सभ्यता का संकट : फर्जी तानाशाह बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन मनुस्मृति राजनीति की सोशल इंजीनियरिंग है

बहुजनों की आस्था, उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्ता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है...

हाइलाइट्स

मैं अछूत हूं, मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है

मैं अछूत हूं, मेरी कोई जाति नहीं है!..

भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था, उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्तता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है। जिससे इन आंदोलनों के मार्फत दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नियंत्रण में रखकर मनुस्मृति राज बहाल किया जाये और बहुजनों के सामुदायिक जीवन और साझा संस्कृति की विरासत और उनके मनुष्यता के धर्म का हिंदुत्वकरण कर दिया जाये।

 

रवींद्र का दलित विमर्श-15

पलाश विश्वास

बंगाल के नबाव के दरबारी दो पूर्वज गोमांस की गंध सूंघने का आरोप में मुसलमान बना दिये गये थे तो रवींद्र के पूर्वज अछूत पीराली ब्राह्मण बन गये थे।

नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले सामाजिक बहिष्कार की वजह से अपने बचपन की अस्पृश्यता यंत्रणा पर उन्होंने कोई दलित आत्मकथा नहीं लिखी लेकिन उनकी स्मृतियों में इस अस्पृश्यता का दंश है।

नोबेल पुरस्कार पाने के बावजूद हिंदुत्व के पवित्र धर्मस्थलों में उनका प्रवेशाधिकार निषिद्ध रहा है।

ब्रहामसमाजी टैगोर परिवार जमींदारी और कारोबार के तहत कोलकाता में प्रतिष्ठित थे लेकिन भद्रलोक समाज से बहिष्कृत थे।

गीताजंलि में इसीलिए उनका अंतरतम लालन फकीर का मनेर मानुष और उनका प्राणेर मानुष है और दैवी शक्ति की आराधना के बजाय विश्वमानव के अंत-स्थल में वे अपने ईश्वर को खोज रहे थे।

अस्पृश्यता के इसी दंश के चलते कोलकाता का जोड़ासांको छोड़कर वीरभूम के आदिवासी गांवों में उन्होंने शांतिनिकेतन को अपनी कर्मभूमि बनाया उसी तरह जैसे नव जागरण के मसीहा ईश्वर चंद्र विद्यासागर कोलकाता, भद्रलोक समाज और अपने परिजनों को भी छोड़कर आदिवासी गांव में अपना अंतिम जीवन बिताया।

आदिवासी के अनार्य द्रविड़ सामुदायिक जीवन के लोकतंत्र को दोनों ने जीवन का उत्सव मान लिया और उसीमें समाहित हो गये।

भविष्यदृष्टा रवींद्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि में जो लिखा वहीं नियति के साथ भारत का साक्षात्कार है और ये पंक्तियां भारत में सभ्यता के संकट की निर्मम अभिव्यक्ति हैं-

हे मोर दुर्भागा देश, जादेर कोरेछो अपमान

अपमाने होते हबे ताहादेर सबार समान

मानुषेर परशेरे प्रतिदिन ठेकाइया दूरे

घृणा करियाछो तुमि मानुषेर प्राणेर ठाकुरे

(ओ मेरे अभागा देश, जिनका तुमने किया है अपमान

अपमान में ही होना होगा उन्हीं के समान

मनुष्य के स्पर्श को प्रतिदिन तुमने ठुकराया है

तुमने घृणा की है मनुष्य के प्राण में बसे ईश्वर से)

इसी तरह उन्होंने 1936 में पत्रपुट कवितासंग्रह के 15वीं कविता में लिखाः

आमि व्रात्य, आमि मंत्रहीन,

देवतार बंदीशालाय

आमार नैवेद्य पौंचालो ना!..

हे महान पुरुष, धन्य आमि, देखेछि तोमाके

             तामसेर परपार होते

  आमि व्रात्य, आमि जातिहारा

  (मैं अछूत हूं, मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है

  देवता के बंदीगृह में

  मैरा नैवेद्य पहुंचा नहीं!..

हे महान पुरुष, मैं धन्यहूं, मैंने तुम्हें देखा है

 अंधकार के दूसरे छोर से

 मैं अछूत हूं, मेरी कोई जाति नहीं है!..

