कार्ल मार्क्स के जन्म के दो सौ साल और 'विमर्श का उल्लास'

राइनलैंड-पैलेतिनेत राज्य के प्रधानमंत्री ने इस मौके पर कहा कि - हां, हम अपने शहर के इस बेटे के साथ हैं’। दोस्ती के प्रतीक के रूप में इस उपहार को स्वीकार करके भी हम खुश हैं’।...

-अरुण माहेश्वरी

कार्ल मार्क्स के जन्म-स्थान जर्मनी के त्रियेर में कल उनके जन्म के 200 साल पूरे होने पर उनके घर के सामने पांच मीटर ऊंची एक मूर्ति की स्थापना की गई’। इस घर में उन्होंने अपनी उम्र के प्रारंभिक 17 साल गुजारे थे’। त्रियेर शहर को यह मूर्ति चीन की सरकार की ओर से भेंट की गई है’।

त्रियेर शहर की सिटी कौंसिल के सामने जब चीन की ओर से इस भेंट का प्रस्ताव आया था, उसे लेकर कौंसिल में काफी बहस हुई थी और अंत में 42-7 मतों से चीन की इस भेंट को स्वीकारने का फैसला किया गया’।

कल जब त्रियेर में इस मूर्ति की स्थापना हुई उस समय भी बड़ी संख्या में त्रियेर के नागरिक वहां उपस्थित हुए थे और ‘पूंजीवाद मुर्दाबाद’ तथा ‘हर तानाशाह का पिता’ की तरह के परस्पर-विरोधी नारे भी लगाए जा रहे थे’।

और कहना न होगा, ‘विमर्श के उस उल्लास’ के बीच भी मननशील मार्क्स उस मूर्ति में ऐसे लग रहे थे मानो अभी-अभी पुस्तकालय से निकल कर इस दुनिया को अपने अंतर की गहराइयों में उतार कर इसके दृश्य-अदृश्, सब रूपों का अवगाहन कर रहे हो’।

मूर्ति के विमोचन के वक्त त्रियेर के मेयर वोफाम लेब ने कहा कि ऐतिहासिक विवादों को हमें स्वीकारना चाहिए’। राइनलैंड-पैलेतिनेत राज्य के प्रधानमंत्री ने इस मौके पर कहा कि - हां, हम अपने शहर के इस बेटे के साथ हैं’। दोस्ती के प्रतीक के रूप में इस उपहार को स्वीकार करके भी हम खुश हैं’।

गौर करने की बात है कि मार्क्स के जन्म के 200 सालों की पूर्ति पर ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका ने भी मार्क्स के बारे में एक लंबा लेख ‘मार्क्स पर पुनर्विचार : दूसरी बार, एक प्रहसन (Reconsidering Marx Second time, farce) जारी किया है जिसमें अपेक्षित रूप में ही मार्क्स को लगभग कोसते हुए भी उनकी तमाम कमियों के बावजूद उन्हें पूंजीवाद के संकट के काल में किसी ऐसे ईश्वरीय दूत की तरह पेश किया गया है जो भले दुनिया की किसी समस्या का समाधान न दे सके, लेकिन असहाय मनुष्य उसकी शरण में पहुंचने के लिये मजबूर हो जाता है’। ‘इकोनोमिस्ट’ ने आज की दुनिया में मार्क्स के इस ‘पूज्य’ रूप को पूंजीवादी उदारवाद के लिये खतरे की सबसे बड़ी घंटी बताया है जिसकी शरण में जाकर लोग उसके द्वारा सजाये गये इस बाग को नष्ट कर सकते हैं’। ‘इकोनोमिस्ट’ के इस लेख का अंतिम पैराग्राफ है - “ आज का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या उन उपलब्धियों को (पूंजीवाद की उपलब्धियों को -अ.मा.) फिर से दोहराया जा सकता है’। पूंजीवाद का विरोध बढ़ रहा है - सर्वहारा की एकजुटता के बजाय आम आक्रोश के रूप में ज्यादा’। अभी के उदारवादी सुधारवादी इन संकट को समझने और इनका समाधान खोजने के मामले में अपने पूर्ववर्तियों से दुखदायी तौर पर हीन साबित हो रहे हैं’। उन्हें मार्क्स के जन्म की 200वीं जयंती का इस्तेमाल करके उस महान व्यक्ति से अपने को फिर से परिचित करना चाहिए - इस व्यवस्था के जिन गंभीर दोषों को उन्होंने जबर्दस्त ढंग से पकड़ा था, सिर्फ उनको समझने के लिये ही नहीं, बल्कि इस बात को याद रखने के लिये भी कि यदि वे इन दोषों का मुकाबला नहीं कर पाते हैं तो उनके सामने आगे कितनी बड़ी तबाही खड़ी है’। “

(Today’s great question is whether those achievements can be repeated. The backlash against capitalism is mounting—if more often in the form of populist anger than of proletarian solidarity. So far liberal reformers are proving sadly inferior to their predecessors in terms of both their grasp of the crisis and their ability to generate solutions. They should use the 200th anniversary of Marx’s birth to reacquaint themselves with the great man—not only to understand the serious faults that he brilliantly identified in the system, but to remind themselves of the disaster that awaits if they fail to confront them.)

जाहिर है, विश्व पूंजीवाद की प्रमुख पत्रिका ‘इकोनोमिस्ट’ ने स्वाभाविक तौर पर मार्क्स को ऐसे देवदूत के रूप में याद किया है जो संकट के वक्त किसी भूत की तरह लोगों पर सवार हो कर दुनिया की वर्तमान ‘सुंदर बगिया’ को तहस-नहस कर देने का कारण बन सकता है’।

हमें मार्क्स को केंद्र में रख कर दिखाई दे रहे इस पूरे विवाद में ‘विमर्श का वह उल्लास’ नजर आता है जिसके परिवेश में हमारे अभिनवगुप्त के अनुसार सभी आचरण साधक को उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ाते हैं’। (प्रत्येकं बहु प्रकारं निरूढि:)’। जहां अपूर्णता होती है, वहां यदि फलवत्ता नहीं होती, तो पूर्णता में फल की कल्पना भी नहीं होती’। इसीलिये अभिनव ने निश्चय की उपलब्धि को निरूढ़ि कहा है, रूढ़ियों के बंधनों से मुक्ति की प्रक्रिया’। इसमें फिर भक्ष्या-भक्ष्य के, शुद्ध-अशुद्ध के विवेचन का पचड़ा नहीं होता है’। (यथा यथा भवति तथैव आचरेत्, न तु भक्ष्यशुद्ध्यादिविवेचनया)’। (तंत्रसारः, चतुर्थमाह्निकम्) हम ऐसे विमर्श के उल्लास का स्वागत करते हैं’। 

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