किसी पर एहसान नहीं है धर्मनिरपेक्षता की राजनीति... मँडरा रहा है भारत के पाकिस्तान होने का खतरा

गौरक्षक सक्रिय हैं और गायों का आना जाना मुश्किल... किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती धार्मिक कट्टरता...

शेष नारायण सिंह

आजकल देश के कुछ हिस्सों में गाय की रक्षा की राजनीति चल रही है। गौरक्षक सक्रिय हैं और गायों का आना जाना मुश्किल है। अगर को भी आदमी गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है तो वह जान जोखिम में डाल रहा होता है। ऐसी कई घटनाएं हुयी हैं जिसमें गाय की रक्षा के हवाले से एक ख़ास तरह के लोगों ने आम आदमियों का कत्ल किया है। कभी किसी के घर में गाय का गोश्त होने के शक में तो कभी किसी को गाय को मार डालने के शक में मार डाला गया है। इस मसले पर संसद में भी बहस हुयी है लेकिन उस बहस के बाद धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ हुंकार भर रही जमातों को देखकर डर लगने लगता है कि एक मुल्क के रूप में हम जा कहाँ रहे हैं।

हमारी आज़ादी की लड़ाई की बुनियादी मान्यता सभी धर्मों के लोगों के शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की रही है। जब बंटवारे के बाद हमारे बुजुर्गों ने संविधान की रचना की तो उसमें भी राष्ट्र की एकता की सबसे बड़ी ज़रुरत धर्मनिरपेक्षता को बताया। लेकिन आजकल इसी धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ शक्ति संपन्न वर्गों की तरफ से बयान आ रहे हैं जो चिंता का विषय हैं।

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी भी समुदाय पर एहसान नहीं होता।

किसी भी देश के नेता जब राजनीतिक आचरण में धर्मनिरपेक्षता को महत्वपूर्ण मुक़ाम देते हैं तो वे अपने राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए काम कर रहे होते हैं।

धर्मनिरपेक्षता का साधारण अर्थ यह है कि धर्म के आधार पर किसी को लाभ या हानि न पंहुचाया जाए। जब भी धर्म के आधार पर हानि या लाभ पंहुचाने की कोशिश शासक वर्ग करता है तो समाज को और राष्ट्र को भारी नुकसान होता है।

भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों से आज़ादी एक ही साथ मिली थी, लेकिन भारत दुनिया में आज एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर चुका है और अमरीका समेत सभी देश भारत को सम्मान की नज़र से देखते हैं लेकिन पाकिस्तान की हालत बिलकुल अलग है। वहाँ अगर चीन, अमरीका और पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक मदद न मिले तो बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी परेशानी पड़ सकती है। ऐसा इसलिए है कि आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिनाह की एक न चली और पाकिस्तान धर्म पर आधारित राज्य बन गया। पाकिस्तान दुनिया के बाक़ी संपन्न देशों पर निर्भर हो गया। अमरीकी और चीनी मदद का नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान की निर्भरता इन दोनों देशों पर बढ़ गयी है। पूरे पाकिस्तान में चीन ने सड़कों, बंदरगाहों और बिजली के उत्पादन केन्द्रों का ऐसा जाल बिछा दिया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढांचों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह से चीन की कृपा का मोहताज है।

अब तो पूरी दुनिया में यह कहा जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद की नर्सरी है।

जब अमरीका के शासकों को पाकिस्तानी आतंकवाद का इस्तेमाल पुराने सोवियत संघ और मौजूदा रूस के खिलाफ करना होता था तो वह आतंकवादियों को हर तरह की सहायता देता था। अमरीका को मुगालता था कि पाकिस्तान में वह जिस आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा था वह केवल एशिया में ही अमरीकी लाभ के लिए इस्तेमाल होगा लेकिन जब अमरीकी ज़मीन पर अल कायदा ने आतंकी हमला कर दिया तब अमरीका की समझ में आया कि आतंकवाद का कोई क्षेत्र नहीं होता और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।

आज पाकिस्तान धार्मिक आधार पर आतंकवाद के मोबिलाइजेशन का सबसे बड़ा केन्द्र है। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान ने एक राष्ट्र के रूप में शुरुआत तो सेकुलर तरीके से की थी लेकिन उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की राजनीति को बाद के शासकों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया और इस्लाम पर आधारित राजनीति की शुरुआत कर दी। धर्मनिरपेक्षता को भुला कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के बाद पाकिस्तान को किन- किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा है उसको जानने के लिए पाकिस्तान के पिछले पैंतीस वर्षों के इतिहास पर नज़र डालना ही काफी है। हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दूराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए।

पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा।ऐसा शायद इसलिए था कि 1920 तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति के पैरोकार थे। उन्होंने 1920 के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया। नतीजा यह हुआ कि 1936 से 1947 तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे। लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया।

जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा। अपने बहुचर्चित 11 अगस्त 1947 के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि,

”आप अब आज़ाद हैं। आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए। आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका पाकिस्तान के राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है। अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं। ऐसे नागरिक, जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं।“

इसी बात को उन्होंने फरवरी 1948 में भी जोर देकर दोहराया। उन्होंने कहा कि,

“किसी भी हालत में पाकिस्तान धार्मिक राज्य नहीं बनेगा। हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं। उनको भी वही अधिकार मिलेंगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें।”

लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया। पहले चुनाव के बाद ही वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी। 1971 आते-आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था। अलोकतांत्रिक धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे।

लेकिन असली धार्मिक कट्टरवाद की बुनियाद जनरल जियाउल हक़ ने डाली। उनको अपने पूर्ववर्ती शासक जुल्फिकार अली भुट्टो की हर बात को गलत साबित करना था, लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान की सभी संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया। उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो की रोटी, कपड़ा और मकान की राजनीति को साफ़ नकार दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना ही इस्लाम के कारण हुई थी, यह मुसलमानों के लिए बनाया गया था।

जनरल जिया ने दो दिसंबर 1978 को इस्लामी नववर्ष के मौके पर पाकिस्तान में इस्लामी सिस्टम को लागू कर दिया। उन्होंने तब तक के सभी पाकिस्तानी सेकुलर कानूनों को खत्म कर दिया और ऐलान किया कि वे निजामे-मुस्तफा लागू कर रहे थे।

उन्होंने शरिया अदालतें स्थापित करने का ऐलान कर दिया। लेकिन सभी कानून तो फ़ौरन बदले नहीं जा सकते थे लिहाजा जनरल जिया ने आर्डिनेंस लागू करके अपनी गद्दी की सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया। इस दिशा में पहला कानून था हुदूद आर्डिनेंस। इसके ज़रिये ताजिराते पाकिस्तान में बताए गए संपत्ति कानूनों को बदलने की कोशिश की गयी। पूरी तरह बदल तो नहीं सके क्योंकि इस्लामी सबूत के नियमों के आधार पर सज़ा दे पाना असंभव था। दूसरा बदलाव बलात्कार और व्यभिचार के कानून में किया गया इसके ज़रिए तो पूरे पाकिस्तान में औरतों को गुलाम से भी बदतर बना दिया गया। अपनी इसी इस्लामीकरण की योजना के तहत ही धार्मिक शिक्षण के केन्द्रों का बड़े पैमाने पर विकास किया गया. पाकिस्तानी समाज में मदरसों के मालिकों का अधिकार और प्रभाव बहुत बढ़ गया। संगीत में भी भारी बदलाव किया गया। पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न पर केवल देशभक्ति के गाने ही बजाये जाते थे। कुल मिलकर ऐसा पाकिस्तान बना दिया गया जिसमें धार्मिक कट्टरता और बहुमतवाद का ही राज था। आज पाकिस्तान की जो दुर्दशा है उसमें जनरल जिया के उसी धर्मिक राज कायम करने के उत्साह को ज़िम्मेदार माना जा सकता है।

किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती धार्मिक कट्टरता

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमत वाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। भारत की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते पाए जा रहे हैं। उनको भी ध्यान रखना पड़ेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती। अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये।

जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है। कहीं मुसलमानों को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है। इससे बचना पडेगा। अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है।

भारत के पाकिस्तान होने का खतरा

पाकिस्तान में जिस तरह से धर्म को आधार बनाकर जनरल जिया ने कट्टरता फैलाई उसी का नतीजा आज पकिस्तान भोग रहा है। अगर हम भी धार्मिक गोलबंदी के शिकार हुए तो हमारे सामने भी खतरा वही है। शासक वर्गों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए और देश की एकता को सुरक्षित रखना चाहिए।

 

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