दलित-मुस्लिम एकता के लिए डॉ. आंबेडकर को अनुसरण करने की जरूरत

मायावती जी को याद रखना होगा कि यह एकता महज भावनात्मक नहीं, शासन-प्रशासन और उद्योग-व्यापार सहित अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में वाजिब भागीदारी के साझा एजेंडे से ही मजबूत और दीर्घस्थाई हो सकती है।...

अतिथि लेखक

एच.  एल.  दुसाध

भाजपा-कांग्रेस के शासन में दलित-मुस्लिमों पर उत्पीड़न बढ़ा

गत 10 फरवरी को देश के कई अखबारों में अमेरिका की एक स्वतंत्र संस्था की एक ऐसी रिपोर्ट छपी थी,  जिससे पता चलता है 2014 के बाद से देश दोनों सवर्णवादी राष्ट्रीय पार्टियों –भाजपा और कांग्रेस-के शासन में दलित और मुस्लिमों पर भेदभाव व शोषण-उत्पीड़न बढ़ा है। इस रिपोर्ट ने बहुजन बुद्धिजीवियों का ध्यान बड़े पैमाने पर आकर्षित किया।    

विदेशों में धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की निगरानी करने वाली अमेरिका की इस स्वतंत्र संस्था,  अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अमेरिकी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत में वर्ष 2014 के बाद नाटकीय रूप से घृणा अपराधों, सामाजिक बहिष्कार और जबरन धर्मांतरण बढ़ गया है।

कांग्रेस पार्टी और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों में अपरिभाषित कानूनी, अप्रभावी आपराधिक न्याय तंत्र और विधिशास्त्र में संगति के अभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और दलितों ने भेदभाव और उत्पीड़न का सामना किया।

’भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामने संवैधानिक और कानूनी चुनौतियाँ’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में अमेरिकी सरकार से यह सिफारिश की गयी है कि वह भारत के साथ सभी तरह के व्यापार, सहायता और कूटनीतिक बातचीत के समय धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को केंद्र में रखे।

आयोग के अध्यक्ष थॉमस जे रिज ने कहा है,

’भारत एक ऐसे संविधान के साथ धार्मिक आधार पर विविध और लोकतांत्रिक समाज है जो उसके नागरिकों को उनके धर्म के आधार पर क़ानूनी समानता देता है और धर्म के आधार पर रोक लगाता है। हालांकि असलियत इससे भिन्न है। भारत की बहुलतावादी परंपरा कई राज्यों में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।’

H L Dusadh22 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में भारत से आग्रह सरकार किया गया है वह धर्मान्तरण रोधी कानूनों में सुधार करे और यह माने कि बल प्रयोग, धोखे या लालच से कराया गया धर्मांतरण और फिर से धर्म परिवर्तन समान रूप से बुरा है। साथ ही धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए आयोग की सिफारिशों को लागू करने का अनुरोध किया है।’

  बहरहाल विदेशों में धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की निगरानी करने वाली अमेरिकी संस्था की रिपोर्ट में जो तथ्य उभर कर आया है उससे आंबेडकरवादी जरा भी विस्मित नहीं हैं। दलित और मुसलमानों के साथ भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न का यह सिलसिला पूरे आजाद भारत में जारी रहा जो 2014 से मोदीराज में बढ़ गया है। लेकिन आजाद भारत में दलित और मुसलमानों को यह दिन देखना पड़ेगा, इसकी विशवास पूर्वक सटीक भविष्यवाणी बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने अंग्रेज भारत में ही कर दिया था। उन्होंने स्वाधीनोत्तर भारत की चिंताजनक तस्वीर को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज भारत में एकाधिक अवसरों पर कहा था,

’यदि ब्राह्मणी अल्पमत सत्ता में आ गयी तो उसके अस्पृश्यों के लिए बुरे परिणाम ही निकलेंगे। यदि भारत में जनतंत्र को सफल बनाना है तो उसे हिन्दू अनुदारवादियों द्वारा दुरूपयोग से बचाना है। उन्होंने गैर-ब्राह्मण लोगों को आह्वान किया कि वे पुनः संगठित होकर दल बनायें ताकि वे भी एक ताकत बन सकें’।

(धनंजय कीर, डॉ. आंबेडकर :लाइफ एंड मिशन, पृष्ठ-354-55)

लेकिन अल्पमत ब्राह्मणी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अस्पृश्य-आदिवासियों, पिछड़ों एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों को संगठित करने की जो योजना बनाई, वह पंडित नेहरु की तिकड़मी चालों (आरएल चंदापुरी, भारत में ब्राह्मणराज और पिछड़ा वर्ग आन्दोलन , पृष्ठ-114) एवं उनके असामयिक निधन के कारण विफल हो गयी। लेकिन पिछड़े वर्ग के विद्वान नेता आरएल चंदापुरी के अनुसार अगर डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू उर्फ़ ब्राह्मणराज के खात्मे के लिए दलित-पिछड़ों के साथ अल्पसंख्यकों को भी संगठित करने की योजना बनाया था तो लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा हो सकता है कि उन्होंने दिसंबर 1940 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का बंटवारा’ में निम्न तर्कों के आधार पर मुसलामानों के लिए पृथक राष्ट्र का समर्थन ही क्यों किया!   

