जितने भी तथाकथित गॉडमैन हैं वे सभी अपराध में संलिप्त क्यों रहते हैं

परंतु सब से चैंका देने वाली बात यह है कि उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी उनके अनुयायी उनके लिए अपनी जान देने को भी तैयार रहते हैं।...

हाइलाइट्स

इस तरह के बाबा हमारे देश में पहले से भी पैदा होते रहे हैं और आज भी हैं। परंतु सब से चैंका देने वाली बात यह है कि उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी उनके अनुयायी उनके लिए अपनी जान देने को भी तैयार रहते हैं।

 

एल.एस. हरदेनिया

डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम सिंह के विरूद्ध बलात्कार का आरोप सही सिद्ध होने के बाद और हाईकोर्ट द्वारा उसे अपराधी मानने के बाद हरियाणा में और हरियाणा के आसपास के अनेक शहरों में जो घटनाक्रम हुआ है उससे दो प्रमुख विचारणीय मुद्दे उभर कर आए हैं।

पहला, हमारे देश में राम रहीम सिंह के अलावा भी अनेक इस तरह के व्यक्ति सामने आए हैं जो स्वयं को ईश्वर का अवतार मानते हैं। उनका प्रभाव इतना गहरा होता है कि लाखों लोग उनके कहने पर अपनी जान देने को तैयार हो जाते हैं। ऐसा क्यों हो जाता है यह पता लगाने के लिए एक दीर्घकालीन अनुसंधान की आवश्यकता है। क्या इनमें कोई सम्मोहन करने की शक्ति होती है, जिससे वे अपने अनुयायियों के मन और तन पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लेते हैं। उनके अनुयायी अंधभक्त हो जाते हैं और वे उन्हें वास्तव में ईश्वर मानने लगते हैं। वे उन पर किसी भी प्रकार का अत्याचार करें वे उसे ईश्वर का प्रसाद मानते हैं। एक बार वे ऐसा नियंत्रण हासिल कर लेते हैं तो फिर उनके अनुयायियों की मस्तिष्क की तार्किक क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है। गुरमीत सिंह के मामले में भी यह लगभग सौ प्रतिशत सही है।

आज से 15 वर्ष पहले एक न्यायाधीश ने राम रहीम के आश्रम के संबंध में एक विस्तृत जांच की थी। यह जांच उन्होंने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश पर की थी। उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था कि गुरमीत सिंह का आश्रम धार्मिक स्थल कम एक व्यवसाय का केन्द्र ज्यादा है। इस तरह के लोगों का प्रभाव कितना रहता है इस बात का उल्लेख इस रिपोर्ट में किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हथियारों से लैस लोग पूरे आश्रम में बिना किसी बाधा के उपस्थित रहते थे। गुरमीत सिंह से मिलने के लिए अनेक प्रभावशाली व्यक्ति, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, पंजाब और हरियाणा के प्रभावशाली राजनीतिक नेता, शासकीय अधिकारीगण, डॉक्टर, इंजीनियर, बड़े व्यवसायी, उद्योगपति आए दिन आते रहते थे। इनके आश्रम में सौ से ज्यादा साध्वियां रहती थीं। स्वयं गुरमीत सिंह अंडरग्राउंड बने एक विशाल महल में रहते थे, जिसे गुफा कहा जाता था। इस गुफा में किसी का भी प्रवेश वर्जित था, जिसे वे चाहते थे वही इस गुफा में आ सकता था। सभी साध्वियों को एक होस्टल में रखा जाता था और इस होस्टल में भी सभी का प्रवेश वर्जित था। कोई भी व्यक्ति बिना बाबा की अनुमति के इस महल में नहीं जा सकता था।

इस तरह के बाबा हमारे देश में पहले से भी पैदा होते रहे हैं और आज भी हैं।

दिनांक 26 अगस्त के ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ में इस तरह के साधुओं की एक लंबी सूची छपी है। इस सूची में हरियाणा के रामपाल नाम का एक साधु शामिल है। रामपाल नाम के इस साधु पर हत्या और अनेक किस्म के आरोप लगे थे, जब उसको सज़ा सुनाई गई थी तब उसके अनुयायियों ने सात दिन तक ट्राफिक रोक कर रखा था। 42 बार उसने अदालतों द्वारा भेजे गए समन स्वीकार नहीं किए। उनके अनुयायियों ने बड़ी मुश्किल से उसे गिरफ्तार होने दिया था। जिस कक्ष में वह रहता था वहां पांच महिलाओं की लाश मिली थी। उसके अतिरिक्त वहां 18 महीने का एक बच्चा भी मिला था।

