डेमोक्रेसी को लोकतंत्र नहीं, प्रजातंत्र कहने वाले हुक्मरानों के खिलाफ किसानों को एकजुट होना होगा

पूरे देश में किसान आंदोलित हैं। कई जगह तो विरोध बहुत ही उग्र रूप ले चुका है, लेकिन सत्ता में बैठे लोग संवेदनहीन आचरण करते हैं।

शेष नारायण सिंह
Updated on : 2018-06-08 12:37:36

शेष नारायण सिंह

मंदसौर के किसानों पर पिछले साल छ: जून को गोलियां चली थीं और छह किसान मार डाले गए थे। उस घटना को एक साल हो गया। पिछले साल भी वारदात के बाद राहुल गांधी ने वहां जाने की कोशिश की थी, लेकिन रास्ते में रोक लिए गए थे। इस बार वहां जाकर उन्होंने भाषण दिया और किसानों के घाव पर मरहम लगाने की कोशिश की। मंदसौर में किसानों की नाराजगी को लेकर मध्यप्रदेश की राज्य सरकार का रुख हमेशा से ही गैरजिम्मेदाराना रहा है। पूरे देश में किसान आंदोलित हैं। कई जगह तो विरोध बहुत ही उग्र रूप ले चुका है, लेकिन सत्ता में बैठे लोग संवेदनहीन आचरण करते हैं। इसके बावजूद सरकार और उनकी हर गतिविधि के बारे में खबर देने वाले मीडिया को किसानों के आन्दोलन में केवल वही बात खबर लायक लगती है जिसके कारण अब शहरों में सब्जी और दूध की किल्लत हो जाएगी या कीमतें बढ़ जाएंगी। उसको पैदा करने वाले किसान पर क्या गुजर रही है, यह बात एकाध चैनल को छोड़कर कहीं भी चर्चा का विषय नहीं बन रही है।

सरकारी अफसर, मंत्री, सत्ताधारी पार्टियों के नेता जब न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात करते हैं तो उनकी शब्दावली बहुत ही तकलीफदेह होती है। उनकी बात इस तर्ज पर होती है कि हमने किसानों को बहुत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य दे दिया है। कई बार तो ऐसे लगता है जैसे किसी अनाथ को या भिखारी को कुछ देने की बात की जा रही हो। यह किसान का अपमान है और उसकी गरीबी का मजाक है। इस प्रवृत्ति को खतम किया जाना चाहिए लेकिन यह उम्मीद करना ठीक नहीं है कि शासक वर्ग इस संवेदनहीनता से बाज आएगा। वह अपने को दाता समझने लगा है और वह किसान को प्रजा समझता रहेगा। मैंने सभी पार्टियों के बहुत सारे नेताओं को जनता को प्रजा कहते देखा और सुना है। यह लोग डेमोक्रेसी को लोकतंत्र नहीं, प्रजातंत्र कहते हैं। इस तरह के संवेदनहीन नेताओं से सभ्य आचारण की उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि इस हालत को दुरुस्त नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए मौलिक रूप से कुछ सोचने की जरूरत है।

नेता, जनता के वोट की मदद से सत्ता पाते हैं। अजीब बात है कि जिस देश में सत्तर प्रतिशत आबादी किसानों की है वहां यह सत्ताधीश सबसे ज़्यादा उसी किसान को बेचारा बना देते हैं। इसका कारण यह है कि सरकार चुनते हुए इस देश में कहीं भी कोई भी इंसान किसान नहीं रह जाता। वह जातियों में बंट जाता है और कहीं जाट, कहीं राजपूत, कहीं दलित, कहीं यादव, कहीं ब्राह्मण और भी बहुत सी जातियों में बंट कर वोट देता है। उसके बिखराव का नतीजा यह होता है कि उसके हितों की अनदेखी करके सरकारें उसके वर्ग शत्रु के हित में काम करती हैं। अभी खबर आई है कि सरकार ने गन्ना किसानों के लिए साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है। इस खबर को पेश इस तरह से किया जा रहा है जैसे किसानों को उनकी मुसीबत से उबार लिया गया है।

सच्चाई यह है यह साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये वास्तव में चीनी मिल मालिकों के लिए हैं। शायद ऐसा इसलिए है कि चीनी मिल मालिकों के संगठन बहुत ही ताकतवर हैं और वे सरकार पर दबाव डालने की हर तरकीब जानते हैं जबकि किसानों के संगठन संघर्ष के समय तो साथ रहते हैं लेकिन वोट डालते समय जातियों में बंट जाते हैं। इसलिए वे किसान के रूप किसी भी चुनावी नतीजे को प्रभावित नहीं कर पाते।

किसानों के हित के लिए सरकार में जो भी योजनाएं बनती हैं वे किसानों को अनाज और खाद्य पदार्थों के उत्पादक के रूप में मानकर चलती हैं। नेता किसान को सम्पन्न नहीं बनने देना चाहते। इस मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। किसानों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि किसान को उसकी लागत का मूल्य नहीं मिलता। इसका कारण यह है कि किसान के लिए बनी हुई संस्थाएं उसको प्रजा समझती हैं। न्यूनतम मूल्य देने के लिए बने संगठन, कृषि लागत और मूल्य आयोग का तरीका वैज्ञानिक नहीं है। वह पुराने लागत के आंकड़ों की मदद से आज की फसल की कीमत तय करते हैं जिसकी वजह से किसान ठगा रह जाता है। फसल बीमा भी बीमा कंपनियों के लाभ के लिए डिजाइन किया गया है।