  ‘मैं नहीं सोचता पाकिस्तान की मांग मात्र राजनीतिक अस्वस्थ्यता का परिणाम है जो समय आने पर बह जाएगी। ’’मुसलमान’एक राष्ट्र हैं,  यह बिना नुक्ताचीनी के स्वीकार कर लेना चाहिए’। चूंकि मुसलामानों में एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा विकसित हो चुकी है, उन्हें एक ऐसा क्षेत्र मिलना चाहिए जहां वे रह सकें और अपना एक राज्य स्थापित कर सकें, अर्थात राष्ट्र को सांस्कृतिक घर बना सकें ‘। ’अनुभव यह सिद्ध कर चुका है कि हिन्दू बहुमत मुसलमानों को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में मानने का प्रयास करता है मानों कि वे विदेशी राज्य के हैं। ’

  दरअसल उपरोक्त तर्कों की रोशनी में डॉ. आंबेडकर ने पाकिस्तान के निर्माण का जो समर्थन .किया था, वह उनके विवेक से प्रेरित युक्ति थी, लेकिन उनके दिल की जो चाह थी वह ‘डॉ. बाबा साहेब राइटिंग्स एंड स्पीचेज के खंड-8 के पृष्ठ 358-59 पर प्रतिबिम्बित हुई है। ये पृष्ठ पाकिस्तान या भारत के बंटवारा का ही अंश हैं, जहां तथ्य, तत्व व युक्ति के आधार पर वे अवाम को समझाने की चेष्टा करते हुए कहते हैं-

‘चूंकि स्वराज हिन्दुराज की प्रतिष्ठा करेगा इसलिए पाकिस्तान चाहिए ही!... सचमुच यदि हिन्दुराज हकीकत का रूप लेता है तो निःसंदेह ही देश के लिए चरम दुर्भाग्यजनक घटना होगी। हिन्दू चाहे कुछ भी कहें हिन्दुइज्म स्वाधीनता, समता और बधुत्व के लिए आफत है, इसलिए यह जनतंत्र के भी प्रतिकूल है। ऐसे में हर कीमत पर हिन्दुराज को रोकना होगा। लेकिन उसके लिए क्या पाकिस्तान ही आखिरी समाधान है?’

अपने इस सवाल का खुद ही जवाब देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था,

’हिन्दुराज का भूत हमेशा के लिए दफ़न करने के लिए जरूरी है कि मुस्लिम लीग को भंग कर दिया जाय। पाकिस्तान तैयार करना नहीं! भारत में हिन्दू एवं मुसलमानों का एक मिला जुला दल तैयार करना बिलकुल ही कठिन कार्य नहीं है। हिन्दू समाज में जो असंख्य छोटी जातियों की जनता है उसकी सामाजिक, राजनीतिक एवं अर्थनैतिक समस्या बहुसंख्य मुसलमानों जैसी ही है और ये एक ही मकसद से मुसलमानों के साथ मिलकर एक बड़ा आन्दोलन संगठित करने के लिए बहुत इच्छुक होंगे। वे कत्तई उन उच्च वर्ण हिन्दुओं के साथ मिलना पसंद नहीं करेंगे जिन्होंने युगों-युगों से उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित कर रखा है’।

 आधुनिक इतिहास से अनभिज्ञ बहुत से लोगों को लग सकता है कि डॉ. आंबेडकर ने मौका माहौल देखकर ही उपरोक्त मंतव्य 1940 के दिनों में दिया था। नहीं! दलित-अल्पसंख्यक एकता का जो सूत्र डॉ. आंबेडकर ने विकसित किया वह साझा स्वार्थ पर आधारित था और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश काल से ही वे इसके आधार पर अल्पसंख्यकों की हिमायत करते रहे, जिसका साक्ष्य 31 दिसंबर, 1930 को, अल्पसंख्यक उप-समिति की बैठक में जाहिर किया गया उनका यह विचार है।

