दलित ओबीसी अगर मुसलमानों को अपने साथ देखना चाहता है तो फिर वह कौन से हिंदू हैं जो मुसलमान देखकर बिदक जाएंगे

दलित ओबीसी अगर मुसलमानों को अपने साथ देखना चाहता है तो फिर वह कौन से हिंदू हैं जो कथित सेक्युलर दलों में मुसलमानों की सक्रियता देखकर बिदक जाएंगे...

दलित ओबीसी अगर मुसलमानों को अपने साथ देखना चाहता है तो फिर वह कौन से हिंदू हैं जो मुसलमान देखकर बिदक जाएंगे

दलित ओबीसी अगर मुसलमानों को अपने साथ देखना चाहता है तो फिर वह कौन से हिंदू हैं जो कथित सेक्युलर दलों में मुसलमानों की सक्रियता देखकर बिदक जाएंगे

मसीहुद्दीन संजरी

'मुसलमानों ज्यादा दिखेंगे तो हिंदू वोटर नाराज़ हो जाएगा' का प्रचार कथित सेक्युलर दलों के नेता और कई बार उन दलों के मुस्लिम नेता भी करते नज़र आ जाएंगे। लेकिन यह पूरी तरह झूठ और मुसलमानों को हाशिए पर रखने की साजिश के अलावा कुछ नहीं है।

पूर्वांचल के करीब दर्जन भर जनपदों में लोगों से मिलने और वर्तमान राजनीतिक हालात पर बात करने पर सरकार की दमनकारी नीतियों और सत्ता समर्थित गुंडागर्दी के खिलाफ गुस्सा देखने को मिला। यह आक्रोश दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग में बिल्कुल साफ महसूस किया जा सकता है।

जनता यह जानने के लिए बेचैन थी कि दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के वोट बिखरने से रोकने के लिए कुछ हो रहा है या नहीं।

लिंचिंग का वीडियो बना कर मुसलमानों को भयग्रस्त रखने की कोशिशों के बावजूद दलितों और पिछड़ा वर्ग खासकर यादव और कुछ अन्य जातियों में सामंती दमन को लेकर जो खौफ देखने को मिला, मुसलमानों में अभी उस हद तक डर का माहौल नहीं है। उनके दमन का वीडियो बनाकर प्रचारित नहीं किया जा रहा है लेकिन तथ्य बताते हैं कि मात्र डेढ़ साल पहले सत्ता में रहने वालों का उसी सत्ता का हवाला देकर अभूतपूर्व दमन हो रहा है। उन्हें यह आशंका सताती है कि कही मुस्लिम भाइयों का वोट बंट ना जाए।

दलित ओबीसी अगर मुसलमानों को अपने साथ देखना चाहता है तो फिर वह कौन से हिंदू हैं जो कथित सेक्युलर दलों में मुसलमानों की सक्रियता देखकर बिदक जाएंगे।

दरअसल यह एक सोची समझी चाल है मुसलमानों को राजनीतिक गुलाम बना कर रखने की। तय जनता को करना है लेकिन यदि इनके साथ जाना है तो ऐसे नेताओं के सामने समर्थन के लिए कम से कम 'चुनावों में दिखने वाली अपनी सक्रिय भागीदारी' की शर्त अवश्य रखनी चाहिए।

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