मांस के लिए मवेशी व्यापार पर रोक का हिंदुत्ववादी एजेंडा

इस पाबंदी की सबसे ज्यादा मार साधारण किसानों पर ही पड़ेगी, जो पूरक आय के साधन के तौर पर, दूध के लिए पशु पालन भी करते हैं। ...

राजेंद्र शर्मा

पर्यावरण तथा वन मंत्रालय ने, मांस के लिए मवेशियों की बिक्री पर ही रोक लगाने वाले अपने जो नये नियम अधिसूचित किए, इतने विवादित हुए हैं कि अपने स्वभाव के विपरीत मोदी सरकार को इन नियमों में बड़े संशोधन करने से लेकर पूरे मुद्दे पर ही पुनर्विचार करने तक के अनौपचारिक संकेत देने पड़े हैं। इसके साथ ही इस मुद्दे पर उठे विरोध के ज्वार से बचाव पर पड़ गयी सत्ताधारी भाजपा, कहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश तो कहीं, किसी संसदीय कमेटी की रिपोर्ट की आड़ में इस निर्णय के लिए जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती नजर आयी है। वास्तव में ये झूठे बहाने ही हैं।

उधर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बैंच ने इन नियमों के पालन पर एक महीने के लिए रोक लगा दी है और केंद्र सरकार से पूछा है कि क्यों न उसके आदेश को ही निरस्त कर दिया जाए। हाईकोर्ट का यह फैसला जिस याचिका पर आया है, उसमें विवादित पाबंदियों को, नागरिकों के खान-पान के निर्णय की स्वतंत्रता पर हमला बताया गया है।

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इसके साथ ही याचिका में इस कदम को अपने पेशे या कारोबार का चुनाव करने के नागरिकों के अधिकार का अतिक्रमण बताया गया है।

उक्त दोनों पहलू सार रूप में केंद्र सरकार के विवादित कदम की अधिकांश समस्याओं का समेट लेते हैं।

वैसे अचरज की बात नहीं है कि मवेशियों के खिलाफ क्रूरता के निवारण के नाम पर पूरी तरह से इकतरफा तरीके से थोपे गए उक्त नियमों पर विरोध की सबसे प्रबल आवाज केरल से उठी है। राज्य की एलडीएफ सरकार के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने एक ओर तो प्रधानमंत्री को एक कड़ा पत्र लिखकर, केंद्र सरकार के इस कदम के पीछे काम कर रहे हिंदुत्ववादी सांस्कृतिक एजेंडे को चिन्हित करते हुए, इसे जनता पर नागपुरिया खान-पान संहिता थोपने की कोशिश बताया है, जिसे हर्गिज स्वीकार नहीं किया सकता है।

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दूसरी ओर, उन्होंने इसके पीछे केंद्र सरकार की मर्जी थोपने की सरासर संघीय व्यवस्थाविरोधी कोशिश को चिन्हित करते हुए, देश के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर उनसे, केंद्र सरकार की इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने का अनुरोध किया है।

केरल की ही तरह पश्चिम बंगाल की भी मुख्यमंत्री ने, इस मामले में केंद्र की मनमानी पर कड़ा विरोध जताया है और इस कदम को संविधानविरोधी करार देते हुए, इसे अदालत में चुनौती देने तक की बात कही है।

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याद रहे कि केरल की ही तरह, पश्चिम बंगाल भी देश के उन छ: राज्यों में है, जहां गोकशी पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है। याद रहे कि भारत की संघीय व्यवस्था में भाजपा की केंद्र सरकार, चाहते हुए भी ऐसी कोई पाबंदी नहीं थोप सकती है। इसीलिए, मांस के लिए गाय, बैल, बछड़ा आदि ही नहीं, भेंसों की भी बिक्री पर रोक लगाने के चोर दरवाजे से, इस तरह की पाबंदी थोपने की कोशिश की गयी है।

