देश की एकता के लिए ख़तरा है धर्म आधारित राजनीति

मोदी ने देश की एकता के लिए ज़रूरी धार्मिक सहिष्णुता की जो बात कही है वास्तव में वही संविधान की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा है। यह अलग बात है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता धर्मनिरपेक्षता की निंदा करते रहे ...

हाइलाइट्स

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमतवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन उनको ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती। अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये।

 

शेष नारायण सिंह

सिरसा के गुरमीत राम रहीम को पंचकुला की विशेष सी बी आई अदालत ने बलात्कार का दोषी माना है। अदालत के फैसले के आने के तुरंत बाद उसके चेलों ने पंचकुला में तबाही मचाने का काम शुरू कर दिया। लूट,हत्या, आगजनी की वारदात को बेख़ौफ़ होकर अंजाम दिया। शुरू में समझ में नहीं आया कि जब सरकार को पहले से मालूम था और हज़ारों की संख्या में बाबा के समर्थक पंचकुला में इकठ्ठा हो रहे थे,सरकार ने बड़े पैमाने पर सुरक्षाबल की तैनाती कर रखी थी, सेना की टुकड़ियां भी मौजूद थीं तो इतनी बड़ी वारदात कैसे हो गयी। लेकिन अब समझ में आ गया है कि सरकार की मिलीभगत थी। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री को इस हालत के लिए जिम्मेवार ठहराया है। हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार के वकील बलदेवराज महाजन को फटकार लगाई और कहा कि आप सच्चाई को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे और कोर्ट को गुमराह कर रहे थे। कोर्ट ने कहा कि जिस हिंसा में बड़े पैमाने पर आगजनी हुयी, तोड़फोड़ हुयी,उसके लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ज़िम्मेदार हैं। कोर्ट ने सरकारी वकील से बताया कि मुख्यमंत्री खट्टर खुद डेरा सच्चा सौदा को बचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में बहुत बड़ा अंतर है। राजनीतिक फैसलों के कारण प्रशासन अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर सका और सरकारी व्यवस्था को लकवा मार गया। इस सारी घटना के लिए सरकार ने पुलिस के एक डिप्टी सुपरिंटेंडेंट को मुअत्तल किया है।

कोर्ट ने पूछा कि सवाल है कि क्या वही अफसर अकेले ज़िम्मेदार था.?

कोर्ट ने कहा मुख्यमंत्री स्वयं ही गृहमंत्री भी हैं। सात दिन से पंचकुला में लोग इकट्ठा हो रहे थे और मुख्यमंत्री उनको सुरक्षा दे रहे थे।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की टिप्पणी हरियाणा सरकार की नाकामी को बहुत ही सही परिप्रेक्ष्य में रख देती है।

सवाल यह है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री एक अपराधी और उसके गिरोह से इतना डरता क्यों है ? प्रधानमंत्री ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम,’मन की बात’में डेरा सच्चा सौदा का नाम लिए बिना साफ़ कहा कि कि धर्म के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती है।

ज़ाहिर है बीजेपी में भी और सरकार में भी धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से चिंता के संकेत नज़र आने लगे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। प्रधानमंत्री ने रेडियो कार्यक्रम में सरदार पटेल को याद किया और कहा कि सरदार ने देश की एकता के लिए पूरा जीवन ही लगा दिया।

