प्रकाश करात की सनक से दुविधाओं के पाश में जकड़ दी गयी सीपीएम की त्रासदी

प्रकाश करात पिछले दिनों मोदी-आरएसएस-भाजपा के बारे में विश्लेषण में दुविधाग्रस्त स्थिति में फंसे हुए बार-बार दिखाई देते रहे हैं...

हाइलाइट्स

वामपंथ के अपने इस संकट के मूल में यह सचाई काम कर रही है कि वह खुद को सत्ता की दौड़ से अलग कर चुका है और वामपंथ की इस दशा के लिये उसके इतिहास के जिन दो फैसलों ने अहम भूमिका अदा की है वे 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देना और फिर 2005 में यूपीए-1 से समर्थन वापस लेना रहे हैं

प्रकाश करात पिछले दिनों मोदी-आरएसएस-भाजपा के बारे में विश्लेषण में दुविधाग्रस्त स्थिति में फंसे हुए बार-बार दिखाई देते रहे हैं

अरुण माहेश्वरी

आज (3 अक्तूबर 2017) के अखबारों में सीपीआई(एम) के पोलिट ब्यूरो की बैठक के बारे में कुछ खबरें आई हैं। इन खबरों को अगर सच माना जाए तो लगता है जैसे भारतीय वामपंथ की यह प्रमुख पार्टी कुछ ऐसे आत्मगत संकट में फंस गई है जिसमें एक वामपंथी पार्टी की विशिष्ट, अपनी एक निर्विकल्प आंतरिक संरचना के पहलू को वह गंवा चुकी है। सत्ता-संघर्ष, जिसे गुटबाजी भी कहते हैं, बहुमत-अल्पमत का खेल इसे लील ले रहा है और इस आंतरिक विसंगति का परिणाम उसके राजनीतिक कामों की दशा और दिशा को भी बुरी तरह से प्रभावित करने लगा है।

हमारे सामने यह एक बुनियादी सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या इस पार्टी के इस आत्म-संकट में उसके अंदर की कुछ खास विचारधारात्मक दुविधाओं की भी कोई भूमिका नहीं है ?

सन् '90 के बाद से ही, जब से भारतीय राजनीति में कांग्रेस दल को ठोस चुनौती देते हुए आरएसएस-भाजपा का साफ तौर पर उभार दिखाई देने लगा, सीपीआई(एम) अपने राजनीतिक मत को कांग्रेस और भाजपा, इन दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों के बरक्स परिभाषित करती रही है। यह सन् '75 के आंतरिक आपातकाल और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थिति से गुणात्मक रूप से एक भिन्न स्थिति है। उन दिनों वामपंथ भी एक बराबर की वैकल्पिक शक्ति हुआ करता था। तब कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों से समदुरत्व की बात का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि वामपंथ स्वयं ठोस रूप में एक विकल्प पेश कर पा रहा था। लेकिन जैसे ही, वामपंथ खुद इस रेस से हट गया, या कह सकते हैं पिछड़ गया, उसके लिये शत्रु एक नहीं, दो हो गये। अर्थात वह अपने लक्ष्य की निर्विकल्पता से हट कर एक प्रकार से विकल्पों के पाश में फंस गया। जरूरत यह थी कि जितना जल्द हो, वह इस पाश से मुक्त हो, और अपने निर्विकल्प लक्ष्य को सुनिश्चित करके उस दिशा में बढ़ जाए, लेकिन दुर्भाग्य से यह एक ऐसी फांस है जिससे वह आज तक अपने को मुक्त नहीं कर पाया है। उसके राजनीतिक प्रस्तावों में 'इसे हराओ, उसे कमजोर करो' या 'उसे कमजोर करो, इसे हराओं' की तरह की उलटबांसियो ने प्रमुख स्थान लेना शुरू कर दिया, 'अपने समय के प्रमुख और गौण अन्तर्विरोधों' की तरह के मंत्रों का जाप दिन प्रति दिन तेज होता चला गया, यथार्थ परिस्थिति के पहलू उपेक्षित होते चले गये।