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कर्नाटक, पुदुचेरी, तमिलनाडु आदि राज्यों से ही नहीं, मेघालय जैसे राज्यों से भी इस मुद्दे पर विरोध की जोरदार आवाज उठी है।

उधर केरल की जनता के बीच इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की दुर्लभ एकता देखने को मिली है और सैकड़ों की संख्या में ‘‘बीफ फेस्टिवलों’’ के आयोजन के जरिए, इस कदम के पीछे के हिंदुत्ववादी मंसूबों का माकूल  जवाब दिया गया है। एक स्थान पर यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की भोंडी तथा संवेदनहीन हरकत के बावजूद, राज्य की जनता का विशाल बहुमत अपनी खान-पान की संस्कृति तथा स्वतंत्रता पर हमले के इस जवाब के साथ है।

बहरहाल, एनडीए के राज में ऐसी कोशिशों में अचरज की कोई बात नहीं है। वास्तव में यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने की पूर्व संध्या में ही चोर दरवाजे से मुख्यत: गाय-भैंस तथा उनके वंशजों के मांस के लिए बेचे जाने पर यह पाबंदी थोपने की कोशिश की गयी है। भेड़, बकरी, मुर्गी आदि के इस पाबंदी के दायरे से बाहर ही रखे जाने से खुद ब खुद साफ हो जाता है कि इन पाबंदियों के पक्ष में पशुओं के साथ क्रूरता के निवारण की दुहाई, एक झूठा बहाना ही है, जबकि असली मंशा कुछ और ही है।

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गोकशी तथा गोमांस के खिलाफ संघ परिवार की पुरानी मुहिम में नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद से जो तेजी आयी है, किसी से छुपी हुई नहीं है। इसी मुहिम के हिस्से के तौर पर एक ओर अगर हरियाणा, महाराष्टï्र आदि की भाजपायी सरकारों ने न सिर्फ गोकशी विरोधी कानूनों को कड़ी सजा के प्रावधानों के साथ और उग्र बनाया है, एक ओर गोमांस रखने तक को अपराध बनाने तथा दूसरी ओर भैंस आदि को भी गोवंश में शामिल करने के जरिए, इन पाबंदियों के दायरे को भी और बहुत बढ़ा दिया है। और इसी मुहिम के एक और हिस्से के तौर पर गोरक्षा के नाम पर हिंदुत्ववादी गुंडागर्दी को, खुद प्रधानमंत्री के रस्मी तौर पर उसकी आलोचना करने बावजूद, विभिन्न स्तरों पर शासन से ऐसा अनुमोदन हासिल हो रहा है कि इसके दायरे में अब, देश के लगभग सभी राज्य आ चुके हैं।

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कथित गोरक्षकों की गुंडागर्दी के हाल के ऐसे ही एक मामले में, मेवाती किसान पहलू खान की राजस्थान में अलवर जिले में हत्या की गयी है। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा अवैध बूचडख़ानों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर, तमाम बूचडख़ानों से लेकर, मांस की दूकानों तक, मांस के तमाम कारोबार पर ही खुला हमला बोले जाने के बाद से, इस मुहिम ने ज्यादा से ज्यादा मुखर रूप से मांसाहारविरोधी चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है।

इसी क्रम में कम से कम दो भाजपाशासित राज्यों, उत्तराखंड तथा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री तो सार्वजनिक रूप से, अपने-अपने राज्य में पूर्ण मांसबंदी लाने की इच्छा भी जता चुके हैं। यही वह पृष्ठïभूमि है जिसमें मोदी सरकार की तीसरी सालगिरह की पूर्वसंध्या में मांस के लिए मवेशियों की बिक्री पर नयी पाबंदियां लगायी गयी हैं।

