सरकारों ने तय कर लिया है कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को या तो समुद्र में डूबो देंगे या हिमालय से नीचे फेंक देंगे

सरकारों ने तय कर लिया है कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को या तो समुद्र में डूबो देंगे या हिमालय से नीचे फेंक देंगे हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक अनेक NGO की मदद से इसे मूर्तरूप देना शुरू भी कर दियागया ...

देशबन्धु
हाइलाइट्स

बच्चों के ऊपर इस कदर बोझ डाला जा रहा है कि उनकी रुचि शिक्षा से हटती जा रही है। विनोबाजी ने लिखा भी है, 'मनुष्य के लिए विद्या और अविद्या दोनों आवश्यक है। दुनिया में हजारों प्रकार के शास्त्र और हजारों प्रकार का ज्ञान है। उन सबकी प्राप्ति में पड़ेंगे तो हमसे कोई काम नहीं होगा। संसार में इतना ज्ञान भरा पड़ा है कि उन सबको अपने मस्तिष्क में ठूंसने का यत्न करने से मानव पागल हो जाएगा।परंतु आज की विद्यालयीन शिक्षा ने तो बच्चे को अतिमानव मानकर उसकी मौलिकता को ही नष्ट कर दिया है।

एक बेहतर बचपन और बच्चों को बच्चा बना रहने देने की कोई कोशिश न तो भारत की सरकारें कर रही हैं और न ही समाज। वे हमारी अनैतिक उच्चाकांक्षाओं का शिकार हो रहे हैं। हम भूल रहे हैं कि 'अज्ञान भी ज्ञान होता है।

शिक्षा को शिक्षा ही रहने दो

चिन्मय मिश्र

तरक्की उसे कहते हैं, जा के पूछ उस पत्थर से,

पड़े थे तो पत्थर थे, तराशा तो खुदा निकले।

-फैज़

आज़ादी के बाद जिस पर सबसे कम ध्यान दिया गया वह विषय संभवत: शिक्षा है। हाल ही में नई शिक्षा नीति के लिए एक समिति की घोषणा हुई है, जिसकी अध्यक्षता अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. कस्तूरीरंगन करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों के नामों पर निगाह डालते ही साफ हो जाता है कि इसका वास्तविक ध्येय क्या है। पूर्व केबिनेट सचिव सुब्रह्मणयम की अध्यक्षता वाली समिति अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप दे रही थी कि एकाएक परिवर्तन सामने आ गया।

गौरतलब ये गांधीजी ने आज़ादी के 10 बरस पहले नई तालीम का स्वरूप तैयार कर लिया था। गांधी जी के बारे में कहा जाता है कि, स्वराज्य के बाद जिस-जिस चीज की जरूरत रहेगी, ऐसी हर चीज का आविष्कार उन्होंने कर लिया था। उनका ख्याल था कि जैसे राज्य बदलने के साथ झंडा बदल जाएगा, वैसे ही राज्य बदलने के साथ तालीम भी नई शुरू करना होगी। उनके परम शिष्य विनोबा इससे भी आगे जाकर इसे और विस्तारित करते हुए कहते हैं, 'इसे नई तालीम नाम दिया गया है। लेकिन मैं इसे 'नित्य नई तालीम’ कहता हूं। इसका अर्थ है 'जो कल थी, वह आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं रहेगी’, जैसे नदी का पानी। रोज के अनुभव के आधार पर जो तालीम नित्य बदलती है, वह है नित्य नई तालीम। तंत्र में अगर इस चीज को पकड़ेंगे तो यह चीज निर्जीव बन जाएगी।’ परंतु हम देख रहे कि पितामह के समय की शिक्षा और पोते के समय की शिक्षा के स्वरूप में कुछ भी परिवर्तन सामने नहीं आया। सिर्फ कुछ नए पाठ जुड़ गए जो कि पुराने से ही प्रेरित थे। किसी नए प्रयोग की गुंजाइश न होने से अंतत: लोग अपने बच्चों के लिए 'अनस्कूलिंग’ याने पाठशाला न भेजने पर मजबूर हो गए हैं।

