रविश कुमार की ‘विश्वविद्यालय श्रृंखला’ : यही है डिजिटल युग और डिजिटल डिवाइड का सच

सांप्रदायिक-जातिवादी पूर्वाग्रहों से ग्रसित एक पिछड़े हुए समाज में विश्वविद्यालयों से इससे ज्यादा की शायद उम्मीद नहीं की जा सकती है। हमारे विश्वविद्यालय हमारे समाज की वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक ......

हाइलाइट्स

रविश के कार्यक्रम से यदि मर्म की कोई बात लेनी है तो हमारे अनुसार सिर्फ यही हो सकती है। सांप्रदायिक-जातिवादी पूर्वाग्रहों से ग्रसित एक पिछड़े हुए समाज में विश्वविद्यालयों से इससे ज्यादा की शायद उम्मीद नहीं की जा सकती है।

रविश कुमार की ‘विश्वविद्यालय श्रृंखला’ और आज के काल में ‘शिक्षा’ पर एक मंतव्य

-अरुण माहेश्वरी

रविश कुमार की विश्वविद्यालय श्रृंखला से जो एक सीधा सवाल उठता है, वह यह कि अगर हमारे आधुनिक शिक्षण संस्थानों की यह दशा है तो क्या यह मान लिया जाए कि हमारी नई पीढ़ी के लिये ज्ञान, अर्थात आत्म-विस्तार का कोई अर्थ नहीं रह गया है। इस दिशा में उसके सारे मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं।

क्या हम इस नतीजे पर पहुंच जाएँ कि आज के भारत के नौजवानों ने जानने-समझने की, जिज्ञासा की मनुष्य की प्राणी-सत्ता से जुड़ी नैसर्गिकता को गँवा दिया है। अब उसके पास ‘हिंदू-मुस्लिम करने’ के अलावा, अर्थात पशु की तरह विवेक से शून्य ग़ुलामों के झुंड में जीने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह गया है।

खुद रविश के कार्यक्रम में ही विश्वविद्यालयों की इस दयनीय दशा से पीड़ित जितने छात्रों से साक्षात्कार दिखाए गये हैं, वे ही यह बताने के लिये काफी है कि हमारे विश्वविद्यालयों की दशा कुछ भी क्यों न हो, हमारी नौजवान पीढ़ी में न सिर्फ ज्ञान की पिपासा का, बल्कि अपने भविष्य और अपने अधिकारों के प्रति चेतना का उतना अभाव नहीं है, जितना समझा जा रहा है। वह समस्याओं को, शासन की नाकामियों और उसके भ्रष्टाचार को बख़ूबी समझ रही है और बहुत ही सुचिंतित ढंग से उन पर अपनी राय को रखने में समर्थ भी है।

यह सच हम सिर्फ रविश के कार्यक्रम में आने वाले छात्रों के स्तर के आधार पर ही नहीं, अपने जीवन के ठोस अनुभवों से भी जानते हैं कि आज सुदूर क़स्बों और गाँवों तक में रहने वाला नौजवान तमाम प्रकार के भटकावों, ‘हिंदू-मुस्लिमपने’ के बीच भी विगत पीढ़ियों के औसत बौद्धिक स्तर से किसी भी मायने में कम नहीं, बल्कि काफी आगे दिखाई देता है। उसके पास न सूचनाओं का अभाव है और न चेतना का। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद, वर्गों में बँटे समाज का सच इस मामले में भी किसी न किसी रूप में जाहिर होता ही है।

इसीलिये सवाल उठता है कि एक ओर पीढ़ियों को निर्मित करने वाले इन कथित विश्वविद्यालय-नुमा कारख़ानों की यह जर्जर स्थिति और दूसरी ओर तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी नई पीढ़ी की अदम्य ज्ञान-पिपासा और उद्यमशीलता का बने रहना - इन दो समानांतर परस्पर-विरोधी सच के सह-अस्तित्व का रहस्य क्या है ?

यह छोटा सा सवाल ही हमें सबसे पहले जीवन की लगातार बदलती हुई कुछ ऐसी ठोस वास्तविकताओं की ओर ले जाती है जो फिर एक बार गोर्की के विश्वविद्यालयों की तरह शायद कहती है कि व्यक्ति के जीवन के असली विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटियों के कैम्पस नहीं, उनके बाहर का व्यापक संसार ही हुआ करता है। इस प्रकार की एक लफ्फाजी की तरह की बात को दोहराने का मायने यह नहीं है कि हम औपचारिक शिक्षा की भूमिका से इंकार करके उसके प्रति राज्य की अपराधपूर्ण उदासीनता की पैरवी की ज़मीन तैयार कर रहे हैं। लेकिन हम जीवन के एक ऐसे बदलाव की ओर इशारा करना चाहते हैं जो सिर्फ जीवन को अर्थात अनौपचारिक शिक्षा की दुनिया को ही नहीं बदला है, यह अंदर, औपचारिक शिक्षा के दायरे को भी समान रूप से प्रभावित कर रहा है।