इसी सूची में पंजाब के आशुतोष महाराज का नाम भी शामिल है। ये दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक हैं। इनकी मृत्यु के बाद इनका अंतिम संस्कार नहीं होने दिया गया था। हाईकोर्ट के एक आदेश के अनुसार इनके मृत शरीर को एक डीप फ्रीजर में रखा गया था। इस सूची में बंगाल के बालक ब्रह्मचारी भी शामिल हैं। इनकी मृत्यु 1953 में हो गई थी, परंतु उनका अंतिम संस्कार मृत्यु के 55 दिन बाद हो सका और वह भी 450 पुलिस कर्मियों की सहायता से। चार घंटे की जद्दोजहद के बाद उनके 2000 अनुयायी आश्रम पहुंचे जहां उनका मृत शव रखा हुआ था। उनके आश्रम में कुछ बम भी पाए गए। आनंद मूर्ति ऐसा ही एक बड़ा नाम है जिन्होंने आनंद मार्ग की स्थापना की थी। वे पेशे से पहले पत्रकार थे और बाद में उन्होंने रेलवे में नौकरी की। उनका दावा था कि उनके चालीस लाख अनुयायी हैं। भारत के अलावा लगभग 85 देशों में उनके अनुयायी थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद पूरे देश और विदेशों में उनका आंदोलन किया था। आनंद मूर्ति पर आरोप था कि उनके  सदस्य हिंसक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं।

इसी तरह स्वयं को ईश्वर मानने वाले नित्यानंद नाम के एक व्यक्ति हैं। वर्ष 2010 में इनका एक फूटेज सामने आया जिसमें इन्हें एक तमिल अभिनेत्री के साथ यौन संबंध करते हुए पाया गया था। इन पर भी बलात्कार करने के आरोप लगाए गए थे।

आशाराम इस समय जेल में हैं। इनके भी अनुयायियों की संख्या लाखों में बताई जाती है। आध्यात्मिक पुरूष बनने के पहले इनका धंधा साईकिल सुधारने का था। इन पर एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार का आरोप लगाया गया है। इस आरोप के कारण वे जेल में हैं। इस आरोप से संबंधित कुछ गवाहों की हत्या करवा दी गई है। आरोप है कि इन हत्याओं में आशाराम के अनुयायियों का हाथ है।

इसी तरह के एक और व्यक्ति हैं इच्छाधारी भीमानंद। ये एक होटल में गार्ड का काम करते थे। इनका नाम श्री मूरथ द्विवेदी है। ये 2010 में एक सैक्स रैकेट संचालन करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। ऐसे ही एक तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति चंद्रास्वामी थे। इनका वास्तविक नाम नेमीचंद जैन है। इनके प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव से नज़दीकी संबंध थे। राजीव गांधी की हत्या में इनकी भूमिका की जांच की गई थी। इसी सूची में संत भिंडरावाले भी शामिल हैं जिन पर लाखों सिक्खों की अगाध श्रद्धा थी। आरोपित है कि उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को हथियार की एक छावनी बना लिया था। बाद में इनसे छुटकारा पाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपरेशन ब्लूस्टार किया था जिसमें वे मारे गए थे।

इस तरह के जितने भी तथाकथित गॉडमैन हैं वे सभी किसी न किसी अपराध में संलग्न पाए गए हैं। परंतु सब से चैंका देने वाली बात यह है कि उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी उनके अनुयायी उनके लिए अपनी जान देने को भी तैयार रहते हैं।

इस तरह के सभी साधु संतों के जब अपराध सामने आए हैं तो उनके विरूद्ध कार्यवाही करना हमेशा कठिन कार्य रहा है। इसका एक कारण यह भी होता है कि इनके कुछ अनुयायी पुलिस फोर्स में भी रहते हैं। जैसे अभी गुरमीत के समर्थकों को नियंत्रित करने में पुलिस के एक बड़े तबके ने लगभग मौन धारण कर लिया था। एक समाचार के अनुसार जब सुरक्षाकर्मी भागते हुए नज़र आ रहे थे उसी बीच अनिल कुमार नाम के पुलिसकर्मी ने जो प्रसिद्ध पहलवान भी हैं, कर्तव्यपरायणता का अद्भुत उदाहरण पेश किया था। वे गुरमीत के समर्थकों को सिर्फ एक डंडे से नियंत्रित करते दिख रहे थे इसके ठीक विपरीत जिन पुलिसकर्मियों के हाथों में बंदूकें थीं वे भागते दिखाई दे रहे थे। उनको संबोधित करते हुए अनिल कुमार कह रहे थे ‘‘तुम सब शर्म से डूब मरो’’।

