वीएस येदियुरप्पा : कर्नाटक की राजनीति का ट्रैजडी किंग !

आज कर्नाटक में मठों के जरिये पूरी बेशर्मी से वोट की राजनीति तय हो रही है, मगर वह मुद्दा नहीं है। इसे धार्मिक बहुसंख्यक की तानाशाही नहीं कहें, तो क्या कहें? ...

पुष्परंजन

अगर मठों के जरिये कर्नाटक का चुनावी बेड़ा पार होना है, तो मान कर चलिये कि मोदी से अधिक असरदार योगी होंगे। योगी के जो शैदाई हैं, वो दावा करते हैं कि मठों में सक्रियता की वजह से भाजपा को त्रिपुरा में  बड़ी कामयाबी मिली थी। योगी आदित्यनाथ के त्रिपुरा में प्रवेश करते ही चुनावी परिदृश्य बदल गया था। गुजरात के वोटर भी योगी के प्रभामंडल से विस्मित थे। अब प्रशंसकों की बातों को कोई क्यों काटे? 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी!' मीडिया में कुछ विश्लेषक भी इसी भावना के तहत योगी के करिश्माई व्यक्तित्व का विस्तार कश्मीर से कन्याकुमारी तक कर डालते हैं।

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अनुमानत: पूरे देश में नाथ संप्रदाय के लगभग आठ हजार मठ हैं। इनमें से 80 मठ कर्नाटक में हैं। कर्नाटक के वोकालिगा समुदाय की भगवान शिव में आस्था की वजह से चुनावी रणनीतिकारों ने मान लिया है कि नाथ संप्रदाय के मठाधीश जो कहेंगे, लोग आंख मूंद कर वहीं वोट डालेंगे। अर्थात, वोकालिगा वोटर बिल्कुल नहीं पूछेंगे कि उनके विकास में केंद्र सरकार ने कहां उपेक्षा की है। अमित शाह का मत्था टेको अभियान के बावजूद, लिंगायत मठों पर भाजपा भरोसा नहीं कर सकती, इसलिए अंतिम समय वोकालिगा आस्था को वोट बैंक में बदलने का प्रयास पार्टी कर रही है। लेकिन क्या वोकालिगा वोटर, लिंगायत समुदाय के 'सीएम इन वेटिंग' येदियुरप्पा को आंख मंूदकर अपना नेता मान लेंगे?

यों, राजनीति ऐसी शै है, जिसमें राजधर्म नहीं,पार्टी आलाकमान कैसे प्रसन्न हों, उसकी प्राथमिकता तय होने लगी। उत्तर प्रदेश में आंधी-तूफान से सौ लोग मरे हैं, मगर मुख्यमंत्री योगी कर्नाटक के तूफानी दौरे पर हैं। उनसे कन्नड़ा वोटरों ने पूछा, 'महाराज यूपी में सौ लोग तूफान में मर गए हैं, उस तबाही को देखने के बदले आप यहां पधारे हुए हैं!'  चौतरफा थू-थू हुई, तो शनिवार को यूपी लौटना मुख्यमंत्री योगी ने तय किया।

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हिंदुत्व के इस पोस्टर ब्वाय को 35 चुनावी रैलियां करने का टारगेट दिया गया है। योगी की कई रैलियां तटीय इलाके में प्लान की गई हैं। बताते हैं यहां नाथ संप्रदाय के समर्थक अधिक हैं। योगी पिछले कर्नाटक दौरे में कदाली और कद्री मठ गए थे। योगी, मैसूर का सबसे प्राचीन चूंचागिरी मठ जाएंगे, इस मठ से भक्तों के लिए आदेश जारी होगा कि वोट किसे देना है।

दक्षिण कर्नाटक व उडूपी वोकालिगा वोटरों के गढ़ माने जाते हैं। पीएम मोदी ने उडूपी के मंच से ही पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के सम्मान में पुष्पवर्षा की थी। ये वही मोदी हैं, जिन्होंने देवेगौड़ा पर 2014 में तंज किया था कि अब आप राजनीति छोड़ें और वृद्धाश्रम में प्रवास करें, मैं आपके बेटे से अधिक आपकी देखभाल करूंगा! राजनीति में अवसरवाद, सुर परिवर्तन को कितना स्वत:स्फूर्त कर देता है, इस कला में हमारे प्रधानमंत्री मोदी माहिर हैं। उन्हें 8.2 प्रतिशत वोकालिगा वोटर दिख रहे हैं, जिनके नेता एचडी देवेगौड़ा हैं। प्रश्न यह है, कि वोकालिगा,'जनता दल सेक्यूलर' के प्रत्याशियों को वोट देंगे, या कि भाजपा को?