यह तथ्य कल्पना से परे है कि तीन कमरों में सात हज़ार छात्रों का एक विश्वविद्यालय चल रहा है जहाँ प्रत्येक शिक्षक पर लगभग तीन सौ छात्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी है। अध्यापक भी स्वीकृति-प्राप्त अध्यापक नहीं, मामूली वेतन पर खाना-पूर्ति का काम करने वाला ‘अतिथि’ है। न कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर है और न दूसरी कोई व्यवस्था। छात्र की दिलचस्पी भर्ती होकर डिग्री लेने भर में होती है।

विद्यार्थियों और पूरे समाज के जीवन में अनैतिकता के इस सर्व-स्वीकृत, अर्थात नैतिक विधान की इसके अलावा दूसरी कोई व्याख्या नहीं मिलती है कि विश्वविद्यालयों की आज की सूरतें, जिनके अभी बदलने के कोई ऐसार नहीं दिखाई देता हैं, उन्हें अगर हमें विचार का विषय बनाना है तो शायद हमें ही इस मसले को देखने के अपने परिप्रेक्ष्य को बदलना होगा। अन्यथा, हम सिवाय सर पीटने के, रविश के शब्दों में, मूक-बधिर दर्शक की तरह श्राद्ध की पूड़ियाँ खाने के अलावा और कुछ भी करने-समझने लायक नहीं रहेंगे।

यही है डिजिटल युग और डिजिटल डिवाइड का सच

सोचने की बात यह है कि असल में जीवन में ऐसा बदला क्या है, जिसके कारण हमारे जीवन के ऐसे सारे परंपरागत ठोस सांस्थानिक स्वरूपों का ढाँचा चरमराते हुए भी किसी न किसी रूप में ‘चलता हुआ’ और ‘न चलता हुआ’ भी जान पड़ता है।

पुस्तकालयों के जर्जर हालात है, इनमें सुधार असंभव है, लेकिन विद्यार्थी जितना परीक्षा-केंद्रित होकर हमेशा की तरह परीक्षा मात्र के लिये जुगत भिड़ाते या सिर्फ रटते हुए दिखाई देते हैं, उतने ही कुशाग्र और अधिकार-चेतना से संपन्न भी जान पड़ते हैं।

दरअसल, यही है डिजिटल युग और डिजिटल डिवाइड का सच। आदमी के आत्म-जगत से जुड़े ज्ञान के अमूर्त क्षेत्र से इस डिजिटल दुनिया का सहज संबंध जहाँ शिक्षा के क्षेत्र के वर्तमान ठोस रूपों को एक हद तक बेमाने बना रही है, वहीं समाज का यह डिजिटल विभाजन ठोस शैक्षणिक संस्थाओं के पतन को डिजिटल तौर पर वंचित जनों में मर चुकी शिक्षा की क़ब्रों की अनुभूति भी पैदा करता है।

आज की सचाई यह है कि अकेले गूगल बुक्स ने लगभग अढ़ाई करोड़ किताबों का डिजिटलाइजेशन कर लिया है। एक अनुमान के अनुसार चीन में सन् 200 और यूरोप में सन् 1400 ईस्वीं से लेकर आज तक दुनिया में जितनी भी किताबें छपी है, उस विशाल ख़ज़ाने के तक़रीबन 5 प्रतिशत का अब तक डिजिटलाइजेशन हो चुका है। इस प्रकार, दुनिया का कितना साहित्य, कितने प्रकार के विषयों के पाठ, उनकी टीकाएँ, व्याख्याएँ और उनसे जुड़ी शैक्षणिक सामग्रियों का कितना बड़ा ज़ख़ीरा डिजिटल स्वरूप में इसी बीच तैयार हो चुका है, इसकी कल्पना करके ही किसी को भी सिहरन हो सकती है।

कहना न होगा, जीवन के दूसरे किसी भी क्षेत्र की तुलना में, शिक्षा के क्षेत्र को ज्ञान का यह डिजिटल भंडार कितना ज्यादा प्रभावित कर रहा होगा, इसे अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है। हमें तो यह ज्ञान के अनंत विस्तार की अतल गहराइयों तक ले जाने वाली उन अनोखी सुरंगों के संजाल की तरह प्रतीत होता है, जहां तक पहुँचने के लिये पहले कभी एक जीवन नहीं, सहस्त्र वर्षों की ज्ञान-साधना भी कम पड़ती थी। इससे ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के समग्र योग का एक ऐसा क्षेत्र तैयार हो रहा है जिसमें कोई भी पाठ अब स्वयं में एक अलग-थलग स्वायत्त द्वीप नहीं रह गया है।

