देशभक्ति का स्वांग : सुरक्षा की दुहाई और असुरक्षित करने का खेल

देशभक्ति का स्वांग : सुरक्षा की दुहाई और असुरक्षित करने का खेल...

पुलवामा के आतंकी हमले (Pulwama terror attack) के बाद से और खासतौर पर इस आतंकी हमले के जवाब के तौर पर, पाकिस्तान में बालाकोट में किए गए हवाई हमले (Air strikes in Balakot in Pakistan) के बाद से, नरेंद्र मोदी की भाषा (Language of Narendra Modi) और समूची देह-भाषा ही बदल गयी है। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले और एक नाभिकीय शस्त्रसंपन्न देश का प्रधानमंत्री (Prime Minister of the Nuclear Armed Forces), सार्वजनिक सभाओं में ‘सात पाताल से निकालकर मारने’ तथा ‘घर में घुसकर मारने’ जैसे टपोरियों वाले डॉयलाग ही नहीं मार रहा है, यही अपना सिद्धांत होने के भी दावे कर रहा है। और इससे आगे बढक़र, इस तरह की घुड़कियां भी दे रहा है कि, मैं ज्यादा इंतजार करने वालों में नहीं हूं! और शेष देह-भाषा? अभिनंदन वर्द्धमान की पाकिस्तान से वापसी के बाद से प्रधानमंत्री मोदी की सभाओं के वीडियो देखने वाले, विक्षोभ और घृणा से नरेंद्र मोदी की मुखमुद्रा के पूरी तरह से विकृत ही हो जाने को दर्ज किए बिना नहीं रहे हैं।

राजेंद्र शर्मा

          लेकिन, इसके साथ ही नरेंद्र मोदी ने इसमें किसी भ्रम की गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि इस विक्षोभ और घृणा का जितना प्रकट निशाना आतंकवाद (Terrorism), पाकिस्तान (Pakistan) आदि की ओर है, उससे ज्यादा नहीं तो कम से कम उतना ही प्रत्यक्ष निशाना, उनके राजनीतिक विरोधियों की ओर है, जिनसे चंद हफ्ते में ही उन्हें चुनाव में भिड़ऩा होगा। अपने राजनीतिक विरोध या आलोचना को, राष्ट्रविरोध घोषित करने की राजनीतिक संस्कृति को, अपने राज के करीब पांच साल में बाकायदा आम चलन में ला देने वाले मोदी और उनके संगियों ने, समूचे विपक्ष को पाकिस्तानपरस्त घोषित करने में जरा सी देर नहीं लगायी है। इस बार इस मामले में भी संघी सेना का आगे रहकर नेतृत्व करते हुए, मोदी ने भोपाल में एक सभा में खुद यह आरोप लगाया है कि उनके विरोधी, ‘‘पाकिस्तान के पोस्टर बॉय’’ बन गए हैं!

             बेशक, इसके बाद किसी सवाल, किसी बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती है। वास्तव में, इसके बाद किसी मुद्दे का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। यहां तक कि मोदी के चुनाव से पहले के वादों का ही नहीं, उनके राज के पांच साल के काम-काज का भी कोई मतलब नहीं रह जाता है। हर सवाल का एक ही जवाब है--अपने देश की सरकार से सवाल करना ही, पड़ोसी दुश्मन की मदद करना है! दिलचस्प बात यह है कि इस तरह से जिन मुद्दों को फर्जी देशभक्ति के ताबूत में दफ्र करने की कोशिश की जा रही है, उनमें किसानों की बदहाली, युवाओं की भयानक बेरोजगारी, मजदूरों के तथा योजनाकर्मियों के भयानक शोषण, कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा, औरतों व बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधाओं की दुर्दशा, भूख से मौतों, दलितों व अल्पसंख्यकों के अधिकारों, जैसे मुद्दे ही शामिल नहीं हैं, जो खासतौर पर मोदी राज के आखिरी दो सालों में तो सडक़ों पर होने वाले प्रदर्शनों के जरिए बराबर अपनी मौजूदगी जताते रहे हैं। इस तरह जिन मुद्दों को दफ्र करने की कोशिश की जा रही है उनमें, आंतरिक और बाहरी, देश की सुरक्षा के मुद्दे भी शामिल हैं। यह विडंबना जरूर है कि सुरक्षा की विशेष चिंता के आंडबर के जरिए, सुरक्षा के भी वास्ताविक सवालों पर, ताला ही जडऩे की कोशिशें की जा रही हैं।

