तो पीएम उन नवयुगलों को भी शुभकामनाएं देने लगे हैं, जो देशभक्त नहीं हैं?

इस परम्परा के आलोक में विराट और अनुष्का की शादी ही 'आदर्श' कैसे हो जाती? खासकर जब शादी नाम की संस्था ही कर्मकांड से ज्यादा नहीं रह गई है?...

- कृष्ण प्रताप सिंह

अब, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्रिकेटर विराट कोहली और ऐक्ट्रेस अनुष्का शर्मा के वेडिंग रिसेप्शन की शोभा बढ़ाकर उन्हें गुलाब के फूल दे आये हैं, उनसे पूछा ही जाना चाहिए कि क्या वे उन नवयुगलों को भी शुभकामनाएं देने लगे हैं, जो देशभक्त नहीं हैं? सिर्फ इसलिए कि वे साधारण नहीं सेलीब्रिटी हैं?

यों, इससे जुड़ा एक और सवाल भी कुछ कम बड़ा नहीं कि ऐसा करते हुए प्रधानमंत्री को अपनी ही कही वह बात क्यों याद नहीं रही कि ऐसे मौकों पर फूलों के बजाय पुस्तकें दी जानी चाहिए, ताकि बांझ होती जा रही पुस्तक-संस्कृति फिर से फूलने-फलने लग जाये?

लेकिन विराट और अनुष्का की देशभक्ति का सवाल पहले क्योंकि उसे पहले-पहल प्रधानमंत्री की पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में मध्यप्रदेश के विधायक पन्नालाल शाक्य ने उठाया। यह कहकर कि इटली जाकर शादी करने के कारण विराट और अनुष्का देशभक्त नहीं रह गये।

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जानना चाहिए कि 'स्किल इंडिया' के एक समारोह में उन्होंने यह बात व्यक्तिगत तौर पर नहीं, पिछले कई दशकों से देशप्रेम की पवित्र भावना को साजिशन देशभक्ति में बदलने और जब भी मन हो, जिसकी भी देशभक्ति पर शक कर उसे देशद्रोही घोषित करने में लगी उन सारी जमातों की ओर से कही थी, जो उनके साथ प्रधानमंत्री को भी 'अपना' कहती हैं। इसलिए उनके कहे की जिम्मेदारी से प्रधानमंत्री को सिर्फ इसलिए 'मुक्त' नहीं किया जा सकता कि उनकी पार्टी ने शाक्य को अलग किये बगैर उनके इस विचार को बेहद शातिर अदा से खुद से अलग कर लिया है।

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यह सवाल तो स्वाभाविक ही अभी भी प्रधानमंत्री का पीछा कर रहा है कि शाक्य ने यह कहने की प्रेरणा अपनी पार्टी के शीर्षस्थ नेतृत्व से नहीं तो किससे ली कि विराट व अनुष्का का अपने विवाह संस्कार के लिए भारत के किसी स्थान के बजाय इटली को चुनना देशभक्तों की सूची से खारिज होना है?

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बहरहाल, इस सिलसिले में शाक्य के 'तर्क' भी कुछ कम गौरतलब नहीं। उन्हीं के शब्दों में 'यह क्या कि उन्होंने पैसा उस भूमि पर कमाया, जिस पर भगवान राम, भगवान कृष्ण, विक्रमादित्य व युधिष्ठिर आदि के विवाह हुए, लेकिन अपने विवाह में अरबों रुपये इटली जाकर खर्च किए। साफ है कि उनके मनों में भारत की भूमि के लिए कोई मान नहीं है और वे उसे अछूत मानते हैं।...ऐसा व्यक्ति हमारा आदर्श नहीं हो सकता। हमारा आदर्श वह होगा जो कड़ी मेहनत से धन अर्जित करेगा और देश के प्रति ईमानदार रहेगा।' इस रूप में किसी क्रिकेटर या ऐक्ट्रेस ने पहली बार विदेश में शादी के कारण देशभक्ति 'गंवाई' है।

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अलबत्ता, देश में क्रिकेट की धर्मों जैसी अवस्थिति के बावजूद क्रिकेटरों को अनालोच्य नहीं माना जाता। उनकी कारस्तानियों की आलोचना भी होती ही रहती है। वे हार जाते हैं, खासकर पाकिस्तान या बंगलादेश से, तो प्रशंसक उन्हें गालियां देते, पुतले जलाते और उनके घरों पर पत्थर फेंकने लगते हैं। लेकिन जहां तक मेहनत की बात है, कोई भी इस बात से इन्कार नहीं करता कि मैच फिक्सरों व सट्टेबाजों के विपरीत, क्रिकेटरों को आमतौर पर उनकी मेहनत का ही पैसा मिलता है। अलबत्ता, अन्य खेलों के खिलाड़ियों से बहुत ज्यादा। आखिरकार क्रिकेट को लम्बे अरसे तक 'जन्टिलमेन्स गेम' और क्रिकेटरों को सांस्कृतिक राजदूत केवल इसलिए थोड़े ही कहा जाता रहा कि वह हमारे गौरांग महाप्रभुओं का खेल है।

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आज की बात करें तो क्रिकेटरों को बिना कोई आदर्श स्थापित किये एक समूची पीढ़ी का रोल मॉडल बन जाने की सहूलियत हासिल है और जब से आईपीएल वगैरह का चक्कर चला है, उन्हें ढोरों की तरह अपनी नीलामी भी तब तक बुरी नहीं लगती, जब तक उसकी दरें ऊंची रहें और खरीदारों का टोटा न पड़े। पैसे के लिए वे अनादर्शपूर्वक अनेक ऐसी अनाप-शनाप व गैरजरूरी चीजों का विज्ञापन करते रहते हैं, जिनका उपभोग उपभोक्ताओं की जेब और स्वास्थ्य दोनों पर भारी पड़ता है।