नस्ली राष्ट्रवाद के फासीवादी चरित्र रवींद्र समय की युद्ध विध्वस्त पृथ्वी का ही सच नहीं है, यह दरअसल भारत का ज्वलंत सामाजिक यथार्थ का निरंतर समयप्रवाह है।

भारत में अस्पृश्यता की मनुस्मृति व्यवस्था रंगभेदी फासीवाद से अलग नहीं है और यही भारत की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है जो असमानता और अन्याय की निरंकुश नरसंहार संस्कृति भी है। यही फासिज्म का राजकाज, सभ्यता का संकट है।

भारत में ब्रिटिश राजकाज के दौरान मनुस्मृति के तहत निषिद्ध अधिकारों से वंचित बहुजन समाज को लगता था कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने पर भारत में फिर सत्ता ब्राह्मणतांत्रिक वर्ण वर्ग वर्चस्व की हो जायेगी तो रवींद्र नाथ अपनी मृत्यु से पहले अंग्रेजों के भारत छोड़ जाने के से पहले इस नस्ली राष्ट्रवाद के हिंदुत्व अभ्युत्थान की आशंका से बेहद चिंतित थे, जिसकी हम चर्चा कर चुके हैं।

सभ्यता का संकट शीर्षक उनके मृत्युपूर्व आलेख में भारत में सत्ता हस्तांतरण के बाद मनुष्यता के संकट में भारत के विखंडन की उन्होंने विस्तार से चर्चा की है।

भारत विभाजन की त्रासदी में अखंड भारत और विखंडित भारत में हिंसा और घृणा का सिलसिला अभी जारी है और यही हिंसा और घृणा की संस्कृति ही भारत में सत्ता की राजनीति है, जिसके शिकार दलित, पिछड़े, मुसलमान और तमाम विधर्मी लोग, अनार्य द्रविड़ और दूसरे अनार्य जनसमुदाय, आदिवासी और मजबूत होती पितृसत्ता के शिकंजे में फंसी स्त्री, तमाम मेहनतकश लोग, किसान और मजदूर हैं।

रवींद्र नाथ ने भारतीय जनता के सामाजिक जीवन को धार्मिक माना है और इस धर्म को उन्होंने मनुष्यता का धर्म माना है जो सत्ता वर्ग के रंगभेदी अस्मिता आधारित विशुद्धता का नस्ली धर्म नहीं है।

वे अंत्यज अछूत और बहुजनों की आस्था और बहुजन समाज की बात ही कर रहे थे। वे आस्था की स्वतंत्रता और आस्था के लोकतंत्र की बात कर रहे थे।

सत्ता हस्तांतरण के बाद सत्ता के वर्ग वर्ण वर्चस्व के लिए बहुजनों के राजनीतिक सामाजिक धार्मिक आर्थिक विघटन बिखराव विस्थापन दमन उत्पीड़न का सबसे भयंकर सच अगर शरणार्थी समस्या और आदिवासियों का सफाया अभियान है तो बहुजन राजनीति और धर्म आस्था में भी सत्ता नियंत्रित बाबा बाबियों के अभ्युत्थान मार्फत हिंदुत्व का यह पुनरुत्थान उत्सव है।

बहुजन राजनीति भी बहुजनों के सामुदायिक जीवनयापन और साझा विरासत की संस्कृति के विरुद्ध यही बाबा बाबी संस्कृति में निष्णात है और इसी वजह से सत्ता का वर्ग वर्ण वर्चस्व निरंकुश ब्राह्मणतंत्र में निष्णात है, जिसकी आशंका बहुजन पुरखों मसलन महात्मा ज्योतिबा फूले और गुरुचांद ठाकुर के साथ-साथ पीराली अछूत ब्राह्मण ब्रह्मसमाजी कवि रवींद्रनाथ को थी।

गौरतलब है कि सत्ता वर्ग के तमाम संगठन और उनकी रंगभेदी नस्ली फासीवादी राजनीति संस्थागत है और वही संगठित राष्ट्र व्यवस्था का पर्याय है तो बहुजन समाज में संस्थागत संगठन के विघटन और बिखराव के तहत धार्मिक राजनीतिक बाबा बाबियों को खड़ा करके, उन्हें कठपुतलियां बनाकर बहुजन समाज को गुलाम बनाये रखने का खेल ही अस्मिता निर्भर धर्मांध अंध राष्ट्रवादी राजनीतिक वर्चस्व का समीकरण है।

