सीपीआई(एम) : स्वार्थों की टकराहट अपने चरम पर

पार्टी की कार्यनीति के बारे में एक ऐसा ज़िद्दी और अटल रवैया शायद दुनिया में कहीं भी किसी ने कहीं नहीं देखा होगा। ...

अरुण माहेश्वरी

आज के अख़बारों की बातों को सच माने तो सीताराम येचुरी को पार्टी के महासचिव पद से हटा कर सीपीआई(एम) पर अपना पूर्ण वर्चस्व कायम करने के लिये आतुर प्रकाश करात गुट के कथित बहुमतवादियों ने केंद्रीय कमेटी की बैठक के तीन दिनों में से अब तक दो दिन सिर्फ एक जिद पर गुज़ार दिये हैं कि पार्टी कांग्रेस के लिये पेश किये जाने वाले दस्तावेज़ में यह बात साफ शब्दों में लिखी होनी चाहिए कि कांग्रेस पार्टी के साथ पार्टी का किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं होगा। मजे की बात यह हैं कि यह माँग तब की जा रही है, जब दोनों गुट ही मोदी और बीजेपी को आज के काल में जनता का सबसे बड़ा शत्रु मान रहे हैं।

पार्टी की कार्यनीति के बारे में एक ऐसा ज़िद्दी और अटल रवैया शायद दुनिया में कहीं भी किसी ने कहीं नहीं देखा होगा। जरूरत पड़ने पर बड़े हितों के लिये दुनिया के बड़े से बड़े दुश्मन से भी हाथ मिलाना ही राजनीति और कूटनीति का एक ध्रुव सत्य माना गया है। कथित बहुमतवादियों की यह अस्वाभाविक ज़िद अकेली इस बात का प्रमाण लगती है कि इसके पीछे के इरादे सैद्धांतिक कत्तई नहीं है। ये शुद्ध रूप से गुटबाज़ी से प्रेरित, निजी हैं। इसीलिये आज के ‘टेलिग्राफ़’ के अनुसार, वोटिंग के बूते अन्य विचारों को मात देने के अभ्यस्त इस गुट ने इस बार भी विचारों को नहीं, अपने संख्याबल को ही अपनी शक्ति बनाने का निर्णय लिया है। इसकी तैयारी के लिये ये केरल से बुरी तरह से बीमार ऐसे सदस्य को भी केंद्रीय कमेटी की बैठक में ले आये हैं जो बहस में हिस्सा लेने की अवस्था में नहीं है, लेकिन मतदान में जरूर हिस्सा लेंगे।

गुटबाज़ी का यह घिनौना रूप भारतीय वामपंथ के इतिहास के उस शर्मनाक अध्याय की याद दिलाने लगता है, जब पार्टी के अध्यक्ष एस ए डांगे ने संयुक्त पार्टी के अंदर के अपने विरोधियों को चीन का दलाल बता कर सन् ‘62 के चीन के युद्ध के वक्त गृहमंत्री गुलज़ारी लाल नंदा के जरिये उनमें से कइयों को सालों तक जेल में बंद करवा दिया था।

पार्टी में ऐसी गुटबाज़ी एक शुद्ध स्वार्थपूर्ण और शरारतपूर्ण खेल के अतिरिक्त और कुछ नहीं होती है। हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि जिस बहुमतवादी गुट ने आज कांग्रेस से कोई समझौता न करके चलने का झूठा सैद्धांतिक प्रपंच रचा है, वही पार्टी के सचिव पद से सीताराम को हटा कर अपना पूर्ण प्रभुत्व कायम करने के उपरांत वह सब कुछ खुल कर करेगा, जिसके विरुद्ध लड़ाई का वह अभी स्वाँग भर रहा है। और तब अचानक ही परिस्थिति में आ गये बदलाव की दलील देने में इन्हें कोई हिचक नहीं होगी। इसे नहीं भूलना चाहिए कि प्रकाश करात के नेतृत्व के काल में ही यूपीए-1 में सीपीआई(एम) शामिल हुई थी।

बहरहाल, आज की ख़बरों के अनुसार, आगामी पार्टी कांग्रेस के लिये पार्टी सदस्यों के विचार के लिये दो प्रस्ताव पेश किया जाना लगभग तय है, यदि इसे किसी और तरीक़े से अटकाया नहीं जाता है तो। यह सीपीआई(एम) में सीधी दरार के लक्षण है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके मूल में कोई सिद्धांत नहीं, पार्टी के ढाँचे और संसाधनों पर क़ब्ज़ा ज़माने का लालच ही मुख्य रूप से काम कर रहा है, यह इसका सबसे दुखद पहलू है।

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