भाजपा भगाओ-देश बचाओ रैली : महागठबंधन रिटर्न्स

राजनीति के तराजू में अभी भाजपा का पलड़ा भारी है, लेकिन दूसरे पलड़े पर अलग-अलग दल मिलकर जिस तरह उसे झुका रहे हैं, उससे 2019 का गणित पलट जाए, तो आश्चर्य नहीं। ...

हाइलाइट्स

मजबूत विपक्ष के लिए पहले तो सभी दलों को अपने छोटे-बड़े मतभेद किनारे कर साथ आना होगा और दूसरी बात लोकतंत्र की बेहतरी के लिए स्पष्ट योजनाएं और कार्यक्रम जनता के सामने रखने होंगे। नकारात्मक राजनीति को रचनात्मक राजनीति में बदलने से ही जनता का भला होगा और महागठबंधन का भी।

 

राजीव रंजन श्रीवास्तव

इसे महागठबंधन का दूसरा अंतरा कह लें, महागठबंधन रिटर्न्स कह लें या भाजपा भगाओ-देश बचाओ रैली कह लें, पटना के गांधी मैदान में लालू यादव और राजद की पहल पर 14 विपक्षी दलों की इस एकजुटता ने मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अपनी भूमिका को नए सिरे से रेखांकित किया है।

जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजनैतिक ईमानदारी दिखाते हुए राजद का साथ बीच में छोड़ दिया, और फिर से भाजपा की शरण ली और उसके समर्थन से सरकार बनाई जबकि इसी बीच लालू प्रसाद और उनके परिजनों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो माहौल ऐसा बनाया गया कि बस अब लालू प्रसाद का राजनैतिक करियर खत्म हो चुका है। लेकिन किसी मंझे हुए खिलाड़ी की भांति लालू प्रसाद राजनीति के मैदान में न सिर्फ डटे हुए हैं, बल्कि उन्होंने बिहार में अपने जनसमर्थन की ताकत भी दिखा दी।

बिहार का बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में है, बावजूद इसके इस महारैली में भारी भीड़ एकत्र हुई।

लालू प्रसाद और उनके बेटों के साथ, जदयू नेता शरद यादव, अली अनवर और राज्य सरकार में पूर्व मंत्री रमई राम भी थे। नीतीश कुमार भाजपा के साथ जरूर गए हैं, लेकिन जदयू नहीं गई है, यह बात इस रैली से जाहिर हो गई।

शरद यादव पर अंतिम वक्त तक दबाव बना रहा कि वे इस रैली में शामिल न हो। लेकिन उन्होंने इस दबाव को नकारते हुए शिरकत की और यह साफ कर दिया कि अब जदयू में आर-पार की लड़ाई होगी। उनकी राज्यसभा सदस्यता पर भी आंच आएगी।

देखना यह है कि जदयू का असली दावेदार नीतीश कुमार बनते हैं या शरद यादव।

इस रैली में शरद यादव ने राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपाई महागठबंधन खड़ा करने की घोषणा की जिसका समर्थन मंच पर मौजूद विपक्ष के तमाम नेताओं ने भी किया। भाजपा चाहे तो इसे हल्के में ले, लेकिन यह तय है कि विपक्षियों की इस एकजुटता का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

लालू प्रसाद, शरद यादव के साथ मंच पर प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी, झारखंड से झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, अन्य पूर्व मुख्यमंत्री झाविमो के बाबूलाल मरांडी, भाकपा के महासचिव सुधाकर रेड्डी और सचिव डीराजा तथा एनसीपी के महासचिव और बिहार से लोकसभा सदस्य तारिक अनवर भी थे। दक्षिण में तमिलनाडु से डीएमके और केरल कांग्रेस के प्रतिनिधि रैली में शामिल हुई और उधर असम से एयूडीफ के सांसद बदरुद्दीन अजमल गांधी मैदान में विपक्षी एकता को मजबूत कर रहे थे। कांग्रेस से राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद और महासचिव सीपी जोशी थे। जबकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अनुपस्थित होने के बावजूद अपना संदेश लोगों तक पहुंचाया। अगर इन दोनों में से किसी की उपस्थिति होती तो रैली का दम कुछ और बढ़ जाता। लेकिन बार-बार गलतियां करने की आदी कांग्रेस एक बार फिर राजनैतिक लाभ लेने में चूक कर गई। बसपा सुप्रीमो मायावती भी रैली में शामिल नहीं हुईं, जबकि उनके आने से विपक्षी एकता को थोड़ा बल मिलता। हालांकि 17 अगस्त को दिल्ली में शरद यादव के साझी विरासत बचाओ सम्मेलन में बसपा की ओर से सांसद वीर सिंह शामिल हुए थे।

मायावती के अपने राजनैतिक गणित होंगे, लेकिन अगर हाशिए पर चले गए विपक्ष को मुख्य भूमिका में लाना है, तो थोड़ी राजनीति लाभ-हानि से परे जाकर भी करनी होगी

वामदलों में भी भाकपा शामिल हुई, लेकिन माकपा नहीं। दिल्ली के सम्मेलन में माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी उपस्थित थे, लेकिन इस बार माकपा को संभवत: मंच पर ममता बनर्जी की मौजूदगी मंजूर नहीं हुई।

राजनीति के तराजू में अभी भाजपा का पलड़ा भारी है, लेकिन दूसरे पलड़े पर अलग-अलग दल मिलकर जिस तरह उसे झुका रहे हैं, उससे 2019 का गणित पलट जाए, तो आश्चर्य नहीं। हालांकि इसके लिए विपक्षियों को अभी और प्रयास करने की जरूरत है।

पटना की रैली में केंद्र सरकार की नोटबंदी, जीएसटी जैसी नीतियों की आलोचना से लेकर नीतीश कुमार द्वारा जनादेश का अपमान करने पर पर्याप्त चर्चा हुई। लेकिन मजबूत विपक्ष या 2019 में सत्ता का विकल्प देने के लिए यह काफी नहीं है। भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत बोले और विपक्ष भाजपा भगाओ की बात करे, इससे भी राजनैतिक संकट का समाधान नहीं निकलेगा।

मजबूत विपक्ष के लिए पहले तो सभी दलों को अपने छोटे-बड़े मतभेद किनारे कर साथ आना होगा और दूसरी बात लोकतंत्र की बेहतरी के लिए स्पष्ट योजनाएं और कार्यक्रम जनता के सामने रखने होंगे। नकारात्मक राजनीति को रचनात्मक राजनीति में बदलने से ही जनता का भला होगा और महागठबंधन का भी।

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