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नये नियमों के तहत देश भर में और जाहिर है कि इसमें ऐसे राज्य भी शामिल हैं जहां गोकशी पर कोई पाबंदी नहीं है, पशु मंडियों में मांस के लिए गोवंश से लेकर भैंसवंश तक और यहां तक कि ऊंट की बिक्री पर भी, सीधे-सीधे प्रतिबंध ही लगा दिया गया है। अब मंडियों में खेती के उपयोग के लिए ही इन मवेशियों की खरीद-बिक्री की इजाजत होगी। इतना ही नहीं, मवेशी का खेती के उपयोग के लिए ही खरीदा जाना सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी, ये मवेशी इन मंडियों में लाने वाले किसानों पर ही डाल ही दी गयी है। इसके ऊपर से ऐसे खरीदे गए किसी भी पशु के छ: महीने तक दोबारा न बेचे जा सकने की अतिरिक्त शर्त भी लगा दी गयी है।

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सभी जानते हैं कि इस पाबंदी की सबसे ज्यादा मार साधारण किसानों पर ही पड़ेगी, जो पूरक आय के साधन के तौर पर, दूध के लिए पशु पालन भी करते हैं। किसानी अर्थव्यवस्था का यह हिस्सा सामान्यत: इसी आधार पर चलता आया है कि दूध देने के लिहाज से अनुपयोगी हो गए पशुओं को, मांस के लिए बेचकर, उनकी जगह नये दुधारू पशु लाए जाते हैं। यह पाबंदी सीधे-सीधे इसी चक्र को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश करती है।

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बेशक, यह बताने की कोशिश की जा रही है कि उक्त रोक पशु मंडियों में मवेशियों की खरीद-बिक्री पर ही है और किसानों के लिए मांस के लिए मवेशियों को सीधे कट्टीखानों को बेचने का रास्ता फिर भी खुला रहेगा। लेकिन, सचाई इससे बहुत भिन्न है। किसानों के लिए अपने अनुपयोगी पशुओं को पशु मंडी में बेचने का रास्ता बंद किए जाने से, ऐसे पशुओं का बेचा जाना मुश्किल करने के जरिए किसानों पर अतिरिक्त बोझ तो डाला ही जा रहा होगा, इसके  अलावा इसके चलते किसानों को औने-पौने दाम पर ही अपने ये मवेशी बेचने पड़ रहे होंगे। याद रहे कि कथित गोरक्षा मुहिम के दबाव में इन नियमों के बिना भी मवेशियों दाम में पहले ही उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई है।

पशु बाजार को पूंजीघरानों के हवाले करना चाहती है मोदी सरकार

दूसरी ओर, पशु मंडियों के जरिए काम करने वाले बिचौलियों के बीच से हटा  दिए जाने के बाद, किसानों के इस नुकसान से सीधे-सीधे बड़े, कार्पोरेट मांस उत्पादकों को अतिरिक्त लाभ मिल रहा होगा। इन कार्पोरेट खिलाडिय़ों द्वारा तय किए जा रहे घटे हुए दामों पर ही किसान अपने मवेशी उन्हें बेचने के लिए मजबूर होंगे। हां! घरेलू बाजार के लिए काम करने वाले छोटे मांस उत्पादक जरूर, किसानों से सीधे मवेशी हासिल करना महंगा पडऩे के चलते धंधे से ही बाहर हो जाएंगे। इन पाबंदियों का ऐसा ही किंतु असमान असर, चमड़े के कारोबार पर भी पड़ेगा, जहां खासतौर पर छोटा कारोबारी चमड़ा हासिल करना मुश्किल हो जाने से चलते पिट जाएगा, जबकि बड़े कार्पोरेट खिलाडिय़ों की सेहत पर शायद बहुत ज्यादा असर नही पड़ेगा।

इस तरह, देश भर के किसानों के पेट पर और दसियों लाख मजदूरों तथा छोटे कारोबारियों के भी पेट पर लात मारी जा रही है और वह भी सिर्फ खान-पान की संस्कृति में ‘सात्विक आहार’ के हिंदुत्ववादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए। क्या अचरज कि देश भर में और जनता के सभी तबकों के बीच, केंद्र सरकार की इस मनमानी का कड़ा विरोध हो रहा है।      

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