साम्यवाद के बुनियादी लक्ष्य, साम्यवादी विचारधारा और बाबासाहेब के जाति के विनाश के मिशन में कोई बुनियादी फर्क नहीं

जाति के विनाश के बिना न वर्गीय ध्रुवीकरण संभव है और न समता और न्याय पर आधारित समाज का निर्माण और न कम्युनिस्ट आंदोलन

पलाश विश्वास

B R Ambedkar, who wrote Buddha or Karl Marx, championed the cause of social justice and annihilation of caste in Indian society. The vision of Ambedkar is not different from the vision of Karl Marx.

इंडियन एक्सप्रेस में आज दुनिया को बदलने की दृष्टि देने वाले महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स पर डा.अमर्त्य सेना का आलेख प्रकाशित हुआ है। उनकी विद्वाता के हम कायल हैं, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक यथार्थ के बारे में उनका कुलीन वर्गीय दृष्टिकोण उनके अकादमिक विमर्श के जरिये कोई संवाद उसी तरह शुरू करने में असमर्थ है, जिस तरह भारतीय सामाजिक यथार्थ, यहां की बहुजन जनता, जल जंगल जमीन के यथार्थ से सिरे से कटे भारतीय कम्युनिस्टों का आंदोलन।

एक्सप्रेस में ही डी राजा का एक आलेख कार्ल मार्क्स के अंबेडकर प्रसंग पर लिखा है जो अंबेडकर और मार्क्सवाद पर नये सिरे से संवाद शुरू करने का आधार पत्र बनाये जाने लायक है।

राजा के मुताबिक अंबेडकर ने बुद्ध या कार्ल मार्क्स लिखा, लेकिन भारतीय समाज में सामाजिक न्याय और जाति के विनाश के ल्क्ष्य को लेकर वे आजीवन संघर्ष करते रहे, जो मार्क्स की दृष्टि से भिन्न नहीं है।

हमने बामसेफ के मंच से भी लगभग एक दशक तक देश भर में बहुजनों के सम्मेलनों में यह मुद्दा बार-बार उठाया है कि साम्यवाद के बुनियादी लक्ष्य, साम्यवादी विचारधारा और बाबासाहेब के समता, सामाजिक अन्याय और जाति के विनाश के मिशन में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। बामसेफ से अलगाव के बाद अंबेडकरी आंदोलन के एकीकरण अभियान के दौरान भी कई वर्षों तक विभिन्न अवसरों पर, खासकर बामसेफ एकीकरण के मुंबई, नागपुर और भोपाल अधिवेशनों में हम जोर देकर कहते रहे हैं कि भारत में श्रमिकों, मेहनतकशों और महिलाओं के हकहकूक की लड़ाई में बाबासाहेब की अग्रणी भूमिका रही है और बहुजनों के साथ-साथ कामगारों और महिलाओं को जो भी अधिकार स्वतंत्र भारत में मिले हैं, वे बाबासाहब के मिशन की वजह से हैं, जिन्हें मुक्तबाजार का कुलीन सत्तावर्ग उदारीकरण, निजीकरण, ग्लोबीकरण अभियान के तहत बाबासाहेब और समरसता के नाम खत्म करने पर तुला हुआ है। ऐसे में हमें याद करना चाहिए कि भारत में श्रमिक आंदोलन की शुरुआत में बाबासाहब की बड़ी भूमिका रही है और वे डिप्रेस्ड क्लास की बात शुरू से लेकर आखिर तक करते रहे हैं। उन्होंने शुरू में जो पार्टी बनायी थी, वह भी वर्कर्स की ही पार्टी थी। बाबासाहेब का मिशन का मार्क्स की विचारधारा से कोई विरोध नहीं है और अंबेडकरी आंदोलन को अगर प्रासंगिक बनाना है तो जाति विनाश की उनकी विचारधारा को प्रस्थान बिंदु बनाकर बहुजनों का वर्गीय ध्रुवीकरण अनिवार्य है। इस सिलसिले में डा.आनंद तेलतुंबड़े से भी हमारा लागातार संवाद होता रहा है, जिसे हमने सार्वजनिक किया है। इस बारे में हमारे तमाम वक्तव्य यू ट्यूब पर भी उपलब्ध हैं।

हम अपने प्रगतिशील, साम्यवादी मित्रों से भी यही कहते रहे हैं और उन्हें याद दिलाते रहे हैं कि मुंबई में ट्रेड यूनियन हड़ताल के दौरान अछूतों के हकहकूक के मुद्दे पर मतभेद की वजह से बाबासाहब को धकेलकर कांग्रेस के पाले में करना भारतीय साम्यावादी आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल रही है। साम्यवादियों ने बाबासाहेब के मिशन को सिरे से खारिज ही नहीं किया बल्कि अभी विश्वविद्यालयों के छात्रों युवाओं के जयभीम कामरेड आंदोलन से पहले तक उनका लगातार बहिष्कार किया और इस भारतीय सामाजिक यथार्थ को सिरे से नजरअंदाज किया कि जाति के विनाश के बगैर भारत में सर्वहारा का वर्गीय़ ध्रुवीकरण हो ही नहीं सकता क्योंकि भारत में तमाम संसाधनों और अवसरों से बहुजन समाज वंचित है और सर्वहारा वर्ग का संगठन उन्ही से बन सकता है। नतीजतन भारतीय साम्यवादियों का आजाद भारत में बहुजनों के साथ कभी कोई संवाद नहीं बन सका और बहुजन साम्यवादियों पर किसी भी सूरत में भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।

कम्युनिस्ट आंदोलन के नेतृत्व में बहुजनों का कभी कोई प्रतिनिधित्व नहीं रहा है और इसी वजह से सामाजिक बदलाव, समता और सामाजिक न्याय के आंदोलन में कम्युनिस्टों की कोई भूमिका नहीं बन सकी। बहुजनों और अल्पसंख्यकों पर लगातार बढ़ते अत्याचारों और जल जंगल जमीन से उनकी लगातार हो रही बेदखली का कम्युनिस्टों ने कोई विरोध नहीं किया। करीब दस करोड़ की सदस्यता वाली किसान सभा, करोडो़ं की संख्या वाले छात्र, युवा, महिला संगठनों और ट्रेड यूनियन आंदोलन पर लगभग एकाधिकार और बंगाल, केरल और त्रिपुरा की सत्ता के बावजूद 1991 से लेकर अब तक केंद्र सरकार के मुक्तबाजारी जनविरोधी नरसंहार अभियान का सांकेतिक विरोध भी कम्युनिस्ट नहीं कर सके जबकि कैडर आधारित संगठनों के दम पर वे एकसाथ करोड़ों लोगो को प्रतिरोध और आंदोलनों में सड़कों पर उतार सकते थे। इसके विपरीत वे समताविरोधी न्यायविरोधी जातिवादी सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता करते हुए सुविधा मुताबिक साम्यवादी विचारधारा का हवाला देते हुए कुलीन सत्तावर्ग की राजनीति का साझेदार बने रहे हैं।

साम्यवादी नेतृत्व के इस विश्वासघात के कारण बहुजन कांग्रेस और भाजपा की पैदल सेना में तब्दील है तो बाबासाहेब के जातिविनाश के एजंडे को सिरे से छोड़ देने के कारण से बाबासाहेब के नाम बाबासाहेब का मिशन भी खत्म है। इसी वजह से भारतीय संविधान के स्थान पर राजकाज मनुस्मृति का है, जिसका न बहुजन अंबेडकरवादियों और न कम्युनिस्टों ने कोई विरोध प्रतिरोध अब तक किया है।

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