’वैसे मैं जानता हूँ कुछ मामलों में दलित वर्गों की हालत भारत के बाकी अल्पसंख्यकों जैसी ही है। दलित वर्गों की तरह अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह भय है कि भारत का भावी संविधान इस देश की सत्ता को जिन बहुसंख्यकों के हाथों में सौंपेगा, वे और कोई नहीं रुढ़िवादी हिन्दू ही होंगे। इन्हें आशंका है कि ये रुढ़िवादी हिन्दू अपनी रुढियों और पूर्वाग्रहों को नहीं छोड़ेंगे। और जबतक वे अपनी रुढियों , कट्टरपन और पूर्वाग्रहों को नहीं छोड़ते , अल्पसंख्यकों के लिए न्याय, समानता और विवेक पर आधारित समाज एक सपना ही बना रहेगा। अल्पसंख्यकों को इस बात का खतरा है कि कानून बनाने में , प्रशासनिक कार्यों में या अन्य नागरिक अधिकारों के मामले में उनके साथ पक्षपात बरता जा सकता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था को जानना आवश्यक है , जिससे अल्पसंख्यकों का हितरक्षण हो सके और इनके साथ-साथ भविष्य में पक्षपात का खतरा न रहे। इसके लिए अल्पसंख्यकों को विधायिका और कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व दिया जाय। देश की सार्वजनिक सेवाओं(नौकरियों) में प्रतिनिधित्व मिले। भविष्य में बहुसंख्यक अपने विधाई अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए ऐसा कानून न बना पायें जो व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भेदभाव करता हो । इसके लिए संविधान में ऐसा प्रावधान होना चाहिए , जो भावी केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान मंडलों में बहुसंख्यकों के विधाई अधिकारों पर अंकुश लगाये, उन्हें ऐसा कानून बनाने से रोके जो अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपात के परिचायक हों। पक्षपात का यह खतरा सभी अल्पसंख्यक वर्गों के समक्ष है। अतः मैं दलित वर्ग के प्रतिनिधि की हैसियत से इस मामले में अन्य अल्पसंख्यक वर्गों की मांगों का समर्थन करता हूँ

(बाबा साहेब आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड-5, पृष्ठ 43-44)’।

सार्वजनिक जीवन में प्रवेश-काल से डॉ. आंबेडकर की खुली हिमायत का प्रतिदान देने में मुस्लिम समुदाय ने कोई कंजूसी नहीं। महाद तालाब आन्दोलन के लिए जब कोई हिन्दू तैयार नहीं हुआ, शामियाना लगाने की जगह देने के लिए मुस्लिम समुदाय ही आगे आया। श्री गोविन्द मालवीय की तीखी आलोचना के बावजूद, उनके सिद्धार्थ कॉलेज की स्थापना के लिए मुसलमान सेठ हुसैन जी 50 हजार रुपया चंदा और सर काउस जी जहाँगीर आवश्यक सहयोग के साथ सामने आये आये। लेकिन डॉ। आंबेडकर को संविधान सभा में भेजने में मुस्लिम लीग ने जो सहयोग किया वह तो सिर्फ दलित ही नहीं आदिवासी, पिछड़े और जन्म के आधार पर वंचना का शिकार बनाये गए दुनिया के तमाम मानव समूहों की तकदीर संवारने वाली एक ऐतिहासिक घटना साबित हुई। बहरहाल 2014 के बाद से दलित और मुसलमानों पर जो शोषण और जुल्म बढ़ा है,  उसका एकमेव प्रतिकार दलित-मुस्लिम एकता में ही निहित है। जिस तरह मोदी के क्लोन ट्रंप ने साथ मुस्लिम बहुल देशों के लोगों के अमेरिका में प्रवेश वर्जित किया एवं जिस तरह मोदी की भाजपा ने वर्तमान यूपी चुनाव में एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार नहीं गया उससे पूरी दुनिया में इस्लाम के अनुयायियों के प्रति अविश्वास का माहौल पनपा। किन्तु ऐसे माहौल में जिस तरह बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी पार्टी की ओर से चुनाव में सौ मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर मुस्लिम समुदाय के प्रति भरोसा जताया, उससे दलित-मुस्लिम एकता में एक नया अध्याय जुड़ा है। किन्तु दलित-मुस्लिम एकता के नए अध्याय की शुरुआत करने वाली मायावती जी को याद रखना होगा कि यह एकता महज भावनात्मक नहीं, शासन-प्रशासन और उद्योग-व्यापार सहित अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में वाजिब भागीदारी के साझा एजेंडे से ही मजबूत और दीर्घस्थाई हो सकती है।

इसके लिए डॉ. आंबेडकर के 31 दिसंबर, 1930 को अल्पसंख्यक उप-समिति की दूसरी बैठक में दिए गए भाषण से प्रेरणा लेने की जरूरत है।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।              

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