि इस धर्मयुद्ध में वे खुद को अर्जुन मानते हैं या कर्ण? वे पांडवों के साथ हैं या कौरवों के?

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खैर.. सरकार के आर्थिक फैसलों की लंबे समय से हो रही आलोचनाओं का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री ने मौका चुना कंपनी सेके्रटरीज के कार्यक्रम को। बुधवार को इस सभा को संबोधित करते हुए मोदीजी ने देश के आर्थिक हालात पर अपने विचार रखे और हमेशा की तरह अपनी जिम्मेदारी लेने की जगह पहुंच गए साढ़े तीन साल पहले की यूपीए सरकार पर। इस साल की पहली तिमाही में विकास दर लुढ़क कर 5.7 प्रतिशत पहुंचने पर उन्होंने कहा कि इससे पहले की सरकारों में छह साल में आठ मौके ऐसे आए हैं, जिनमें विकास दर गिरी है।

प्रधानमंत्री जी पुरानी सरकारों को कृपया कोसना बंद करें। यूपीए ने अच्छे दिन आएंगे, ऐसा जुमला नहीं चलाया था। ये आप ही थे जो 2014 में लोगों के खाते में 15 लाख रुपए पहुंचाने, करोड़ो रोजगार देने और अच्छे दिन लाने का वादा करके सत्ता में आए थे। आज लाखों लोगों की नौकरियां नोटबंदी में चली गई है। जिस जीडीपी की बात आप और आपके वित्त मंत्री करते हैं, उसका पूरा सच भी जनता को नहीं बताया जा रहा है।

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भारत में जीडीपी की गणना सिर्फ संगठित क्षेत्र से ही प्राप्त सूचना के आधार पर होती है, अनौपचारिक क्षेत्र से नहीं, जबकि यह देश की अर्थव्यवस्था का 40 प्रतिशत से अधिक है। राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण की 2015-16 की 73वें दौर की रिपोर्ट के मुताबिक कृषि के अतिरिक्त ऐसे 6 करोड़ 30 लाख गैर पंजीकृत कारोबार हैं जिनमें 11 करोड़ से अधिक लोग रोजगार पाते हैं। इस अनौपचारिक क्षेत्र में आई मंदी को तो गिना ही नहीं गया। नोटबंदी के बाद इस क्षेत्र में बहुत से कारोबार बन्द हो गये थे और बहुत से लोगों को बेरोजगार होना पड़ा था। इसलिए जीडीपी की एकतरफा गणना केवल आंकड़ों की बाजीगरी है।

असली तस्वीर तो सरकार देखना ही नहीं चाहती। लेकिन लोग चाहें तो अपने आसपास नजर घुमाकर गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी के आलम से देश के आर्थिक विकास का मुआयना कर सकते हैं।

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जब आरबीआई महंगाई बढ़ने की आशंका जतला रही है। छोटे कारोबारी, किसान, मजदूर, नौजवान, गृहणियां सब मंदी से त्रस्त हैं। तब प्रधानमंत्री केवल विदेशी निवेश या 2 महीने में पैसेंजर कारों की बिक्री में 12 प्रतिशत की वृद्धि को ही विकास मानें तो क्या समझा जाए? विकास पागल हो गया है जो अनाज की जगह कारों की खेती देखना चाहता है?

(देशबन्धु का संपादकीय साभार)

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