पलायन रुकेगा नहीं और अब बाजार और सत्ता का माफिया गठजोड़ पहाड़ियों को पहाड़ से खदेड़ने वाला है? आप क्या रोक सकेंगे?

तराई में शहरीकरण और औद्योगीकीकरण से कारपोरेट घरानों को ही एकतरफा फायदा हुआ। इसकी भारी कीमत किसानों को चुकानी पड़ी है तराई के किसान थोक भाव से अपनी जमीन से बेदखल हो गये। विकास का यह माडल पहाड़ में भी.....

पलाश विश्वास

यह सही है कि एक बार घर से निकलकर बाहर चले आने पर घर वापस होना बेहद मुश्किल होता है। कभी कभार घर के दरवाजे तक वापस आने वाले लोगों के लिए बंद हो जाते हैं या बेदखल भी हो जाते हैं घर। इसलिए घर वापस न आने वाले लोगों को कोसना शायद सही नहीं है। वे रोजगार और आजीविका के लिए शरणार्थी हैं। घर छोड़ना रोजगार और आजीविका के संकट की वजह से सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं देश के बाकी हिस्सों में भी पढ़े लिखे और अपढ़ लोगों की मजबूरी है, क्योंकि इस देश में रोजगार और आजीविका के लिए शहरों की तरफ भागने का ही विकल्प बचता है।

स्थानीय रोजगार, मातृभाषा में रोजगार मुक्त बाजार में एकदम असंभव है। शहरीकरण, औद्योगीकरण और विकास के नाम पर जनपदों को उजाड़ा जा रहा है। गांवों, घाटियों को तबाह किया जा रहा है। जनता को जल जंगल जमीन से बेदखल करने में पूंजी और कारपोरेट को राष्ट्रशक्ति की समूची सैन्य शक्ति और जनता की चुनी हुई सरकारें और संस्थाएं पूरी ताकत झोंक रही हैं। हल्द्वानी में गैरसैण राजधानी बनाओ संवाद के दौरान मैंने यही कहा था कि देहरादून में बैठे जो लोग पहाड़ को तबाह कर रहे हैं, वे गैरसैण में जाकर क्या करेंगे। दैनिक हुंदुस्तान में मेरा यह बयान फोटो समेत प्रकाशित भी किया था।

मैंने उस दिन यह भी कहा था कि तराई में शहरीकरण और औद्योगीकीकरण से कारपोरेट घरानों को ही एकतरफा फायदा हुआ है। टैक्स में छूट का पूरा लाभ उठाने के बाद वे दुकान समेटने में लगे हैं और पांच-पांच हजार रूपये की नौकरियों से लाखों लोग बेदखल हो रहे हैं। इसकी भारी कीमत किसानों को चुकानी पड़ी है और तराई के किसान थोक भाव से अपनी जमीन से बेदखल हो गये हैं। विकास का यह माडल पहाड़ में भी लागू हो रहा है और मुझे आशंका है कि इस विकास का नतीजा वहीं निकलेगा जैसा झारखंड, बंगाल, ओड़ीशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र के आदिवासी इलाकों में निकला है, जहां आदिवासियों के खिलाफ कारपोरेट घरानों के हित में राष्ट्र ने युद्ध छेड़ दिया है। इस युद्ध की हल्की सी झलकियां पुरानी टिहरी, नैनीसार और पंचेश्वर में दिकी है तो वह समय भी दूर नहीं जब पहाड़ से पलायन की समस्या तो विकराल हो ती ही रहेगी, बल्कि पहाडो़ं से पहाड़ियों के खदेड़कर निकालेंगी विकास के नाम झंडेवरदार सत्ता और माफिया का गठजोड़ गिरोह।

तीस चालीस साल तक नगरों और महानगरों में जीवन का बेहतरीन हिस्सा बिताने के बाद बुढ़ापे में गांव पहाड़ लौटना बेहद मुश्किल होता है और कोई चाहे तो परिवार के बाकी लोग इसके लिए अक्सर तैयार नहीं होते। इस पूर्वनिर्धारित नियति को बदलने के लिए हमने अभी तक कोई कारगर प्रयास नहीं किया है और राजनीति के भरोसे हालात बदलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। विनाश की इस अर्थव्यवस्था की बलि हुए लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से पहले हमें अपने गिरेबां भी झांकना चाहिए। बहरहाल हम चालीस साल तक शहरों में रहने के बाद तराई में अपने गांव वापस लौट रहे हैं और 31 मई से मत्यु तक वहीं रहने का इरादा है। अगर हालात बदलने के लिए नियति के खिलाफ लड़ने का कोई मोर्चा बनता है तो वहीं आपसे भी मुलाकात होगी।

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