मोहन भागवत नौकरी किसकी कर रहे हैं? संघ प्रमुख को किससे डर लगता है ?

हालत यह है कि पीएम मोदी की सुरक्षा इज़राइल मॉनिटर कर रहा है।... काली पैंट और सफेद शर्ट में स्वयंसेवक ‘भारत माता की जय’ नहीं, ‘विश्व घर्म की जय’ के नारे लगाते हैं।...

पुष्परंजन
मोहन भागवत नौकरी किसकी कर रहे हैं? संघ प्रमुख को किससे डर लगता है ?

पुष्परंजन

जिसे पूरा देश सर्वशक्तिमान मानता हो, जो सत्ता का एपीसेंटर हो, जिसके इशारे पर सात लोक कल्याण मार्ग की सियासी गोट इधर की उधर कर दी जाती हों, ऐसे महाबली मोहन मधुकर भागवत कहें कि मेरी नौकरी चली जाएगी, तो यह कोई छोटा-मोटा बयान नहीं है।

मोहन भागवत प्रांत प्रचारकों की अखिल भारतीय बैठक की तैयारी के वास्ते राजकोट में थे। किसी पत्रकार को उत्तर देते समय अपनी ‘नौकरी’ बचाने की बात कह गए। उनके बयान से एक भ्रम तो टूटा कि संघ प्रमुख सबसे ऊपर नहीं हैं। उन्हें भी कहीं जवाब देना पड़ता है, और अपनी ’नौकरी’ बचाये रखनी पड़ती है। मगर, मोहन भागवत नौकरी किसकी कर रहे हैं?

संघ के रोल मॉडल इज़राइल और जापान

मोहन भागवत ने शायद ही कहा होगा कि हमें अमेरिका के बताये मार्ग पर चलना चाहिए। इससे हटकर संघ प्रमुख ने 2014 से जो बयान इज़राइल को फोकस करते हुए हर साल दिये, उसे तेल अवीव के प्रभामंडल का विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए। 3 नवंबर 2014 को आस्था सिटी जो आगरा-मथुरा राजमार्ग पर है, वहां आयोजित संकल्प शिविर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि राष्ट्रवाद की राह पर चलना है, तो इज़राइल और जापान दो ऐसे देश हैं, जो हमारे लिये रोल मॉडल बन सकते हैं। मोहन भागवत ने उसके बाद कभी जापान का नाम नहीं लिया, लेकिन इज़राइल निरंतर उनके भाषण का हिस्सा बना रहा।

19 जनवरी 2015 को सागर के चार दिवसीय शिविर में संघ प्रमुख ने सुरक्षा की कमज़ोर व्यवस्था पर चिंता करते हुए कहा कि इज़राइल की तैयारी देखिये, ‘जैसे को तैसा‘ जवाब देता है। इज़राइल हमारी आज़ादी के साथ-साथ अस्तित्व में आया था। उस पर आठ देशों ने मिलकर हमला किया, वह भी तब, जब संसद में स्वतंत्रता का भाषण चल रहा था। जब से यह देश बना, तब से उसका क्षेत्रफल बढ़कर डेढ़ गुना हुआ है। रेगिस्तान वाला देश दुनिया का नंबर वन देश बन गया।

हममें  इज़राइलियों की तरह देश के लिए मर मिटने का जज़्बा होना चाहिए। एक बार फ़िर 4 जनवरी 2016 को पुणे के मारूंजी गांव में शिव शक्ति समागत में कार्यकर्ताओं से संघ प्रमुख ने कहा,‘ एक कमज़ोर देश से जो आवाज़ निकलती है, दुनिया का ध्यान उस पर नहीं जाता। इज़राइल को देखिये, छोटा सा देश है। 30 साल में छह लड़ाइयां जीती हैं।

मोहन भागवत के इज़राइल प्रेम का अतीत

मोहन भागवत ने इज़राइल पर जितना खुलकर कहा, उसके पीछे का अतीत दिलचस्प है।

बर्लिन के हुमबोल्ट विश्वविद्यालय के अभिलेखागार में अलबर्ट आइंस्टाइन के पत्रों में कुछ जगहों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा इज़राइल को समर्थन दिये जाने का ज़िक्र बताता है कि ग्लोबल स्तर पर यहूदीवाद के जुड़ने के लिए संघ में कितनी बेचैनी थी। 13 जून 1947 को अलबर्ट आइंस्टाइन ने चार पेज का लंबा-चौड़ा पत्र पंडित नेहरू को लिखा। उस चिट्ठी में अंग्रेज़ों द्वारा की गई बेईमानी का ज़िक्र था जिसमें आइंस्टाइन ने कहा, ‘ऑटोमन साम्राज्य से हड़पे उस इलाक़े को छोड़ते-छोड़ते ज़मीन का 99 फीसद हिस्सा अंग्रेज़ों ने सऊदी अरब, इराक़, लेबनान, जोर्डान और सीरिया को दे दिया था।’

पत्र का लब्बो-लुआब यही था कि भारत इज़राइल को मान्यता दे।

जब इज़राइल की बुनियाद रखी गई, और 14 मई 1948 को संयुक्त राष्ट्र की उसे सदस्यता मिली, तो इज़राइल के प्रथम प्रधानमंत्री बेन गुरियन ने अंतरराष्ट्रीय मान्यता के वास्ते जिन चंद लोगों को सक्रिय किया उनमें अलबर्ट आइंस्टाइन भी थे। बेन गुरियन और पंडित नेहरू के बीच भी मान्यता वाले विषय पर पत्राचार होता रहा। बेन गुरियन ने सभ्यताओं के हवाले से हिब्रू बाइबिल को उद्धृत किया, जिसमें हिन्दुस्तान के लिए ‘होदू’ शब्द का जि़क्र कई बार हुआ है।

