मीडिया की सांप्रदायिकता : अब किसी ने नहीं लिखा “ख़िलजी की हुईं पद्मावती” !

अतिथि लेखक
मीडिया की सांप्रदायिकता : अब किसी ने नहीं लिखा ख़िलजी की हुईं पद्मावती” !

Communalism of the media: Now nobody wrote "Khilji ki Padmavati" !

कौशल यादव

मीडिया की #भाषा का साम्प्रदायिकीकरण समझना हो तो हाल ही में दीपिका और रणवीर की शादी को उदाहरण के तौर पर रखकर आप आसानी से समझ सकते हैं।

जब पद्मावती फ़िल्म को लेकर जो विवाद चल रहा था उसे भारतीय मीडिया ने ऐसा संवेदनशील मुद्दे के रूप में परिणत कर दिया कि उसकी भाषा और उसके परिणामों के बारे में सोच-सोच कर डर लग रहा था। जब पहला गाना उस फिल्म का रिलीज हुआ, जिसका नाम झूँमर था, उसे लेकर तमाम तरह की मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी गईं। जब वो सही न हो सकीं तो उस गाने में दीपिका के द्वारा किए गए स्टेप पर ही सवाल उठना शुरू कर दिए। एक पुराना वीडियो उठाकर वायरल किया गया, जिसे यह कहकर प्रचारित किया जा रहा था कि, "इस महिला ने दी दीपिका को चुनौती और कहा कि उन्होंने हमारे पारम्परिक गाने और उसके स्टेप को गलत तरीके से किया।"

महिलाओं की एक बड़ी संख्या, जो फ़िल्म के विरोध में सड़कों पर उतर आई थी, उसे सड़कों पर बने रहने में या बनाये रखने में इस तरह की खबरों ने अहम भूमिका अदा की। महिलाओं का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया और उनके जेहन में सती प्रथा, जिसका फ़ॉर्म जौहर था, उसे जाहिर करार दिया।

ख़िलजी को एक अलग तरह से प्रस्तुत किया गया, लेकिन उसके दूसरे पहलू पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया कि वह कितना पढ़ा था, कितनी रचनाएं उसने लिखीं, कितनी कविताएँ उसने लिखीं।

अभी हाल ही में दीपिका और रणवीर की शादी की खबरें आ रही हैं। दीपिका और रणवीर ने जो फिल्में एक साथ कीं उनमें से बाजीराव मस्तानी को चुना गया और खबरों के शीर्षक बाजीराव और मस्तानी के नाम से बने। लेकिन किसी भी खबर में यह नहीं लिखा गया कि ख़िलजी की हुईं पद्मावती।

खबर में दम तो थी, लेकिन मार्केट को अपना घाटा या अपना विरोध पसंद नहीं है। उसे बस कमाई से मतलब है।

अगर खबरों को पद्मावत के नाम से चलाया जाता तो मीडिया के सभी बड़े बड़े चैनल अदालतों के कठघरे में खड़े होते।

ये वही चैनल थे जिनको राजपूताना आन-बान और शान की अधिक चिंता थी बजाय फ़िल्म के विरोध में जलाई गई बसों में घायल हुए बच्चों के प्रति हमदर्दी जताने के।

फ़िल्म ने जिस तरह से महिला को एक योनि भर में तब्दील किया उसके माध्यम से राजपूताना लोगों का शक्ति परीक्षण और उसी के पीछे से मीडिया के सहयोग ने जौहर को मूक सहमति प्रदान की।

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