वैसे भी ऐसे अवसरों पर जब भीड़ हिंसक हो जाती है तब पुलिस उसे नियंत्रण करने में असफल ही रहती है। इसका मुख्य कारण यह रहता है कि इस तरह की भीड़ को अप्रत्यक्ष राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहता है। जैसे 1984 में सिक्खों का कत्लेआम हो रहा था तब पुलिस लगभग तटस्थ बनी रही। क्योंकि यह आरोपित है कि उस समय यह संदेश फैला दिया गया था कि पुलिस तटस्थ रहे। इसी तरह की स्थिति वर्ष 2002 में गुजरात में हुई थी। जब गोधरा स्टेशन पर 56 कारसेवकों की आगजनी में मृत्यु के बाद पुलिस को मौखिक तौर पर यह आदेश दे दिए गए थे कि वे 72 घंटे तक हिन्दुओं के आक्रोश को प्रकट होने दें और किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाएं। इसी का नतीजा हुआ कि हज़ारों की संख्या में मुसलमान मारे गए, उनके घर जलाए गए और उनकी संपत्ति लूटी गई।

पिछले दिनों जो जाटों का आंदोलन हुआ था उस समय भी पुलिस की लगभग ऐसी ही भूमिका रही। मध्यप्रदेश में पिछली माह जून में जो किसानों का आंदोलन हुआ उस समय भी पुलिस से यह कह दिया गया था कि वह किसानों के विरूद्ध सख्ती का उपयोग न करे। यदि आमतौर पर पुलिस को इस तरह के आदेश दिए जाते रहेंगे तो वह क्यों अपनी जान जोखिम में डालकर हिंसक आंदोलनकारियों पर नियंत्रण करने का प्रयास करेंगे। यदि पुलिस और प्रशासन को अपने विवेक से जब कार्यवाही करने का अवसर दिया जाता है तो वे प्रायः इस काम में सफल होते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मध्यप्रदेश का है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मध्यप्रदेश के कुछ शहरों में दंगे हुए। भोपाल के इतिहास में पहली बार सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें लगभग 140 लोगों की जानें गईं। यहां दंगे पर नियंत्रण पाने के लिए अंततः सैना को बुलाना पड़ा। ठीक इसके विपरीत इंदौर में जो सांप्रदायिक तनाव के लिए जाना जाता था, 1992 में एक भी घटना नहीं हुई। क्योंकि वहां पर पदस्थ इंदौर संभाग के आयुक्त विजय सिंह ने सख्त आदेश जारी किए थे कि इंदौर शहर में किसी भी प्रकार की घटना नहीं होनी चाहिए और इसलिए लिए उन्होंने सारी जिम्मेदारी पुलिस अधिकारियों को दी थी। नतीजे में इंदौर पूरी तरह शांत रहा।

वर्ष 1993 में दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके दस वर्ष के कार्यकाल में मध्यप्रदेश में एक भी बड़ी साम्प्रदायिक घटना नहीं हुई। क्योंकि इस संबंध में उनका रवैया अत्यधिक सख्त था और प्रशासन और पुलिस को इस बात के कड़े आदेश थे कि वे किसी भी हालत में सांप्रदायिक हिंसा भड़कने न दें। यहां तक कि 2002 में जब मध्यप्रदेश के पड़ोस गुजरात में हिंसक घटनाएं हो रही थीं उस समय मध्यप्रदेश पूरी तरह से शांत रहा।

इसी तरह जब 1984 में सिक्ख विरोधी हिंसा देश के अनेक स्थानों पर फैली हुई थी उस समय बंगाल में एक भी सिक्ख का खून नहीं बहा। क्योंकि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योतिबसु के स्पष्ट आदेश थे कि हर हालत में सिक्खों की जानमाल की रक्षा की जाए। जब ज्योतिबसु ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया तो उनका कलकत्ता के सिक्खों ने सार्वजनिक अभिनंदन किया था। और उनका आभार माना था कि उन्होंने न सिर्फ हमारी जान बचाई बल्कि हमारी गरिमा को भी बचाया।

जब भी राजनीतिक कारणों से पुलिस को तटस्थ रहने का आदेश दिया गया है उस समय ही इस तरह की हिंसक घटनाएं होती हैं, जो पिछले तीन दिनों से हरियाणा और उसके आसपास के राज्यों में हो रही हैं। इसका सबक यह है कि कानून और व्यवस्था के मामले में राजनीतिक अवसरवादिता को बाधक नहीं बनने देना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)   

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