जब RSS नमस्ते सदावत्सले कर रहा था तब कांग्रेस और गांधीजी अंग्रेज़ों की लाठियां खा रहे थे

क्या आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया था? RSS कभी भारतीय राष्ट्रवाद से प्रेरित आंदोलन में भाग ले ही नहीं सकता था क्योंकि उसकी प्रेरणा का स्त्रोत तो केवल हिन्दू राष्ट्रवाद था।...

 

क्या आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया था?

-राम पुनियानी

स्वाधीनता संग्राम एक समावेशी आंदोलन था, जिसमें देश के सभी क्षेत्रों और धर्मों के लोगों ने हिस्सेदारी की थी। यह आंदोलन बहुवाद को मान्यता देता था और धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक भारत की अवधारणा पर आधारित था। यह आंदोलन देश के सभी लोगों को बंधुत्व के एकसूत्र में बांधने का हामी था। जो लोग हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्रवाद के पैरोकार थे, वे विचारधारात्मक और राजनीतिक कारणों से इस आंदोलन से दूर रहे।

पिछले कुछ दशकों से हिन्दू राष्ट्रवादी यह दावा करने लगे हैं कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की थी। उनका आरोप है कि कांग्रेसी और वामपंथी विचारधाराओं से प्रेरित इतिहासविदों ने स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका को गलत ढंग से प्रस्तुत किया है।

राकेश सिन्हा (द टाईम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 9 अगस्त, 2017) स्वाधीनता संग्राम में आरएसएस की भागीदारी का काल्पनिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनके दावे के मुख्य आधार हैं ब्रिटिश सरकार की गुप्तचर रपटें।

उनका दावा है कि आरएसएस ने सन 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया था और यह भी कि इस आंदोलन में हेडगेवार की भागीदारी के कारण उसे जबरदस्त मज़बूती मिली।

सिन्हा के सभी तर्क कोरी लफ्फाज़ी हैं। यह सही है कि हेडगेवार ने इस आंदोलन में भाग लिया था और इसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था परंतु उनका उद्देश्य केवल उन लोगों से सम्पर्क बनाना था जो हिन्दू राष्ट्र के उनके एजेंडे के समर्थक थे। उन्होंने इस आंदोलन में अपनी व्यक्तिगत हैसियत से भाग लिया था।

आरएसएस या हेडगेवार का एक भी ऐसा लेख या वक्तव्य उपलब्ध नहीं है जिसमें उन्होंने लोगों का इस आंदोलन में भाग लेने का आह्वान किया हो। इसके विपरीत, ऐसे आधिकारिक संदर्भ उपलब्ध हैं जिनसे यह जाहिर होता है कि संघ ने आंदोलन में भाग लेने से लोगों को हतोत्साहित करने के हर संभव प्रयास किए।

आरएसएस नेतृत्व का स्वाधीनता संग्राम के प्रति क्या रूख था, यह संघ के द्वितीय सरसंघचालक एमएस गोलवलकर के इस उद्धरण से जाहिर होता हैः ‘‘देश में समय-समय पर अशांति की लहरें उठती रही है। ऐसी ही एक लहर 1942 में उठी थी। उसके पहले, 1930-31 में आंदोलन हुआ था। उस समय कई लोग डॉक्टर जी (हेडगेवार) के पास पहुंचे। उन लोगों ने डॉक्टर जी से अनुरोध किया कि इस आंदोलन से देश को स्वाधीनता मिलेगी और संघ को इसमें भाग लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उस समय एक सज्जन ने डॉक्टर जी से कहा कि वे जेल जाने के लिए तैयार हैं। डॉक्टर जी ने उनसे कहा कि ‘तुम ज़रूर जेल जाओ परंतु अगर तुम जेल चले जाओगे तो तुम्हारे परिवार की देखभाल कौन करेगा?’ उन सज्जन से जवाब दिया कि ‘मैंने इतना धन इकट्ठा कर दिया है कि जिससे दो साल तक मेरे परिवार का खर्च चल सकता है। मैंने जुर्माना आदि चुकाने के लिए भी धन का प्रबंध कर लिया है।’ डॉक्टर जी ने तब उससे कहा ‘अगर तुमने ये सब इंतज़ाम कर लिए हैं तो आओ और संघ के लिए दो साल काम करो’। वे सज्जन अपने घर चले गए और उसके बाद न तो वे जेल गए और ना ही उन्होंने संघ के लिए काम किया’’ (श्री गुरूजी समग्र दर्शन, खंड 4, पृष्ठ 39-40)।