जाहिर है कि वामपंथ के अपने इस संकट के मूल में यह सचाई काम कर रही है कि वह खुद को सत्ता की दौड़ से अलग कर चुका है और वामपंथ की इस दशा के लिये उसके इतिहास के जिन दो फैसलों ने अहम भूमिका अदा की है वे 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देना और फिर 2005 में यूपीए-1 से समर्थन वापस लेना रहे हैं। इस बात की हमने बार-बार अपने लेखों में चर्चा की है। कहने के लिये इनमें से पहले निर्णय को सीपीएम की भूलों के इतिहास की एक त्रासदी तो दूसरे को एक संपूर्ण प्रहसन कहा जा सकता है।  दूसरे निर्णय की सारवानता को साधारण आदमी तो समझ ही नहीं पाया, सिर्फ विमूढ़ बना देखता भर रह गया।

वैसे गहराई से सैद्धांतिक रूप में देखे तो इसे जर्जर सोवियत समाजवादी क्रांतिकारिता की अधोमुखी तात्विकता का क्रमिक प्रगटीकरण कहा जा सकता है।

इसमें मजे की बात यह है कि इन दोनों मौकों पर ही सीपीएम में इस निस्तेज हो चुकी सोवियत प्रकार की समाजवादी क्रांतिकारिता की कमान संभाले हुए एक ही व्यक्ति रहे — प्रकाश करात, जिनके बहुमत के पाश ने सीपीएम को वस्तुतः आज तक, दो दशकों के अंतराल के बाद भी जकड़ रखा है। चूंकि आज की दुनिया में सोवियत प्रकार की क्रांतिकारिता का कोई निर्विकल्प क्षितिज बचा नहीं है, बल्कि यह किसी विकल्प में भी शामिल नहीं है, इसीलिये इसकी जकड़बंदी का अर्थ अब किसी वामपंथी पार्टी में शुद्ध गुटबाजी के अलावा और कुछ नहीं हो सकता है।

1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद ही सीपीएम ने अपने को सोवियत प्रकार के समाजवाद की, एकदलीय शासन वाली कई विलक्षणताओं से मुक्त कर लिया था। इसके भी बहुत पहले, सन् '77 के सलकिया प्लेनम में जन-क्रांतिकारी पार्टी के लक्ष्य को अपना कर उसने एक नये भारतीय क्रांतिकारी निर्विकल्प की दिशा को खोज लिया  था और '90 के बाद उस दिशा में बढ़ने का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो गया था। लेकिन सन् '96 में देखा गया कि पुराने, अवशिष्ट निम्नमुखी क्रांतिकारी तत्वों ने जनवादी केंद्रीयता की आड़ में पार्टी को आगे बढ़ने देने के बजाय बहुमत के पाश से जकड़ कर रख दिया। तभी से बहुमत के नेतृत्व की सनक से पार्टी के प्रमुख निर्णय लिये जाने लगे। जो सैद्धांतिक तत्व ज्योति बसु वाले फैसले में आड़े आया, यूपीए-1 में शामिल होने के फैसले में आड़े नहीं आया ! यह सनक नहीं तो किस चीज का परिचायक था !

और आज भी यही सिलसिला चल रहा है।

यह एक संयोग ही था कि पार्टी की पिछली कांग्रेस में बहुमतवादियों की इच्छा के विपरीत सीताराम येचुरी पार्टी के महासचिव बन गये। लेकिन वे आज की परिस्थिति में जिसे न्यूनतम जनतांत्रिक चेतना का व्यक्ति भी सबसे जरूरी समझता है कि मोदी-आरएसएस के फासीवादी शासन के खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनवादी दलों की एकता के लिये काम किया जाए, उस दिशा में निर्द्वंद्व भाव से कभी नहीं बढ़ पाए। इसमें बाधा के तौर पर प्रकाश करात फासीवाद की वर्गीय व्याख्या के मंत्र का जाप करते हुए नित नये विश्लेषणों के साथ हाजिर दिखाई देते हैं और वर्तमान परिस्थिति में पार्टी अपनी भूमिका सही रूप में अदा कर सके उसके रास्ते में रोड़ा बन कर खड़े हो जाते हैं।