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जिन वोकालिगा को जेडीएस नेता रास नहीं आते, उनके लिए भाजपा विकल्प है, यह सोचकर भाजपा उनके कले को भेदने में लग गई है। भाजपा को भरोसा पूर्व मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा पर है, जो मार्च 2017 में कांग्रेस का परित्याग कर भाजपा में शामिल हुए थे। एस.एम. कृष्णा यूपीए शासन के समय विदेशमंत्री भी रह चुके हैं, जो संयुक्त राष्ट्र में पुर्तगाली मंत्री की स्पीच पढ़ भारत सरकार की भद्द उड़वा चुके हैं। ऐसे फ्यूज बल्ब से कर्नाटक की राजनीति को मोदी रौशन करना चाहते हैं। थके हुए से एस.एम. कृष्णा क्या वोकालिगा वोटरों के बीच प्रभावी हैं, और उनमें फायर पावर रह भी गया है? एक और फैक्टर भाजपा को परेशान कर रही है। एस.एम. कृष्णा के दामाद के यहां आईटी की रेड पड़ी थी, इस कारण वह भाजपा से नाराज चल रहे हैं। 

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अब एक दूसरी बात। पिछले साल 21 नवंबर को गुजरात चुनाव के दौरान गांघी नगर के आर्च विशप फादर थॉमस मैचन द्वारा जारी उस चिट्ठी को बहुत सारे लोग भूल गए हों, जिसमें उन्होंने ईसाई वोटरों से अपील की थी। भाजपा ने इस चिट्ठी पर बवाल काटते हुए, उसे वैटिकन तक से जोड़ा था। आज कर्नाटक में मठों के जरिये पूरी बेशर्मी से वोट की राजनीति तय हो रही है, मगर वह मुद्दा नहीं है। इसे धार्मिक बहुसंख्यक की तानाशाही नहीं कहें, तो क्या कहें? ईसाई धर्मगुरू की अपील के विरूद्ध आसमान सर पे उठा लो, और हिंदू मठाघीशों से आदेश कराने के वास्ते मत्था टेको! कर्नाटक का घर्म-जाति आधारित चुनाव भारतीय राजनीति की विडंबना है। बेबस चुनाव आयोग! जिसकी आचार संहिता कागज़ के टुकड़े से अधिक कुछ नहीं है। हैरानी की बात है कि अब तक चुनाव आयोग ने पार्टियों से नहीं पूछा कि धर्म और जाति के आधार पर आप वोट कैसे मांग सकते हैं?

कर्नाटक में 1361 जाति समूह हैं। मगर, वहां की राजनीति वोकालिगा, लिंगायत के इर्द-गिर्द घूम रही है। पहले दोनों समुदाय के लोग कुल आबादी के 27 फीसद बताये जाते थे, अब पता नहीं कैसे यह संख्या घटकर 17.65 प्रतिशत हो गई? सूबे में सिर्फ लिंगायत आबादी 17 प्रतिशत बताई जाती थी। 2018 के आरंभ में कर्नाटक शासन ने जातिगत जनगणना कराई, उस डाटा के लीक होने पर लिंगायत 59 लाख बताये गए, जो कर्नाटक की कुल आबादी के 9.65 प्रतिशत हुए। और वोकालिगा हैं 8.01 फीसद। यह दिलचस्प है कि 224 निर्वाचित सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में दोनों दबंग जातियों के 103 एमएलए हैं। लिंगायत के 50 और वोकालिगा के 53 विधायक।

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जातिगत जनगणना डाटा जो लीक हुआ, उसके अनुसार दलित (जिसमें 180 जातियां शामिल हैं ) 17.7 प्रतिशत हैं। और मुसलमान 12.27 फीसद। दलित और मुसलमान कर्नाटक की राजनीति के कैनवास से किनारे कैसे किये गए हैं? देखकर अटपटा सा लगता है। भाजपा का दावा रहता है कि सबसे अधिक दलित सांसद हमने दिये। अगर दिये हैं, तो ये दलित सांसद कर्नाटक चुनाव में दिखने चाहिए थे। दलित सांसद यूपी सरकार पर सवाल अधिक दाग रहे हैं। यह आवाज कर्नाटक तक जा रही है। क्या भाजपा के लिए दुविधा की स्थिति उन्हीं के दलित सांसद खड़ी नहीं कर रहे हैं? भाजपा सांसद उदित राज, अशोक कुमार दोहरे, छोटेलाल खरवार, साध्वी सावित्री बाई फूले, यशवंत सिंह पार्टी के भीतर कम और सार्वजनिक मंचों, टीवी पर ज़्यादा उठा रहे हैं। सवालों के केंद्र में यूपी सरकार अधिक होती है। ऐसे 'दोस्त' जब साथ में हों, तो जिग्नेश मेवाणी जैसे 'दुश्मन' से कर्नाटक में क्या बिदकना?