इसी तरह, जब देश में 1942 के आंदोलन की उथलपुथल शुरू हुई तब गोलवलकर ने निर्देश जारी किए कि संघ का रोज़ाना का काम जारी रहना चाहिए और ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे अंग्रेज़ नाराज़ हों। ‘‘सन 1942 में भी कई लोगों के हृदय में भावनाओं का ज्वार उठ रहा था। उस समय भी संघ सामान्य रूप से काम करता रहा। संघ ने यह निश्चय किया कि वह सीधे कुछ नहीं करेगा’’ (उपरोक्त, पृष्ठ 40)। एमएस गोलवलकर यह साफ-साफ कहते हैं कि अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ना उनके एजेंडे का हिस्सा नहीं है। ‘हम सब को याद रखना चाहिए कि हम जो शपथ लेते हैं उसमें हम धर्म और संस्कृति की रक्षा के ज़रिए देश को स्वाधीन करने की बात कहते हैं। उसमें अंग्रेज़ों के इस देश से प्रस्थान का कोई ज़िक्र नहीं है’।

सिन्हा चाहते हैं कि हम यह विश्वास करें कि संघ के लाखों स्वयंसेवकों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था और इनमें से कई को कड़ी सज़ाएं भुगतनी पड़ी थीं। संघ अपने अनुशासनबद्ध कार्यकर्ताओं के लिए जाना जाता है।

क्या श्री सिन्हा यह कहना चाहते हैं कि संघ के स्वयंसेवकों ने अपने सरसंघचालक के निर्देशों का उल्लंघन कर गांधी जी के नेतृत्व वाले आंदोलन में हिस्सा लिया? अंग्रेज़ों की गुप्तचर सेवा द्वारा प्रदान की गई जानकारी के आधार पर सरकार द्वारा एक परिपत्र जारी किया गया था जिसमें अंग्रेज़ अफसरो से कहा गया था कि संघ का यह दावा कि वह एक राजनीतिक संगठन नहीं है, पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश सरकार की यह व्याख्या, आरएसएस के इस दावे को खोखला सिद्ध करती है कि वह राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक संगठन है।

स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक संघ ने कभी यह दावा नहीं किया कि उसने देश के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की थी। ऐसे दावे करने का सिलसिला तब शुरू हुआ जब संघ-भाजपा देश में सत्ता हासिल करने के नज़दीक पहुंचने लगे। इस दिशा में सबसे पहला प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किया था। सन 1998 के आम चुनाव में लोगों से भाजपा को वोट देने की अपील करते हुए उन्होंने लिखा था कि वे न केवल आरएसएस की शाखा में भाग लेते थे बल्कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भी हिस्सा लिया था! (माननी चटर्जी, व्ही.के. रामचन्द्रन, फ्रन्टलाईन, 20 फरवरी, 1998)। उनका दावा बटेश्वर की घटना पर आधारित था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। अपनी गिरफ्तारी के तुरंत बाद उन्होंने अदालत में एक इकबालिया बयान दिया और बटेश्वर का आंदोलन, जो भारत छोड़ो आंदोलन का भाग था, में हिस्सेदारी करने वाले व्यक्तियों के नाम भी बताए। अपने इकबालिया बयान में वाजपेयी ने कहा कि उन्होंने सम्पत्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। उन्होंने कहा कि सम्पत्ति को नुकसान उन लोगों ने पहुंचाया जो भवन पर तिरंगा फहराने गए थे। उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे जुलूस का हिस्सा नहीं थे और केवल दर्शक थे। उनके माफी मांग लेने के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

श्री सिन्हा की कल्पना शक्ति काफी उर्वर है और वे तो यहां तक दावा करते हैं कि आरएसएस के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण ही ब्रिटिश शासकों को इस देश से वापस जाने का निर्णय करना पड़ा। तथ्य यह है कि इस आंदोलन के दौरान भी आरएसएस की शाखाएं इत्यादि हमेशा की तरह लगती रहीं।

जब आरएसएस के स्वयंसेवक शाखाओं में नमस्ते सदावत्सले कर रहे थे तब कांग्रेस और गांधीजी के समर्थक सड़कों पर पुलिस की लाठियां खा रहे थे और जेलों में बंद थे। अब आरएसएस जबरदस्ती स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदार होने का दंभ भर रहा है।

विचारधारा के स्तर पर हिन्दुत्ववादी राजनीतिक संगठनों का उद्देश्य, मुस्लिम राष्ट्रवाद को कमज़ोर करना था। अपने आपसी मतभेदों के बावजूद इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्हें ब्रिटिश शासकों के साथ सहयोग करने में भी कोई गुरेज़ नहीं था। वे देश की विविधता को नज़रअंदाज़ करना चाहते थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के गांधीजी के नारे में उनकी कतई आस्था नहीं थी। आज केवल चुनावी उद्देश्यों से आरएसएस इस तथ्य पर पर्दा डालना चाहता है कि वह स्वाधीनता संग्राम में सिरे से गायब था। आरएसएस कभी भारतीय राष्ट्रवाद से प्रेरित आंदोलन में भाग ले ही नहीं सकता था क्योंकि उसकी प्रेरणा का स्त्रोत तो केवल हिन्दू राष्ट्रवाद था।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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