उपनिषद की एक कथा है, आठ-दस साल का एक लड़का हाथ में समिधा लिए गुरु के पास गया और उनसे कहा, 'मैं ज्ञान लेने आया हूं।

गुरु ने कहा ये 400 गायें चराने का काम करो और हजार बन जाएं तब आना। यानी दो-तीन साल का छुटकारा।

हजार गाय होने पर बच्चा आया। गुरु ने कहा, 'तेरा चेहरा तेज से चमक रहा है। क्यों रे तुझे कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ है?’

शिष्य ने कहा, 'ज्ञान तो गुरु से प्राप्त होता है। वह तो आपकी कृपा से ही मिलेगा।’

इस पर गुरु ने कहा, 'वह तो ठीक है परंतु तेरे चेहरे पर ज्ञान की चमक दिखती है। तो क्या किसी ने कुछ ज्ञान दिया?’

शिष्य ने कहा, 'अन्ये मनुष्येभ्य:’ अर्थात मुझे मनुष्य ने नहीं दूसरों ने ज्ञान दिया, उसे बैल ने ज्ञान दिया, हंस ने दिया, अग्नि ने दिया और मृग्दु नामक पक्षी ने दिया।’

यह ज्ञान उपनिषद में संकलित है। परंतु आज स्थिति भयानक रूप ले चुकी है। शिक्षा का स्थान दोयम और कोचिंग का पहला हो गया है। सरकारों ने तय कर लिया है कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को या तो समुद्र में डूबो देंगे या हिमालय से नीचे फेंक देंगे और जब तक अपने इस कार्य में सफल नहीं हो जाएंगे चैन से नहीं बैठेंगे। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक अनेक एनजीओ फाउंडेशन की मदद से इसे मूर्तरूप देना शुरू भी कर दिया गया है।

बच्चों के ऊपर इस कदर बोझ डाला जा रहा है कि उनकी रुचि शिक्षा से हटती जा रही है। विनोबाजी ने लिखा भी है, 'मनुष्य के लिए विद्या और अविद्या दोनों आवश्यक है। दुनिया में हजारों प्रकार के शास्त्र और हजारों प्रकार का ज्ञान है। उन सबकी प्राप्ति में पड़ेंगे तो हमसे कोई काम नहीं होगा। संसार में इतना ज्ञान भरा पड़ा है कि उन सबको अपने मस्तिष्क में ठूंसने का यत्न करने से मानव पागल हो जाएगा।’ परंतु आज की विद्यालयीन शिक्षा ने तो बच्चे को अतिमानव मानकर उसकी मौलिकता को ही नष्ट कर दिया है। बहुत पहले एक लेख में मित्र देवीलाल पाटीदार की बेटी पाहुनी का जिक्र किया था कि वह जब तक शाला नहीं गई थी, हर बात कविता में करती थी। पाठशाला जाते ही कविता कहीं गुम हो गई। मेरे भतीजे की बेटी यानी मेरी पोती है मनु। वह ढाई साल से कम की है। दिन भर गाती रहती है। मुझे पक्का यकीन है कि जिस दिन वह किसी औपचारिक संस्थान में पढ़ने जाएगी वह गाना भूल जाएगी। क्या इससे बड़ा कोई और बुरा हम अपने बच्चों के साथ कर सकते हैं कि वह कविता कहना और गाना- गाना छोड़ दे। मगर समाज का मानस कुछ इस तरह कंडीशन कर दिया गया है कि आर्थिक सोच से आगे सब कुछ निषेध है।