धार्मिक सहिष्णुता और देश की एकता के हवाले से सरदार पटेल को याद करना एक महत्वपूर्ण संकेत है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब सरकार के सर्वोच्च स्तर पर यह बात मान ली गयी है कि धार्मिक झगड़े देश की एकता के लिए चुनौती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने धर्म के नाम पर हिंसा न करने की बात कई बार कही है, लाल किले की प्राचीर से भी कही थी लेकिन अभी तक निचले स्तर पर बीजेपी के नेता और मंत्री उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। उनके बार बार कहने के बाद भी हिंसा की वारदातें, मुसलमानों को गौरक्षा के बहाने मार डालने की बातें बदस्तूर चल रही थीं। लेकिन ’मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने देश की एकता से धार्मिक आधार पर हो रही असहिष्णुता को जोड़कर एक बड़ी बात कही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीजेपी के छुटभैया नेता, राज्यों के मुख्यमंत्री, सरकारी तंत्र और अफसर प्रधानमंत्री की बातों को गंभीरता से लेंगें और देश की एकता और सरदार पटेल के मिशन को ध्यान में रखते हुए धार्मिक हिंसा पर फ़ौरन से पेशतर लगाम लगायेंगें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की एकता के लिए ज़रूरी धार्मिक सहिष्णुता की जो बात कही है वास्तव में वही संविधान की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा है। यह अलग बात है कि उनकी पार्टी और उसके कार्यकर्ता धर्मनिरपेक्षता की निंदा करते रहे हैं। उनके दिमाग में कहीं से यह बात भरी रहती थी कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की विरासत है। लेकिन वह गलत हैं। धर्मनिरपेक्षता किसी पार्टी की विरासत नहीं है। वह देश की विरासत है। इसी विचार धारा की बुनियाद पर इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। अंग्रेजों की सोच थी कि इस देश के हिन्दू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं खड़े होंगें लेकिन जब १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन शुरू हुआ तो हिन्दू और मुसलमान न केवल साथ साथ थे बल्कि मुसलमानों के सभी फिरके महात्मा गांधी के साथ हो गए थे। उसके बाद ही अंग्रेजों ने दोनों धर्मो में गांधी विरोधी तबका तैयार किया और उसी हिसाब से राजनीतिक संगठन खड़े किये। लेकिन महात्मा गांधी के आन्दोलन का स्थाई भाव सभी धर्मों का साथ ही बना रहा और आजादी की लड़ाई उसी बुनियाद पर जीती गयी। जाते जाते अंग्रेजों ने अपने वफादार जिन्ना को पाकिस्तान तो बख्श दिया लेकिन भारत की एकता को तोड़ने में नाकाम रहे। धर्मनिरपेक्षता की विरोधी ताक़तों ने महात्मा गांधी की ह्त्या भी कर दी लेकिन देश की एकता बनी रही।

राष्ट्र की एकता के लिए ज़रूरी सर्व धर्म समभाव की बात को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तो आगे बढाया ही, इस मिशन में सरदार पटेल का योगदान किसी से कम नहीं है। यह सच है कि जब तक कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को अपनी बुनियादी सोच का हिस्सा बना कर रखा, तब तक कांग्रेस अजेय रही लेकिन जब साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपनाने की कोशिश की, इमरजेंसी के दौरान दिल्ली और अन्य इलाकों में मुसलमानों को चुन चुन कर मारा तो देश की जनता कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हो गयी और पार्टी १९७७ का चुनाव हार गयी। जो काम वहां से शुरू हुआ था,उसका नतीजा कांग्रेस के सामने है।

कांग्रेस के इंदिरा गांधी युग में धर्मनिरपेक्षता के विकल्प की तलाश शुरू हो गई थी। उनके बेटे और उस वक्त के उत्तराधिकारी संजय गांधी ने 1975 के बाद से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करना शुरू कर दिया था। खासतौर पर मुस्लिम बहुल इलाकों में इमारतें ढहाना और नसबंदी अभियान में उनको घेरना ऐसे उदाहरण हैं जो सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ इशारा करते हैं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद से ही कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत होने लगी। १९७७ की हार के बाद ही इंदिरा गांधी ने असम में छात्र असंतोष को हवा दी और पंजाब में अपने ख़ास भक्त ज्ञानी जैल सिंह की मदद से जनरैल सिंह भिंडरावाला को दी गयी कांग्रेसी शह इसी राजनीति का नतीजा है।

हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए।

पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा। ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति का पैरोकार थे। उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया। नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे। लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया। लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा। अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि,” आप अब आज़ाद हैं। आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए। आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका पाकिस्तान के राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है। अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं। ऐसे नागरिक, जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं। इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया। उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान धार्मिक राज्य नहीं बनेगा। हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदू, ईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं। उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें।”

 लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया। पहले चुनाव के बाद ही वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी। १९७१ आते आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था। अलोकतांत्रिक धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे।

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमतवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन उनको ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती। अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये। जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है। कहीं मुसलमानों को अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है। इससे बचना पडेगा। अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है। 

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