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कर्नाटक में 1985 के बाद की स्थिति सामने रखने से सत्ता संघर्ष समझने में आसानी हो जाती है। 1985 में कर्नाटक में जनता पार्टी की सरकार थी। 1989 में कांग्रेस सत्ता में आई। 1994 में जनता दल की सरकार बनी, और 1999 में कांग्रेस की फिर सत्ता में वापसी हुई। 2004 में हंग असेंबली का जनादेश मिला, जिस वजह से 2008 तक तीन मुख्यमंत्री आए और गए। 2008 में भाजपा को पूरे समय तक सत्ता में रहने का अवसर मिला उस अवधि में भी तीन मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठे। 2013 के चुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर शासन में आने का मौका मिला। इस गणित के हिसाब से कुछ विश्लेषक मानते हैं कि 1985 के बाद से किसी एक पार्टी को अगले चुनाव में सत्ता वापसी का अवसर नहीं मिला है। मगर, 25 अक्टूबर 1947 से लेकर 10 जनवरी 1983 तक का इतिहास देखें, तो कर्नाटक में 36 साल कांग्रेस का अखंड राज रहा है।

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यों, वीएस येदियुरप्पा के माजा को घ्यान से देखिये, तो वे कर्नाटक की राजनीति के 'ट्रैजडी किंग' लगते हैं। उनकी राजनीति की शोकगाथा 12 नवंबर 2007 को शुरू हो जाती है, जब वे सिर्फ सात दिनों के लिए सत्ता में टिक पाए। और फर 189 दिनों के लिए कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लग जाता है। 30 मई 2008 के चुनाव में भाजपा बहुमत में आती है, और लिंगायतों के नेता वीएस येदियुरप्पा एक बार फिर मुख्यमंत्री बनते हैं। येदियुरप्पा तीन साल 62 दिन सत्ता में रह सके। उन्हें बेल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुर में खनन घोटाले और 40 करोड़ घूस लेने के आरोप में कुर्सी छोड़नी पड़ी। अक्टूबर 2011 को वीएस येदियुरप्पा, उनके दो बेटे (जिनमें से एक सांसद था), और दामाद जेल भेज दिये गए। यह भाजपा के बुरे दिन थे। 30 नवंबर 2012 को वीएस येदियुरप्पा ने भाजपा को अलविदा कह 'कर्नाटक जनता पक्ष' नामक पार्टी बनाई। मगर, इस पार्टी के ज़रिये येदियुरप्पा कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। अंतत: 2 जनवरी 2014 को अपनी पार्टी समेत भाजपा में विलीन होने की घोषणा वीएस येदियुरप्पा ने कर दी।

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येदियुरप्पा से छुटकारे के बाद भाजपा ने सदानंद गौडा को मुख्यमंत्री बनाया था, मगर वे विक्षुब्धों को संभाल नहीं पाए। साल भी पूरा नहीं हुआ, सदानंद गौड़ा हटा दिये गए और भाजपा ने उनकी जगह जगदीश शेट्टर को मुख्यमंत्री बनाया। बचा खुचा समय भाजपा को कालिख छुड़ाने और पार्टी से नाराज लोगों को मनाने में निकल गया, लिंगायत वीएस येदियुरप्पा के निकाले जाने से खुंदक में थे, नतीजतन 2013 चुनाव भाजपा बुरी तरह हारी।

क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी को प्रधानमंत्री मंच पर ख़ुद से दूर रखें? 22 चुनावी रैलियों में से सिर्फ एक जगह वीएस येदियुरप्पा पीएम के साथ दिखें, इसे दुर्भाग्य ही तो कहेंगे। इसलिए,वीएस येदियुरप्पा को 'कर्नाटक की राजनीति का ट्रैजडी किंग’ कहना पड़ा है। चुनाव जीतना-हारना अपनी जगह पर है। मगर, क्या कलंक को ढोते हुए 2019 लड़ेंगे? अगर ऐसा है, तो यह भी भाजपा के लिए जोखिम भरा फैसला होगा। वीएस येदियुरप्पा राजनीतिक भ्रष्टाचार के एक ऐसे सिंबल बन चुके हैं, जिनका नाम टीवी पर लेते ही भाजपा प्रवक्ता बगलें झांकने लगते हैं!

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