प्रतिकूल न्याय : हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है सरकार की बहुसंख्यकवादी राजनीति

जज लोया की मौत से जुड़े विवाद ने संदेह और गहरा किया है. अब तो सुप्रीम कोर्ट भी गड़बड़ियों का संज्ञान लेने को तैयार नहीं दिखती

इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली
Updated on : 2018-05-08 22:29:52

प्रतिकूल न्याय : हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है सरकार की बहुसंख्यकवादी राजनीति

कई आतंकवादी विरोधी मामले में जो चीजें हुई हैं, वह भारतीय न्याय व्यवस्था की गिरावट को दिखाता है. स्वामी असीमानंद, माया कोडनानी, मक्का मस्जिद विस्फोट केस, नरोदा पाटिया दंगा केस, सोहराबुद्दीन केस और तुलसीराम प्रजापति केस के आरोपी जिस तरह से बरी हुए हैं, उससे न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं. इससे यह लगता है कि सरकार न्यायिक प्रक्रिया को नीचा दिखाना चाह रही है.

16 अप्रैल, 2018 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत ने मक्का मस्जिद विस्फोट मामले में असीमानंद और चार दूसरे लोगों को बरी कर दिया. जज ने सबूतों की कमी को निर्णय का आधार बनाया. मई, 2007 में हैदराबाद के चारमीनार के पास 17वीं सदी के मक्का मस्जिद में विस्फोट हुआ था और इसमें शुक्रवार की नमाज के लिए जमा हुए लोगों में से नौ लोग मारे गए थे और 58 घायल हुए थे. पहले तो पुलिस ने निर्दोष युवाओं को गिरफ्तार किया और उन्हें प्रताड़ित करके यह स्वीकार कराने की कोशिश की कि इसके पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ था. लेकिन जब सीबीआई जांच शुरू हुई तो पता चला कि हिंदू आतंकवादियों ने यह काम किया है.

मुख्य अभियुक्त असीमानंद ने 2010 में दस्तखत के साथ दिए बयान में और कैरावैन पत्रिका को दिए साक्षात्कार में यह स्वीकार किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेताओं और विभिन्न हिंदुवादी संगठनों की इसमें भागीदारी रही है ताकि वे मुसलमानों को निशाना बनाकर अपना एजेंडा चला सकें. 2011 में यह मामला एनआईए को सौंपा गया और यह उम्मीद थी कि जितने ठोस सबूत हैं उनके आधार पर अभियुक्तों को सजा हो जाएगी. लेकिन हाल के समय में एनआईए ने अभियुक्तों को अपने बयान से पीछे हटने की सुविधा दी और सारे सबूत तहस-नहस हो गए. ऐसे में विशेष अदालत का यह निर्णय अपेक्षित तो था लेकिन हैरान करने वाला भी है.

2002 में नरोदा पाटिया में दंगा भड़काने के मामले में गुजरात की भाजपा सरकार में मंत्री रही माया कोडनानी और 17 अन्य लोग बरी हो गए. गुजरात उच्च न्यायालय ने संदेह का लाभ देते हुए इन लोगों को बरी कर दिया. माया कोडनानी को 2009 में गिरफ्तार किया गया था और भीड़ को भड़काकर दंगा कराने और उसमें 97 मुस्लिमों की मौत के मामले में उन्हें कसूरवार मानते हुए उन्हें 28 साल जेल की सजा दी गई थी. 2012 में एसआईटी कोर्ट ने उन्हें दंगे का मुख्य सूत्रधार माना था और कहा था कि वे घटनास्थल पर खुद मौजूद थीं और लोगों को मुसलमानों को मारने और लूटने के लिए भड़का रही थीं. वे उस वक्त विधायक थीं और 2007 में उन्हें मंत्री बनाया गया. 20 अप्रैल, 2018 को गुजरात उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया और यह माना कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं. इससे यह पता चलता है कि कैसे मौजूदा कार्यपालिका का असर न्यायपालिका पर है.

इन निर्णयों के अलावा एक और खबर यह आई कि सोहराबुद्दीन और प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में दो और गवाह मुकर गए हैं. सोहराबुद्दीन अपनी पत्नी कौसर बी के साथ 2005 के नवंबर में हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे. गुजरात पुलिस ने दोनों का अपहरण किया और उन्हें तथाकथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया. उनकी पत्नी का भी कथित तौर पर बलात्कार किया गया और बाद में उन्हें भी मार दिया गया. साल भर बाद प्रजापति के साथ भी ऐसा ही हुआ. पहले सीबीआई को दिए बयानों से अब गवाह मुकर रहे हैं. इससे मुकरने वाले गवाहों की संख्या 52 हो गई है. अभी तक अदालत ने 76 गवाहों से सवाल-जवाब किया है.

इन सभी मामलों को क्या जोड़ता है?

पहली बात तो यह कि न्याय व्यवस्था न्याय देने में अक्षम साबित हुई है. इन तीनों मामलों में जो हुआ उससे पीड़ित और उनके परिजनों को निराशा हाथ लगी है. क्योंकि कसूरवार छूटते गए.

दूसरी बात यह कि आपराधिक जांच तंत्र भी तब बिल्कुल लाचार नजर आती है जब जांच किसी ताकतवर व्यक्ति से जुड़ी हो. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि जांच एजेंसियां चाहे वह स्थानीय पुलिस हो, सीबीआई हो या एनआईए हो, सभी सबूतों को सुरक्षा में नाकाम ही साबित होती हैं. इससे दोषियों को सजा नहीं मिल पाती. गवाहों का मुकरना, जजों का स्थानांतरण और जांच एजेंसियों में बदलाव से लोगों का विश्वास जांच प्रक्रिया पर से उठता जा रहा है. इससे हमारे लोकतंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा. जज लोया की मौत से जुड़े विवाद ने संदेह और गहरा किया है. अब तो सुप्रीम कोर्ट भी गड़बड़ियों का संज्ञान लेने को तैयार नहीं दिखती.

तीसरी बात यह कि हिंदू दक्षिणपंथी संगठन जैसे अभिनव भारत, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्ताधारी भाजपा के कई लोग खुद आरोपी हैं और वे एक-एक करके बरी होते जा रहे हैं. इनमें असीमानंद, बाबू बजरंगी, कोडनानी और गुजरात के उस समय के गृह मंत्री रहे अमित शाह का नाम लिया जा सकता है. ये सभी जेल में रहे हैं.

सत्ताधारी दल मुस्लिम विरोधी राजनीति कर रहा है, यह बिल्कुल स्पष्ट है. भारत सरकार जिस तरह से बहुसंख्यकवादी हो गई है, इससे लोकतांत्रिक संस्थाएं खतरे में हैं. क्या सिविल सोसाइटी, राजनीतिक दलों, मीडिया और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं में इतनी शक्ति है कि वे लोकतंत्र बचाने के संघर्ष को आगे बढ़ा सकें? यह हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल है.

EPW Editorials 28.4.2018, वर्षः 53, अंकः 17, 28 अप्रैल, 2018

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