कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को अपने मंच पर बुलाना, संघ की एक खास बेचैनी और बदहवासी का द्योतक

अय्याश राजा का प्रजा-विरोधी निर्दयी और दमनकारी रूप अब क्रमश: साफ तौर पर निकलने लगा है। विपक्ष से मुकाबले के लिये भी इसके पास राजसत्ता के द्वारा दमन के अलावा कोई उपाय नहीं रह गया है...

संघ की राजनीति की जो दुर्दशा है, उससे उबर पाना अब संघ के लिये आसान नहीं

अरुण माहेश्वरी

आज के ‘राष्ट्रीय सहारा’ में आरएसएस के मुख्यालय पर प्रणब मुखर्जी के जाने के विषय में जगदीश्वर चतुर्वेदी का एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसे उन्होंने फेसबुक की अपनी वाल पर साझा किया है । उसी वाल पर हमने लेख पर एक छोटी सी टिप्पणी की है, जिसे हम यहां मित्रों से साझा कर रहे है :

“आपका लेख ध्यान से पढ़ गया ।वर्तमान समय में संघ के मंच पर प्रणब मुखर्जी का जाना जहां अनेक सवाल पैदा करता है, वहीं संघ के मंच पर उन्हें बुलाये जाने को लेकर भी मन में कम उत्सुकता नहीं है। आज संघ भारत की सर्वोच्च सत्ता का संचालन कर रहा है। अपने तरीके से हिंदू पादशाही की अपनी कल्पना के ढांचे में आधुनिक फासीवाद की परिकल्पना पर वह यथासंभव काम कर रहा है। उसने मोदी के रूप में ईश्वर-समान एक राजा भी गढ़ लिया है। लेकिन अभी चार साल बीते हैं, और यह साफ दिखाई देने लगा है कि राजा के पास देने के लिये कुछ नहीं है, सिवाय अपने नोटबंदी सरीखे सनकीपन के। और चुनौती-विहीन परिस्थितियों ने इस ‘विकासमान साम्राज्य’ के महलों को कोरी अय्याशियों, सैर-सपाटों का अड्डा बना दिया है। इसके सारे अंग अभी से शिथिल होने लगे हैं और अय्याश राजा का प्रजा-विरोधी निर्दयी और दमनकारी रूप अब क्रमश: साफ तौर पर निकलने लगा है। विपक्ष से मुकाबले के लिये भी इसके पास राजसत्ता के द्वारा दमन के अलावा कोई उपाय नहीं रह गया है।

राजनीतिक स्तर पर भी मोदी के अकेले बहुमत ने उसे अपने गठबंधन के अन्य सहयोगियों से व्यवहार के मामले में अक्षम बना दिया है। विकासमान शरीर का हर वह अंग कमजोर रह जाता है जिस पर कोई दबाव नहीं होता है। इस प्रकार फासीवाद की पराजित विचारधारा और उसे धारण कर रही राजनीतिक काया के अंगों की बढ़ती हुई पंगुता के योग से संघ की राजनीति की जो दुर्दशा साफ दिखाई देने लगी है, उससे उबर पाना अब संघ के लिये आसान नहीं रह गया है। आगामी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मोदी की पराजय, जिसे टाल पाना मोदी की दुर्बलताओं के देखते हुए असंभव है, संघ की अलौकिक शक्ति के तिलिस्म को तार-तार कर देगा। और यहीं से संघ का सच तेजी से निश्चित ढलान पर लुढ़कते सच के अलावा कुछ नहीं रह जायेगा।

इसीलिये, सत्ता के अपने शीर्ष-काल में, संघ का एक घुटे हुए कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी को अपने मंच पर बुलाना, उसकी एक खास बेचैनी और बदहवासी का द्योतक भी है। संघ की राजनीति के पतन के इस नये अध्याय में प्रणब मुखर्जी की उपस्थिति या भाषण उनके लिये कितना सहयोगी साबित होंगे, उसमें गहरा संगेह है क्योंकि इसी प्रक्रिया में संघ के आत्म-संहार के बीज भी छिपे हुए हैं। उस ओर बढ़ने के पहले वे अपनी विचारधारा के अन्य सभी जहरीले ब्रह्मास्त्रों को आजमाने से नहीं चूकेंगे। लेकिन आज के समय में प्रणब मुखर्जी को बुलाना बताता है कि आरएसएस का नेतृत्व आगत अशनि संकेतों को देख पा रहा है।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।