जिस काल में 'सम-दुरत्व' के सिद्धांत की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है, उसी समय सीपीएम के बहुमतवादी वर्गीय विश्लेषण के नाम पर, ज्ञान के सोपान के सबसे प्रथम स्तर के अपने मंत्रों का जाप शुरू कर देते हैं। अगर इस प्रकार के मंत्र जाप को ही विचारधारा मान लिया जाए तब आप कह सकते हैं कि वर्गीय विश्लेषण की दृष्टि से कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है। लेकिन अगर मंत्र जाप कोरे कर्मकांड का निमित्त न बने, बल्कि वाम की अपनी सीमाओं से मुक्ति का एक सोपान बने जो जीवन के बहुविध गतिशील यथार्थ को आत्मसात करने की उसे शक्ति दे सके ताकि वह जनता के जनवाद के अपने लक्ष्य को साध सके, अपनी सारी आत्मगत रूढ़ियों का अंत कर सके, तो बात सिर्फ ऐसे आप्त कथनों तक ही सीमित नहीं रह सकती है।

कहना न होगा, सीपीएम का बहुमतवादी हिस्सा अभी भी वास्तव में मंत्र जाप, पूजा, धूप, नैवेद्य के कर्मकांडी स्तर पर ही अटका हुआ उन्हें ही अपनी निर्विकल्पता माने हुए है। इसीलिये वह यथार्थ की तरलता को आत्मसात करके उसमें अपने को स्थित करने में असमर्थ साबित हो रहा है। तथाकथित वर्ग-विश्लेषण की अपनी मनोरूढ़ि का शिकार बन कर वह उसी प्रकार किंकर्त्तव्यविमूढ़ है जैसे विकल्पों के पाश से आबद्ध कोई भी जीव हुआ करता है। प्रकाश करात पिछले दिनों मोदी-आरएसएस-भाजपा के बारे में विश्लेषण में जिस प्रकार की दुविधाग्रस्त स्थिति में फंसे हुए बार-बार दिखाई देते रहे हैं, उसकी इसके अलावा दूसरी कोई व्याख्या नहीं हो सकती है।

6 सितंबर 2016 के 'इंडियन एक्सप्रेस' में उन्होंने इनके बारे में लिखा था — “ आज के भारत में हिंदुत्व की विचारधारा और अंध-राष्ट्रवाद सांप्रदायिक आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण कर रहा है और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले करता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाने के लिये बर्बर तरीकों का प्रयोग करता है ; भिन्न मत और धर्म-निरपेक्ष बुद्धिजीवियों को राष्ट्र-विरोधी बता कर उनका दमन करता है।...

“ये तमाम चीजें जहां जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता के लिये खतरा पैदा करती है, वहीं इन्हें खुद में फासीवादी व्यवस्था का घटक नहीं कहा जा सकता है।“

प्रकाश करात के इस वक्तव्य पर वाम हलकों में ही तब व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी।

आज वे प्रकाश करात ही, पश्चिम बंगाल में एक सेमिनार के लिये भेजे गये अपने हाल के आलेख में लिखते हैं कि “मोदी शासन और अल्पसंख्यकों तथा बुद्धिजीवियों पर उसके फासीवादी प्रकार के हमलों ने जनतंत्र और धर्म-निरपेक्षता के लिये गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। हमें नव-उदारवादी नीतियों और हिंदुत्व की ताकतों के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ने की उचित कार्यनीति अपनानी होगी।“ (कार्ल मार्क्स के जन्म की  द्विशताब्दी, 'पूंजी' के डेढ़ सौ वर्ष और नवंबर क्रांति की शताब्दी के मौके पर कोलकाता में आयोज्य सेमिनार के लिये प्रकाश करात का आलेख)

'फासीवादी प्रकार के' हमलों का जिक्र करके फिर वही पुरानी 'सम-दुरत्व' की नीति का जाप करते हुए 'उचित कार्यनीति' के विषय को अमूर्त रख कर ही वे मौन हो जाते हैं। उनके पास इस 'उचित कार्यवाही' का कोई ठोस आकार नहीं होता है। सीपीएम के बहुमतवादी क्रांतिकारियों की यही वह दुविधा है, जिसने इस पूरी पार्टी को जकड़ कर पंगु बना कर छोड़ दिया है।

इसीलिये सीपीआई(एम) के इस पोलिट ब्यूरो की बैठक में 2018 के अप्रैल महीने में होने वाली पार्टी कांग्रेस के लिये प्रस्ताव का कोई सर्व-सम्मत मसौदा तैयार नहीं हो पाया है।   संभवतः आगामी पार्टी कांग्रेस में इस बार बहस के लिये दो समानांतर प्रस्ताव पेश किये जायेंगे।

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