दिल्ली विश्वविद्यालय में तदर्थवाद अविलम्ब समाप्त हो

इससे ज्यादा आपत्तिजनक कुछ नहीं हो सकता कि किसी कॉलेज का प्रधानाचार्य डूटा के प्रतिनिधियों/शिक्षक एक्टिविस्टों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस का सहारा ले....

प्रेम सिंह

(हिंदी विभाग  )

      मोती लाल नेहरू कॉलेज में तदर्थ शिक्षकों को निकाल कर नई बहाली की प्रक्रिया करने की घटना के पीछे के कारणों की मुझे जानकारी नहीं है. आशा की जानी चाहिए कि जो शिक्षक वहां पढ़ा रहे थे उन्हें फिर से रख लिया जाए. इससे ज्यादा आपत्तिजनक कुछ नहीं हो सकता कि किसी कॉलेज का प्रधानाचार्य डूटा के प्रतिनिधियों/शिक्षक एक्टिविस्टों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस का सहारा ले.

      दिल्ली विश्वविद्यालय का शिक्षक होने के नाते मेरा मानना है कि यहाँ दशकों से चल रहा तदर्थवाद तत्काल ख़त्म होना चाहिए. यह सभी को पता है कि सरकारों का शिक्षा का निजीकरण 'स्थायी' करने और शिक्षकों का नियमितीकरण ख़त्म करने का फैसला है. अगर 5-10-15 साल से तदर्थ पढ़ाने वाले शिक्षकों की वर्कलोड के बावजूद स्थायी नियुक्ति नहीं होनी है तो डूटा, विभागाध्यक्षों, प्रधानाचार्यों और वाईस चांसलर को उन्हें साफ़ कह देना चाहिए कि तदर्थ शिक्षकों की नियति यही है. साथ ही यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि वे सरकार के फैसले के साथ हैं अथवा उसे बदलवाने की स्थिति में नहीं हैं. हालांकि उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि अगर ये हालात उनके रहते तो वे आज जहाँ हैं, वहां कैसे पहुँच पाते!

      मेरा सुझाव है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में जारी तदर्थवाद को तुरंत ख़त्म कर सभी तदर्थ शिक्षकों को नियमित करने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू होना चाहिए. प्रत्येक दिन सात शिक्षक, जिनमें ज्यादा संख्या स्थायी शिक्षकों की रहे, उपवास पर बैठें. जो शिक्षक अवकाश प्राप्त कर चुके हैं, वे भी धरने में हिस्सेदारी करें और अपना नेतृत्व दें तो बेहतर होगा.

      मांग आसानी से मानी जाने वाली नहीं है. लिहाज़ा, इसे दुनियां का अभी तक का सबसे बड़ा धरना होने दीजिये. दिल्ली विश्वविद्यालय से उठी आवाज़ पूरे देश के शिक्षकों तक जायेगी. धरना डूटा के तत्वाधान में होना चाहिए और सभी शिक्षक मंचों को इसमें एकजुटता दिखानी चाहिए. अगर यह संभव नहीं हो पाता है तो शिक्षकों की एक समिति बना कर उसके तत्वाधान में यह प्रतिरोध शुरू होना चाहिए.

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