खेती की लागत की चीजा की कीमत लगातार बढ़ रही है लेकिन किसान की बात को कोई भी सही तरीके से नहीं सोच रहा है जिसके कारण इस देश में किसान तबाह होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों में जीडीपी में तो वृद्धि हो रही है जबकि खेती की विकास दर बहुत कम हैं, कभी-कभी तो नकारात्मक हो जाती हैं। किसानों को जो सरकारी समर्थन मूल्य मिलता है वह भी लागत मूल्य से कम है और ज़्यादातर जिलों में सरकारी खरीद ही नहीं हो रही है। निजी हाथों में फसल बेचने पर जो दाम मिलता है बहुत कम होता है।

किसानों की सम्पन्नता के लिए कैश क्राप की बातें की गई थीं। इन फसलों के लिए किसानों को लागत बहुत ज्यादा लगानी पड़ती है। कैश क्राप के किसान पर देश के अंदर हो रही उथल-पुथल का उतना ज्यादा असर नहीं पड़ता जितना कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव का पड़ता है। जब उनके माल की कीमत दुनिया के बाजारों में कम हो जाती है तो उसके सामने संकट पैदा हो जाता है। वह अपनी फसल में बहुत ज़्यादा लागत लगा चुका होता है। लागत का बड़ा हिस्सा कर्ज़ के रूप में लिया गया होता है। माल को रोकना उसके बूते की बात नहीं होती। सरकार की गैरजाम्मेदारी का आलम यह है कि खेती के लिए कर्ज़ लेने वाले किसान को छोटे उद्योगों के लिए मिलने वाले कर्ज़ से ज्यादा ब्याज देना पड़ता है।

एक बार भी अगर फसल खराब हो गई तो दोबारा पिछली फसल के घाटे को संभालने के लिए वह अगली फसल में ज्यादा पूंजी लगा देता है। अगर लगातार दो-तीन साल तक फसल खराब हो गई तो मुसीबत आ जाती है। किसान कर्ज़ के भंवरजाल में फंस जाता है, जिसके बाद उसके लिए बाकी जिंदगी बंधुआ मजदूर के रूप में कर्ज़ वापस करते रहने के लिए काम करने का विकल्प रह जाता है। किसानों की आत्महत्या के कारणों की तह में जाने पर पता चलता है कि ज़्यादातर समस्या यही है। इसलिए जरूरी यह है कि सरकार की तरफ से किसानों को जीरो ब्याज दर पर कर्ज़ देने की व्यवस्था तुरंत कराई जाए। अगर जरूरी हो तो कर्ज़ देने वाले बैंकों को ब्याज की रकम सरकार अदा कर दे। आखिर माल्या, मोदी, चौकसी तो सारा ही हड़प करके बैठे हैं और सबको मालूम है उनका हड़पा हुआ धन डूब चुका है।

सच्ची बात यह है कि जब तक इस देश के किसान खुशहाल नहीं होगा तब तक अर्थव्यवस्था में किसी तरह की तरक्की के सपने देखना बेमतलब है। इसके लिए जब तक खेती में सरकारी निवेश नहीं बढ़ाया जाएगा, भण्डारण और विपणन की सुविधाओं के ढांचागत निवेश का बंदोबस्त नहीं होगा तब तक इस देश में किसान को वहीं कुछ झेलना पड़ेगा जो अभी वह झेल रहा है। एक बात बिल्कुल अजीब लगती है कि शहरी मध्यवर्ग के लिए हर चीज महंगी मिल रही है जिसको किसान ने पैदा किया है। उस चीज को पैदा करने वाले किसान को उसकी वाजिब कीमत नहीं मिल रही है। किसान से जो कुछ भी सरकार खरीद रही है उसका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है। किसान को उसकी लागत नहीं मिल रही है और शहर का उपभोक्ता कई गुना ज्यादा कीमत दे रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि बिचौलिया मज ले रहा है। किसान और शहरी मध्यवर्ग की मेहनत का एक बड़ा हिस्सा वह हड़प रहा है। और यह बिचौलिया गल्लामंडी में बैठा कोई आढ़ती नहीं है। वह देश का सबसे बड़ा पूंजीपति भी हो सकता है और किसी भी बड़े नेता का व्यापारिक पार्टनर भी। इस हालत को संभालने का एक ही तरीका है कि जनता अपनी लड़ाई खुद ही लड़े। उसके लिए उसे मैदान लेना पड़ेगा और सरकार की पूंजीपतिपरस्त नीतियों का हर मोड़ पर विरोध करना पड़ेगा।

लेकिन यह बहुत ही कठिन डगर है। सरकार को किसानों का नुकसान करने से रोकने के लिए जरूरी है कि सरकार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराया जाए। सत्ताधीशों के मन में यह डर पैदा हो कि अगर किसान की अनदेखी की गई तो सत्ता ही हाथ से निकल जाएगी। इस मकसद को हासिल करने के लिए किसानों को किसान जाति के रूप में संगठित होना पड़ेगा। किसान को लामबंद होना पडेगा। जो सरकारें अपने मित्र पूंजीपतियों के लिए बैंकों से बड़ी से बड़ी रकम कर्ज़ में लेने के लिए उत्साहित करती हैं और नेता सरकार में रहने पर बाद में उसको मा$फ कर देते हैं या भुला देते हैं लेकिन किसान के लिए उनके पास कमाई की कीमत भी उपलब्ध करवाना संभव नहीं होता। किसान संगठनों को सरकार को मजबूर करना पड़ेगा कि खेती में सरकारी निवेश बढ़ाया जाएगा, भण्डारण और विपणन की सुविधाओं का पुख्ता इंतजाम किया जाए और किसान अपनी फसल का सही दाम ले और किसान को खेती से सम्पन्नता का रास्ता खुले।

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