आत्मविश्वासहीन पार्टी को विश्वास मत

अंग्रेजों के समय 20 साल तक आईसीएस की स्वामिभक्ति दिखाने वाले नायर ने आज़ाद भारत में पाँच साल भी कलैक्टर नहीं रहना चाहा। संसद में ये ऐसे ही अपनी संख्या बनाते रहे। ...

आत्मविश्वासहीन पार्टी को विश्वास मत

वीरेन्द्र जैन

भाजपा में प्रारम्भ से ही आत्मविश्वास की कमी रही है और यह कमी देश की संसद में पूर्ण बहुमत पाकर व दो तिहाई मतों के गठबन्धन से सरकार बना लेने के बाद भी नहीं पैदा हो सका। अभी भी वे किसी वीर बहादुर की तरह रण के मैदान में नहीं उतरते हैं अपितु छापामारों की तरह हमला कर के अपराध बोध से ग्रस्त और बदले के हमले से भयभीत बने रहते हैं। इस दल ने अपने जनसंघ स्वरूप के समय से ही सत्ता के लिए हथकंडों का इस्तेमाल करना प्रारम्भ कर दिया था।

आज जो भाजपा की स्थिति है उसके पीछे उनके सिद्धांतों या नेतृत्व में उपजा भरोसा नहीं अपितु रामजन्मभूमि मन्दिर के नाम पर किया गया आन्दोलन है जिसने क्रमशः उसे दो सीट तक सिमटने के बाद दो सौ पचहत्तर तक ला दिया। फैजाबाद के जिस कलैक्टर के के नायर ने 23 दिसम्बर 1949 की रात्रि में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखवा दी थीं। बाद में उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली और 1952 में उन्हें बहराइच से जनसंघ का टिकिट देकर सांसद बनवा दिया गया था। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी को टिकिट दिया गया था और वे भी जनसंघ के टिकिट पर ही संसद पहुँची थीं। अंग्रेजों के समय 20 साल तक आईसीएस की स्वामिभक्ति दिखाने वाले नायर ने आज़ाद भारत में पाँच साल भी कलैक्टर नहीं रहना चाहा। संसद में ये ऐसे ही अपनी संख्या बनाते रहे। वर्तमान सरकार में भी लगभग दो दर्जन प्रशासनिक, पुलिस और फौज के अधिकारी सांसद हैं, या दूसरे पदों पर हैं। कुछ प्रमुख नामों में

जस्टिस पी के मोहन्ती झारखंड के राज्यपाल बनाये गये

-उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सतशिवम केरल के राज्यपाल बनाये गये।

-पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह सासंद और फिर विदेश राज्यमंत्री बनाये गये।

-मुम्बई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह सासंद व मंत्री बनाये गये।

- भारत के पूर्व गृह सचिव आर के सिंह सांसद व मंत्री बनाये गये।

-दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर बी एस बस्सी उत्तराखंड के राज्यपाल बनाये गये ।

- पूर्व आईपीएस किरण बेदी पुन्दूचेरी की राज्यपाल बनायी गयीं ।

-आसाम के पूर्व मुख्य सचिव ज्योति प्रसाद राजखोवा अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल बनाये गये।

-पूर्व सीएजी विनोद राय बैंक बोर्ड ब्यूरो के अध्यक्ष बनाये गये।

म.प्र. के भागीरथ प्रसाद जैसे अनेक आईएएस सांसद बनाये गये, और मंत्री पद पाने की प्रतीक्षा में हैं। फिल्मी और टीवी कलाकारों में हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, दारा सिंह, स्मृति ईरानी, किरन खेर, अरविन्द त्रिवेदी, दीपिका चिखिलिया, परेश रावल, मनोज तिवारी, अंगूर लता डेका, नितीश भारद्वाज, बाबुल सुप्रियो, रूपा गांगुली, तो जीत कर पहुँचे थे, उसके अलावा भी बप्पी लहरी जैसे अनेक लोगों को टिकिट दिया गया था जो जीत नहीं सके।

1962 में चीन के साथ हुए सीमा संघर्ष में मिली पराजय के बाद काँग्रेस का आकर्षण कम हुआ था। 1964 में जवाहरलाल नेहरू का निधन, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, व खाद्यान्न संकट से जो वातावरण बना था वह भी काँग्रेस को सत्ता से बाहर नहीं कर पाया था, किंतु लोहिया के गैरकाँग्रेसवाद ने बहुत सारे विपक्षी दलों को इस बात पर सहमत कर लिया था वे एकजुट होकर काँग्रेस को सत्ता से बाहर करें। ऐसे बनी संविद सरकारों में  सम्मलित होने के लिए भाजपा/ जनसंघ हमेशा आगे रही। उनके पीछे हमेशा आर एस एस खड़ा रहा और खुद को उनसे दूर बताता रहा। आत्मविश्वास के अभाव में जनसंघ भी खुल कर कभी नहीं बता सकी कि आरएसएस के साथ उसके क्या सम्बन्ध हैं। यह पार्टी हमेशा आरएसएस के साथ अपने सम्बन्धों पर नकाब डाले रही और अपने उन समर्थकों को धोखा देती रही जिन्हें आरएसएस पसन्द नहीं है। उसे उनके भी वोट चाहिए थे इसलिए उसने इस अन्दाज में कभी नहीं कहा कि-

शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहिं भावा

1977 में जब उन्होंने एक गुप्त योजना के अंतर्गत जनसंघ का विलय जनता पार्टी में दिखा कर पहली गैर काँग्रेसी सरकार में महत्वपूर्ण स्थान हथिया लिये थे तब अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए तब तक सत्ता का इस्तेमाल किया जब तक कि इन्हें पहचान नहीं लिया गया कि इनका विलय दिखावटी है। ये जिस संख्या में गये थे उसी संख्या में बाहर आ गये और फिर भारतीय जनता पार्टी के रूप में प्रकट हो गये।

चुनाव जीत कर सता की शक्ति हथियाने के लिए बिना किसी सिद्धांत के समझौता कर लेना इनकी कूटनीति में रहा है क्योंकि ये खुद भी अपने सिद्धांतों की अस्वीकारिता की कमजोरी को समझते थे। 1967 से जो भी संविद सरकारें बननी शुरू हुयी उन सब में ये सम्मलित रहे या इन्होंने रहना चाहा। 1989 में वी पी सिंह की पहली मिली जुली सरकार थी जिसे सीपीएम और भाजपा दोनों के समर्थन की जरूरत थी व सीपीएम ने कह दिया था कि हम सरकार में सम्मिलित हुए बिना समर्थन देंगे और वह भी तब जब भाजपा को सरकार से बाहर रखा जाये। उस सरकार के खिलाफ इन्होंने पर्दे के पीछे काँग्रेस से हाथ मिला कर मण्डल कमीशन की सिफारिशों के खिलाफ आत्मदाह की कहानियां रचीं और रामजन्म भूमि आन्दोलन तेज किया। अभी भी कई राज्य सरकारों में ये जूनियर पार्टनर बने हुए हैं, पर बाहर से समर्थन देने की बात नहीं सोचते। 

आत्मविश्वास की कमी के कारण ये तत्कालीन सरकारों पर इस तरह आरोप लगाते रहे और वादे करते रहे जैसे इन्हें कभी सत्ता में नहीं आना है। मोदी सरकार की ज्यादातर समस्याएं इसी आदत के कारण हैं। इन्होंने 15 लाख का जुमला ज्यादा वोट जुटाने के लिए ही यह मान कर उछाला था कि इन्हें तो पूरा करने का अवसर ही नहीं आयेगा। एक के बदले दस सिर लाने का जुमला भी ऐसा ही था। दो करोड़ रोजगार देने का वादा भी ऐसा ही था। जीएसटी का विरोध भी ऐसा ही था। आत्मविश्वास की कमी के कारण ही नरेन्द्र मोदी ने दो जगह से चुनाव लड़ा था और जब तक चुनाव घोषित नहीं हो गया तब तक मुख्यमंत्री का पद नहीं छोड़ा था। इससे पहले भी म,प्र. विधानसभा के 2003 के चुनाव में आत्मविश्वास की कमी के कारण ही किसी विधायक को जिम्मेवारी नहीं दी थी और भगवा वेषधारी केन्द्रीय मंत्री उमा भारती पर दाँव लगाया था। संयोग से वे जीत गयी थीं तब उन्हें मुख्यमंत्री बनाने व बनाये रखने में आफत आ गयी थी। संयोग से उन्हें निकालने का मौका मिल गया था और उनके साथ किया वादा न निभाने के कारण ही पार्टी में विभाजन हुआ था। आत्मविश्वास की इसी कमी के कारण उ.प्र. के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी अंत तक घोषित नहीं किया।

यह आत्मविश्वास की कमी ही है कि अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार आदि को मुँह बन्द रखने को विवश कर दिया गया और प्रत्येक मंत्री के पीछे गुप्तचर लगाये गये हैं और प्रत्येक सांसद के निजी सचिव पार्टी के निर्देश पर नियुक्त हुये हैं।

अगर अन्दर की आवाजें सुनायी दे रही हों, और दीवार पर लिखी इबारत पढ पा रहे हों तो पढना चाहिए कि संख्या बल के विश्वास मत से अविश्वास कई गुना अधिक है, भले ही उसका कोई मूर्त रूप नहीं बन सका हो। 

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