आज पाठों का बहुविध अध्ययन सिर्फ सिद्धांत का विषय नहीं है कि अभिनवगुप्त ने कह दिया, गुरुमंत्रों के आणव योग से आगे बढ़ कर समस्त विश्व के ज्ञान से शक्ति ग्रहण करने के स्वतंत्र चिंतन के बल पर शाक्त योग और फिर मानव कल्याण में नियोजित शांभव योग की ओर बढ़ना ही अपने को अज्ञान के पाशों से मुक्त करके रचनाशीलता के स्फुरण की दिशा में बढ़ना है। आज यह एक सहज साध्य जैविक सत्य का रूप लेता जा रहा है।

ऐसे में सचमुच जब हम विश्वविद्यालयों के अध्यापकों को अपने बेहद सीमित ज्ञान के साथ खुद को ही बार-बार दोहराते हए देखते हैं तो हमें संदेह होने लगता है कि ऐसे अध्यापकों की देख-रेख में किसी स्वतंत्र मस्तिष्क का विकास क्या कभी भी संभव है। ऐसे में पारंपरिक विश्वविद्यालय अपनी सात्विकता और आंतरिक संरचना में ही कूढ़मगज दिमाग़ों की फ़ैक्टरी दिखाई देने लगती है जो आज शासन के और भी अधिक शिक्षा-विरोधी रुख़ के कारण जैसे तेजी के साथ अपनी असली गति को प्राप्त कर रहे हैं।

आज के विश्वविद्यालयों में अध्यापक के सामने मोबाइल फोन से लैस विद्यार्थी होता है। वह कूढ़मगज अध्यापक को फटी आँखों से देखता है और उस पर हँसता भी है। गुरु-शिष्य के रिश्तों की पवित्रता की चमक ख़त्म होती जा रही है। इसीलिये विश्वविद्यालय ज्ञान के आदान-प्रदान की उपयोगिता को खो कर, आपसी लेन-देन, नंबर बढ़ाने-घटाने और नियुक्तियों में धाँधली के केंद्र में तब्दील हो जा रहे हैं।

यह स्थिति तब तक वैसी ही रहेगी, जब तक विश्वविद्यालयों का परिवेश स्वतंत्र ज्ञान और समाज चर्चा की सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराते हैं, वे बहुविध जीवन पर साधा विचार के केंद्रों के तौर पर विकसित वहीं होते है। बहु-विधाता आज की ज्ञान-मीमांसा का प्रमुख नारा है। अभिनवगुप्त ने हज़ार साल पहले जो कहा था कि विमर्श की दृढ़ता ही पूजा है, उसमें वैविध्य का तत्व उसके मूल में था। “पूजा नाम विभिन्नस्य भावो धस्यापि संगति:/ स्वतंत्र विमलानन्त भैरवीय चिदात्मना।” इसकी एक झलक हमें जेएनयू की तरह के भारत के विश्वविद्यालय में देखने को मिलती है। लेकिन जब शासन ही कूढ़ मगज लोगों के हाथ में होगा तो वे विश्वविद्यालयों की इमारतों को चमका कर भी उन्हें शिक्षा के प्रकाश को फैलाने वाले केंद्रों का रूप नहीं दे सकते हैं। क्योंकि वे विजय और समग्रता के बारे में चिंतित हैं, न कि बहुलता और वैविध्य के बारे में। जबकि यह बहुलता और वैविध्य को साधने का सूत्र ही स्वतंत्र मस्तिष्कों के विकास का प्रमुख सूत्र है।

मुख़्तसर में, हमारे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि हमारे विश्वविद्यालय हमारे समाज की वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की ही उपज हैं। हम पूड़ी खाये या रसगुल्ला खायें, आधुनिक जनतांत्रिक समय के तक़ाज़े कुछ और हैं और हमारे आज के शासकों के इरादे बिल्कुल उनके विपरीत, कुछ और। जब तक इनका राज रहेगा, विश्वविद्यालयों के पारंपरिक सांस्थानिक स्वरूप में परिवर्तन की कोई संभावना पैदा नहीं हो सकती है।

रविश के कार्यक्रम से यदि मर्म की कोई बात लेनी है तो हमारे अनुसार सिर्फ यही हो सकती है। सांप्रदायिक-जातिवादी पूर्वाग्रहों से ग्रसित एक पिछड़े हुए समाज में विश्वविद्यालयों से इससे ज्यादा की शायद उम्मीद नहीं की जा सकती है।

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