इन्हें स्थापित करने, इनके महिमामंडन करने में यही राजनीति काम करती है और फिर रस्म अदायगी के बाद इन्हीं प्रतिमाओं का सार्वजनिक विसर्जन का रिवाज है। समूचा प्रचारतंत्र महिमामंडन, प्राण प्रतिष्ठा और विसर्जन उत्सव में लगा रहता है। विसर्जन के समयभी ढोल नगाड़े पीटने का सार्वजनिक विजयोत्सव का महिषासुर वध है। यही कुल मिलाकर भारत में समता, न्याय और कानून का राज है।

धर्म और राजनीति में सत्ता समर्थित तमाम महानायकों महानायिकाओं और बाबा बाबियों के प्रकरण में यही वैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है।

पवित्र धर्मस्थलों और संस्थागत धार्मिक संस्थानों में प्रवेशाधिकार वंचित जनसमुदाओं की आस्था और सामुदायिक जीवन के साथ साथ समान मताधिकार के लोकतंत्र में वंचित दलित बहुजन जनसमुदायों के लिए तमाम डेरे, मठ और ऐसे ही वैकल्पिक धार्मिक संगठन, पंथ उनकी राजनीतिक ताकत के आधार भी हैं, जिसका नियंत्रण आजादी से पहले उन्हीं के हाथों में हुआ करता था और यही उनकी राजनीतिक धार्मिक स्वायत्तता का आधार था।

बंगाल का मतुआ और कर्नाटक का लिंगायत धर्म इसके उदाहरण हैं तो पंजाब में सिख समाज के सत्ता वर्गीय अकालियों के मुकाबले यही फिर डेरा संस्कृति है तो बाकी देश में तमाम मठ और बाबा बाबियों के अखाड़े इसीतरह के वैकल्पिक परिसर हैं।

बंगाल में मतुआ धर्म ब्राह्मण धर्म के खिलाफ बहुजनों का चंडाल आंदोलन रहा है तो कर्नाटक में लिंगायत आंदोलन बहुजनों का ब्राह्णधर्म के खिलाफ सामाजिक सशक्तीकरण आंदोलन रहा है।

जैसे तमिलनाडु का ब्राह्मणधर्म संस्कृति विरोधी द्रविड़ आंदोलन।

देशभर में बंगला के चैतन्य महाप्रभू और पंजाब के गुरुनानक के सुधार आंदोलनों के तहत सामंती दैवी सत्ता के विरुद्ध मनुष्यता के धर्म के तहत साधुओं, संतों, पीर, फकीरों, बाउलों और समाज सुधारकों के ये आंदोलन बहुजन पुरखों के नेतृत्व में बहुजनों के राजनीतिक धार्मिक स्वयायत्ता के आंदोलन रहे हैं।

इनमें आदिवासी धर्म और राजनीति के स्वायत्तता आंदोलन और आदिवासी किसान जनविद्रोह की परंपरा भी है, जो सामंती और साम्राज्यवादी सत्ता के साथ साथ ब्राह्मणतंत्र के नस्ली वर्चस्व और मनुस्मृति विधान की असमानता और अन्याय के विरुद्ध थे।

भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था, उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्ता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है।

जिससे इन आंदोलनों के मार्फत दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नियंत्रण में रखा जाये और बहुजनों के सामुदायिक जीवन और साझा संस्कृति की विरासत और उनके मनुष्यता के धर्म का हिंदुत्वकरण कर दिया जाये।

इसी राजनीति के तहत अकाली अब पूरी तरह संघ परिवार के शाखा संगठन में तब्दील हैं तो महात्मा गौतम बुद्ध, महात्मा महावीर, गुरुनानक, महात्मा ज्योतिबा फूले, बाबासाहेब भीमारव अंबेडकर, नारायण स्वामी, हरिचांद गुरुचांद, अयंकाली, पेरियार से लेकर मान्यव कांशीराम के तमाम आंदोलनों का हिंदुत्वकरण उसी तरह हो गया जैसे कि तमाम मठों, जिनमें गोरखपुर का मठ भी शामिल है, तमाम डेरों, मतुआ, लिंगायत और द्रविड़ आंदोलनों का हिंदुत्वकरण हुआ है और इससे बीरसा मुंडा का आंदोलन भी अछूता नहीं है।