          और इन वास्तविक सवालों पर ताला जड़ऩा इसलिए जरूरी है कि इनके बिना, सिर्फ छाती पीटू गरज-तरज और वास्तविक से बढक़र कल्पित शत्रुओं को लाल-लाल आंखें दिखाने के ही बल पर खड़ी की जा रही मोदी की असुरक्षित देश के ‘‘रक्षक’’ की छवि, जरा से धक्के में भहरा कर गिर जाएगी। यह संयोग ही नहीं है कि पुलवामा की दरिंदगी के जवाब के नाम पर, कश्मीर की पूरी समस्या को ही, पाकिस्तान की शरारत के मामले में घटा दिया गया है, ताकि जम्मू-कश्मीर में, मोदी राज के पांच साल की घोर विफलताओं पर ही पर्दा डाला जा सके। इन विफलताओं में, पीडीपी के साथ अवसरवादी गठजोड़ की सरकार के जरिए, जम्मू से आगे समूचे जम्मू-कश्मीर को अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेने की भोंडी कोशिश से लेकर, खासतौर पर कश्मीरी जनता के अलगाव तथा असंतोष को, सिर्फ सैन्य बलों के जरिए कुचलने की कोशिशों तक की, घोर विफलताएं शामिल हंै। इसी विफलता के चलते आज कश्मीर में आतंकवादी हिंसा, तीन दशक के पहले स्तर तक पहुंच गयी है, जहां आतंकी वारदातों में और आतंकवादियों की ही नहीं, आम नागरिकों तथा सुरक्षा कर्मियों की मौतों में भी, मोदी के पांच साल में भारी बढ़ोतरी हुई है। इतना ही नहीं, लोगों के मन से सेना का भी डर ही खत्म हो गया है और आतंकवादियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ों में, आम लोगों की निहत्थी भीड़ें जान जोखिम में डालकर कूदती रही हैं। जाहिर है कि हालात में इस चौतरफा गिरावट का ही एक और महत्वपूर्ण संकेतक यह है कि कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों के बीच, सीमा पार पाकिस्तान की ओर से आए आतंकवादियों का अनुपात तेजी से घट रहा है और हथियार उठाने वाले स्थानीय युवाओं का हिस्सा उसी तेजी से बढ़ रहा है। पुलवामा के हमले के पीछे रही खुफियागीरी की और सुरक्षा की चूकों के अलावा यह भी सुरक्षा के पहलू से मोदी राज की भारी विफलता का ही सबूत है कि कश्मीर में कई दशकों के बाद पहली बार आत्मघाती बम को सुरक्षा बलों पर हमले का हथियार बनाया गया है और इसके लिए आत्मघाती बम बना, बीस साल का एक स्थानीय युवा। आंतरिक असुरक्षा में भारी बढ़ोतरी करने में मोदी राज की इस ‘सफलता’ के साथ, देश के एक और ऐसी ही नाजुक स्थिति वाले क्षेत्र, उत्तर-पूर्व में नागरिकता कानून में सांप्रदायिक आधार पर संशोधन के अपने प्रस्ताव के जरिए, इस शासन द्वारा पैदा की गयी भारी अशांति को और जोड़ लीजिए।