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जो सचिन तेन्दुलकर भारत के रत्न और क्रिकेट के भगवान हैं, वे भी राज्यसभा सदस्य के तौर पर गैरहाजिरी और चुप्पी के आदर्श ही उपस्थित कर रहे हैं, जिन्हें अनुकरणीय नहीं माना जाता। इसके चक्कर में एक बार उनकी सदस्यता तक पर आ बनी, तो वे देश के बच्चों के खेलने के अधिकार को लेकर थोड़े चिन्तित हुए, लेकिन बोलने खड़े हुए तो हंगामे के शिकार हो गये।

इस परम्परा के आलोक में विराट और अनुष्का की शादी ही 'आदर्श' कैसे हो जाती? खासकर जब शादी नाम की संस्था ही कर्मकांड से ज्यादा नहीं रह गई है? लेकिन अब इससे बड़ा सवाल यह है कि शाक्य ने उससे जुड़ा कोई जेनुइन सवाल क्यों नहीं उठाया? क्यों नहीं पूछा कि उसमें शान व शौकत का इतना दिखावा क्यों किया गया? वे चाहते तो 'अपने' प्रधानमंत्री को भी निशाने पर ले सकते थे, जिन्होंने इस सर्वथा आदर्शविहीन शादी को गौरवान्वित करने से परहेज नहीं किया।

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बात घूम-फिर कर फिर वही कि शाक्य को इन सवालों से नजरें चुराकर सीधे-सीधे विराट और अनुष्का दोनों की देशभक्ति पर ऐसे हमले की क्यों सूझी, जिसके बाद वे खुद को उन द्विविधाग्रस्तों की सूची में शामिल होने से नहीं रोक पाये, जो बार-बार अपनी यह इच्छा दर्शाते रहते हैं कि उनके बच्चे दुनिया मुट्ठी में करने चलें तो भले ही हेलो, हाय या बाय बोलें, मगर उनका चरणस्पर्श करना न भूलें।  

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जवाब में हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि पंकज चतुर्वेदी की कविता याद आती है:

देशभक्ति अब कोई आसान चीज नहीं रह गई/जिसके लिए/देश में रहना और चुपचाप उसे प्यार करना पर्याप्त हो/वह अब महसूस करने की नहीं/विज्ञापित करने की विषयवस्तु है/पहले अपने काम को/सर्वश्रेष्ठ संभव ढंग से करना ही देशभक्ति था/अब काम नहीं/देखा जाता है कि/तुम्हारा हाथ माफिया के समर्थन में उठा हुआ है या नहीं/... वे जो देशभक्ति का प्रमाण मांगते हैं/ राजभक्त हैं/उनके आदर्श वे हैं/जो अंगे्रजों के जमाने में राजभक्त थे/जब तुम कहते हो आजादी/वे हंसते हैं तुम्हारी इस इच्छा पर/जो उन्होंने अपने लिए नहीं चाहा/ तुम्हारे लिए कैसे चाह सकते हैं?/और जो उनकी आक्रामकता है/वह इसी हीनता से उबरने की कोशिश है... स्वदेशी एक खोया हुआ सवाल है/देश को लेकर वह जितना वाचाल है/अमेरिका पर उतना ही निहाल है/...हमारे पूर्वजों ने आजादी के लिए देशभक्ति की थी/अब जो देशभक्ति आई है/वह इसलिए कि तुम गुलामी से छूट ही न सको!

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विडम्बना देखिये कि हम सबका 'गुलामी से छूट ही न सकना' सुनिश्चित करने के फेर में पड़ी यह 'देशभक्ति' विराट व अनुष्का के इटली में शादी करने पर तो एतराज उठाती है, लेकिन उस बड़ी पूंजी की मानमनौवल के लिए हमारे प्रधानमंत्री के दुनिया के किसी भी कोने में जाकर कोर्निश बजा आने से उसे कोई दिक्कत नहीं है, जो पूरी दुनिया में राष्ट्रों-राज्यों की सीमाओं व शक्तियों के अतिक्रमण पर आमादा है और अपने स्वार्थों को छोड़ किसी की भी भक्त नहीं है। यह पूंजी हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक ताने-बाने को तो नष्ट कर ही रही है, मनुष्य को संसाधन और साथ ही हृदयहीन बनाकर रख दे रही और राजनीति से लेकर खेलों तक हमारी सारी चीजों को उनकी पुरानी पहचान से अलग कर दे रही है।

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सावधान रहिए, यह 'देशभक्ति' यों ही 'फूलती-फलती' और बढ़ती रही तो किसी दिन 'देशभक्तों' की सूची को इतनी छोटी कर डालेगी कि उसमें महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे, उड़ीसा में पादरी ग्राह्म स्टेन्स को बच्चों सहित जला देने वाले दारा सिंह और राजस्थान के राजसमन्द में मुस्लिम मजदूर अफराजुल को क्रूरता से मार डालने वाले शंभूलाल जैसों के अलावा उन्हीं को जगह मिल पायेगी, जो गोरक्षा के नाम पर निर्दोषों की जान से खेलते या स्कूलों को पत्र लिखकर उन्हें क्रिसमस मनाने से मना करते अन्यथा अंजाम भुगतने की चेतावनी देते हैं।

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