अभी गुरुपूर्णिमा आने वाली है। भारत के महान गुरुओं में एक नाम रामानुजाचार्य का आता है। उनके दो शिष्यों से हम आप सभी परिचित हैं। ये हैं कबीर और तुलसीदास। जरा सोचिए तो एकदम भिन्न प्रकार के रचनात्मक शिखर आपके सामने गुरु रामानुजाचार्य के माध्यम से आते हैं। एकदम अलग- अलग तरह की अभिव्यक्तियां। एक एकदम बेलौस और विद्रोही और दूसरा अथाह श्रृद्धा से भरा हुआ। दोनों अपनी-अपनी तरह से विलक्षण रचनाएं रचते हैं और वह आज भी उतनी ही सामयिक हैं।

एक और गुरु हमारे समय के हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर! वे अपने तरह की अनूठी शिक्षा प्रणाली विकसित करते हैं। पूर्व में बैठे गुरुदेव शिक्षा की शास्त्रीयता पर अडिग हैं तो पश्चिम में बैठे महात्मा शिक्षा में व्यावहारिकता को लेकर संकल्पित हैं। हमें यह भले ही विरोधाभासी दिखे लेकिन वास्तविकता यही है कि अपने समय के महानतम लोग शिक्षा को लेकर हमेशा चिंतित रहे हैं। परंतु आज के समय में शिक्षा के दर्शन पर बात करने वालों की खैर नहीं है। यदि कुछ भी नयापन लाने का प्रयास किया जाए तो वह रोजगार पर खरा नहीं उतरेगा। अब तो यह तय कर लिया गया है कि देशभर में बारहवीं तक एक सी शिक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम होगा। भारत जैसे वैविध्यपूर्ण देश के लिए इससे ज्यादा विनाशकारी कुछ नहीं हो सकता। जिस विविधता को सैकड़ों वर्षों की गुलामी और मैकाले की शिक्षा प्रणाली समाप्त नहीं कर पाई, हम वह काम एक झटके में कर देंगे।

गुरुदेव ने लिखा है,

'जिन्हें हम भद्रलोक कहते हैं, उनकी शिक्षा, उनकी कोशिशें और उनको सुलभ अवसर मृत नदी के एक किनारे की सूखी कंदरा के समान है। एक अलंघ्य दूरी, ज्ञान और विश्वास, रिवाजों और आदतों और दैनिक जीवन पद्धति के मामले में दूसरे किनारे पर खड़े लोगों से उन्हें अलग कर देती है।’

एक दूरी शहरी व ग्रामीण समाज में लगातार बनाए रखी जा रही है। वह समय-समय पर प्रकट भी होती है। हिन्दी व प्रांतीय भाषीय छात्रों का प्रतियोगी परीक्षाओं में आगे आना, पुन: अंग्रेजी की अनिवार्यता भी ले आता है।

बच्चे इसी विरोधाभास का शिकार हो रहे हैं। इन दो घटनाओं पर गौर करिए, दिल्ली में एक नौ साल के बच्चे ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उससे उसका मोबाइल ले लिया गया था। उसे उसकी लत पड़ गई थी। दूसरी ओर महाराष्ट्र में किसान के ग्यारह वर्षीय लड़के ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पिता के पास पाठ्य पुस्तक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।

कहने का अर्थ यह है कि जिस तरह इस देश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सोच से बच्चे बहिष्कृत हैं ठीक उसी तरह शिक्षा से भी बच्चे बहिष्कृत हैं। उनके अनुरूप या उनके लिए इसमें कुछ भी नहीं है। सब कुछ उन्हें एक बेहतर टेक्नोक्रेट, बेहतर अफसर बनाने के लिए है। एक बेहतर बचपन और बच्चों को बच्चा बना रहने देने की कोई कोशिश न तो भारत की सरकारें कर रही हैं और न ही समाज। वे हमारी अनैतिक उच्चाकांक्षाओं का शिकार हो रहे हैं। हम भूल रहे हैं कि 'अज्ञान भी ज्ञान होता है।’

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