          इसके साथ ही, बाहरी सुरक्षा के पहलू से भी मोदी राज ने देश को पहले से ज्यादा असुरक्षित ही किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल का खासा बड़ा हिस्सा विदेश दौरों पर और दूसरे देशों में भारतीय समुदाय के बीच अपने प्रचार तमाशों पर खर्च किया है और पांच साल में अमरीका से लेकर चीन तक के शीर्ष नेताओं के साथ आधा-दर्जन से ज्यादा मुलाकातें की हैं। बहरहाल, दुनिया भर में भारत की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जाने के मिथक के उसके सारे प्रचार के बावजूद, भारत की बाहरी असुरक्षा बढ़ी ही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पाकिस्तान के साथ तो भारत के रिश्ते रसातल में चले ही गए हैं, दूसरे अधिकांश पड़ोसी देशों के साथ भी भारत के रिश्ते पहले के मुकाबले कुछ न कुछ बिगड़े ही हैं। जाहिर है कि इनमें मोदी के राज में भारत को, अमरीका के चीन विरोधी मंसूबों के साथ बांधे जाने के चलते, चीन के साथ संबंधों में खटास आना भी शामिल है। अचरज नहीं कि मोदी राज, राष्ट्रभक्ति की अपनी छवि चमकाने की कोशिश में, एक साथ ‘दो मोर्चों पर युद्ध’ के लिए अपने तैयार होने की डींगें हांकता रहा है। लेकिन, वास्तव में आज सुरक्षा तैयारियों की क्या स्थिति है, इसका कुछ अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि रक्षा मामलों से संबंधित संसदीय समिति ने, इसी जनवरी में संसद के सामने पेश की गयी अपनी रिपोर्ट में मोदी सरकार की इसके लिए कड़ी आलोचना की थी कि उसने पूंजी खर्च की मद में रक्षा बलों के लिए इतना प्रावधान भी नहीं किया है जो, उनकी पहले से स्वीकृत देनदारियों को पूरा करने तक के लिए काफी हो। इसके ऊपर से रफाल की खरीद में, अपने दरबारी पूंजीपति को फायदा पहुंचाने के लिए, विमानों का बड़ा हिस्सा देश में ही बनने का रास्ता बंद करने समेत, देश के रक्षा हितों के साथ खुद प्रधानमंत्री द्वारा जो खिलवाड़ किया गया है, वह किसी से भी छुपा नहीं है। इसके साथ ही यह भी जोड़ लें कि मोदी सरकार सैनिकों के सम्मान का स्वांग कितना भी करे, सचाई यही है कि वन रैंक वन पैंशन को लागू करने के उसके झूठ को उजागर करते हुए, पूर्व-सैनिकों के संगठन पिछले वर्षों में लगातार सडक़ों पर रहे हैं। अब तो चुनाव सामने देखकर खुद रक्षा मंत्री ने, ओआरओपी के पालन की समीक्षा करने का वादा भी कर दिया है। रही अर्द्ध-सैनिक बलों की बात तो पुलवामा की दु:खद घटना के बाद, मीडिया और देश का ध्यान इस सचाई की ओर भी गया है कि इन बलों के लिए तो, किसी सुनिश्चित पेंशन तक की व्यवस्था नहीं है।

          अचरज नहीं कि मोदी सरकार, सुरक्षा के सवाल और रक्षा बलों के सम्मान की दुहाइयों की आड़ में, आंतरिक तथा बाहरी सुरक्षा समेत सभी मोर्चों पर अपनी घोर विफलता को, जिसमें नीतिगत विफलताएं भी शामिल हैं, छुपाने की जीतोड़ कोशिश कर रही है। यहां हाथ की सफाई से, सरकार की नीतियों तथा कदमों के नतीजों तथा उनके कारगर होने पर हर तरह के सवालों को, दुश्मन की भाषा बोलने से लेकर, सैनिकों के बलिदान का अपमान तक बना दिया जाता है। और दूसरी ओर उतनी ही सफाई से, रक्षा बलों की हर कार्रवाई को, ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के जरिए, मोदी सरकार से बढ़क़र, खुद मोदी की उपलब्धि बना दिया जाता है। नरेंद्र मोदी को लग रहा है कि राष्ट्रवाद की इस धोखेधड़ी भरी दुहाई और हमलावर राष्ट्रवादी मुद्रा के अपने स्वांग से पैदा होने वाले उन्माद के जरिए, वह देश व जनता के वास्तविक हित के सभी सवालों को बेमानी बना सकते हैं और इसी उन्माद की लहर पर सवार होकर, चंद हफ्तों में होने वाले आम चुनाव में अपनी अन्यथा निश्चित हार को, जीत में बदल सकते हैं। पुलवामा की घटना से शुरू हुए संकट के पूरे दौर में, नरेंद्र मोदी जिस नंगई से जवानों की शहादत से लेकर, रक्षा बलों की कार्रवाइयों तक को राजनीतिक -चुनावी रूप से भुनाने की कोशिश में लगे रहे हैं, यही दिखाता है कि उन्हें अब इस उन्माद का ही सहारा है। नरेंद्र मोदी 2002 में गुजरात में उन्माद से जीत के इस फार्मूले को सफलता से आजमा भी चुके हैं। लेकिन, जैसाकि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद की अपनी एक कविता में कवि प्रयाग शुक्ल ने ध्यान दिलाया था--उन्माद की एक खासियत है कि वह ज्यादा नहीं ठहरता है। चौबीस घंटे के टीवी के इस जमाने में तो और भी नहीं। चुनाव तक यह उन्माद नहीं चल पाएगा। और जैसे-जैसे यह बुखार उतरेगा, देश को सुरक्षित करने में विफलता समेत, नरेंद्र मोदी के राज की विफलताओं को और नंगा करता जाएगा। उसके बाद चुनाव में जनता का क्या फैसला आएगा, यह अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। मोदी-नीतीश की पटना रैली की उल्लेखनीय विफलता ने इसका इशारा भी कर दिया है। 

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