फर्जी तानाशाह बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन सत्ता राजनीति का सोशल इंजीनियरिंग है।

हमारे बेहद प्रिय युवा मित्र अभिषेक श्रीवास्तव ने राम रहीम प्रकरण पर फेसबुक पर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, जिस पर अलग से चर्चा करने की जरूरत थी। भारत की परिकल्पना ही दरअसल रवींद्र का दलित विमर्श है

लोक और जनपदों में रचे बसे भारत में बहुलता, विविधता, सहिष्णुता के लोकतंत्र में मनुष्यों की आस्था और धर्म, खासतौर पर सामंती वर्ण वर्ग वर्चस्वी सत्ता वर्ग के संरक्षित परिसर से बहिष्कृत और अछूत अंत्यज बहुजन समाज के सामाजिक यथार्थ के सिलसिले में आस्था और धर्म के अधिकार से वंचित समुदाओं का सच ही भारत में बहुजन आंदोलन के बिखराव और राजनीति में सवर्ण राजनीति के हित में प्रायोजित दूल्हा दुल्हन बारात संस्कृति को समझने के लिए अभिषेक का यह मंतव्य गौरतलब है।

अभिषेक ने लिखा हैः

इन तमाम बाबाओं के अपने-अपने पंथ हैं। ये पंथ हिंदू धर्म में बहुलता का बायस रहे हैं। द्वैतवाद, अद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, गोरख, कबीर, नानक, सूफ़ी, सांख्‍य, अघोर... गिनते जाइए। जितनी शाखाएं, उतने बाबा। ये रंग-बिरंगे पंथ हिंदू धर्म को मोनोलिथ यानी एकांगी नहीं बनने देते। जो जनता इन पंथों के बाबाओं की भक्‍त है, वह स्ट्रिक्‍टली वैष्‍णव या शैव नहीं है। उसकी धार्मिक आस्‍थाओं में राम-कृष्‍ण या अन्‍य अवतार उस तरह से नहीं आते जैसे एक सामान्‍य शहरी सवर्ण हिंदू के मानस में रचे-बसे होते हैं। इसीलिए इन पंथों के बाबा लोग भले पंथ के नाम पर राजनीति करते हों, लेकिन इनके सामान्‍य गंवई निम्‍नवर्गीय अवर्ण भक्‍त कर्मकांड के ऊपर व्‍यक्तिगत आचरण को जगह देते हैं। सौ में दस भले हिंसा करते हैं लेकिन बाकी नब्‍बे ऐसी घटनाओं के बाद टूट जाते हैं।

मुझे लगता है कि हिंदू धर्म के एकांगी बनने की राह में जो आस्‍थाएं रोड़ा हैं, वे ही आरएसएस के निशाने पर हैं। निशाने का मतलब गलत न समझिएगा। पंथ-प्रधान का भ्रष्‍ट होना एक सामान्‍य बात है लेकिन उन्‍हीं पंथ-प्रधानों को कुकृत्‍यों की सज़ा मिलना बेशक एक स्‍कीम का हिस्‍सा हो सकता है जो आरएसएस की वैचारिकी में फिट नहीं बैठते। जो लोग दो दिन से डिमांड कर रहे हैं कि ऐसे तमाम बाबाओं की नकेल कसी जाए, वे शायद व्‍यापक तस्वीर को मिस कर रहे हैं। आप चेहरों को भूल जाइए, तो उनके पीछे के तमाम पंथ दरअसल आरएसएस का एंटीडोट हैं/थे/होने की क्षमता रखते हैं। मैं इसमें गोरक्षनाथ मठ की परंपरा को भी गिनता हूं। रामदेव और रविशंकर सरीखे तो सरेंडर किए हुए धार्मिक कारोबारी हैं, वे इस नैरेटिव में नहीं आते। 

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