भारत ने इज़राइल को मान्यता दी

कुछ लोग कहते हैं कि नेहरू दुविधा में थे, और कंफ्यूज़्ड थे कि क्या करें। मगर, नेहरू ने आइंस्टाइन को जो जवाब दिया, उसे पढ़ने पर लगता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री ‘रियलपोलिटिक‘ की अवधारणा को ज़्यादा प्राथमिकता दे रहे थे। पाकिस्तान को काउंटर करने के वास्ते पंडित नेहरू अरब देशों के नेताओं से प्रगाढ़ता को महत्व देने लगे थे। आइंस्टाइन को इसका क्रेडिट नहीं मिल सका कि उनके कहने पर भारत ने इज़राइल को मान्यता दी। यों, 17 सितंबर 1950 को यह मान्यता पंडित नेहरू के समय ही मिली।

पंडित नेहरू ने उस मौके पर कहा भी,

‘हम बहुत पहले इज़राइल को मान्यता दे सकते थे। मगर, हम इससे बचते रहे, क्योंकि अरब देशों के मित्रों की भावनाओं को हम ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे।‘

गुरू गोलवरकर भी बदलते रहे बयान

मुश्किल यह है कि जो लोग इज़राइल को मान्यता देने के सवाल नेहरू को किंकर्तव्यविमूढ़ समझ रहे थे, वो ख़ुद कितने कंफ्यूज्ड थे यह समय-समय पर उनके बयानों को देखने से साफ झलक जाता है। 1930 में यहुदियों के विरूद्ध नाज़ी अभियान के बारे में गुरू गोलवरकर ने कहा था,‘ हिंदुओं को इससे सीख लेनी चाहिए।’

 एक वक्त के बाद गुरू गोलवरकर ने कैसे पैराडाइम शिफ्ट किया, वह 1966 में छपी उनकी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में साफ देखने को मिली। ‘हिंदू यहां की घरती के मालिक हैं, पारसी व यहूदी उनके अतिथि हैं, मुसलमान और ईसाई डकैत हैं!‘

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उनके बारे में बस इतना कहा, ‘गुरू ऑफ हेट!’ अब मेरे लिये ‘घृणा गुरू‘ के बारे में कहने को कुछ बच नहीं जाता है।

हिटलर द्वारा यहूदियों के संहार करने को सही ठहराने वाले गोलवरकर कब और कैसे यहूदी राष्ट्र के निर्माण के समर्थक बन गए, इसका आभास भारत के लोगों को बहुत बाद में हुआ। मगर, इसके पीछे ‘अमेरिकन जेविश कमेटी’, ‘अमेरिकन-इज़राइली पब्लिक अफेयर्स कमेटी’ की भूमिका से इंकार नहीं कर सकते। एक छोटा सा संदर्भ 8 मई 2003 का देना चाहता हूं, जब उस समय के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने ‘अमेरिकन जेविश कमेटी‘ की बैठक में कहा था कि भारत अकेला देश है, जिसने कभी भी यहूदियों के विरूद्ध कोई फितना नहीं होने दिया।

मगर, अब पुरानी कहानी की लीपापोती करनी है, इस वास्ते यूरोप से भाड़े के इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियों को उद्धृत किया जा रहा है। इनमें फ्रेंच विश्लेषक क्रिस्टोफ जेफरलोट चर्चा में हैं, जिन्होंने गोलवरकर के विचारों को नये सिरे से परिभाषित किया है। दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ क्रिस्टोफ जेफरलोट कहते हैं, ‘गोलवरकर ‘रेस’ की बात कर रहे थे।

उसे सांस्कृतिक समानता के नुक्ते-नज़र से देखने की चेष्टा गोलवरकर की थी। उन्होंने यह बताना चाहा था कि आर्य जाति और जर्मन उतनी ही विशुद्ध रही है।‘

क्रिस्टोफ के अनुसार, ’गोलवरकर हिटलर जैसे नेता के प्रशंसक इसलिए थे, क्योंकि उनमें नेतृत्व देने की झमता थी।’ वैसे क्रिस्टोफ ने जो पच्चीकारी की है, उससे जर्मनी के राजनीतिक विश्लेषक शायद ही इत्तेफाक़ रखें।

हिटलर भाजपा का गौरव पुरूष

मगर, बात सिर्फ़ बौद्धिक बहस तक नहीं है। गुजरात सरकार ने कक्षा नौ की किताब में हिटलर को बाकायदा ‘गौरव पुरूष‘ की संज्ञा दी गई है। जर्मनी में कोई उस किताब को भेजकर देखे, नव नाज़ियों को छोड़कर बाक़ी लोग किताब की चिंदी-चिंदी कर देंगे। यहां भी मकसद गुरू गोलवरकर की छवि को बचाना है, क्योंकि इज़राइल उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान देते-देते रह गया। यों, नौवीं की पुस्तक में ज़रा भी चर्चा नहीं है कि हिटलर ने यहूदियों पर कितने ज़ुल्म ढाये। अब इन सब तिकड़मों पर संघ प्रमुख मोहन भागवत कुछ बोलते हैं, तो वाकई उनकी ‘नौकरी’ ख़तरे में पड़ जाएगी।

यह दिलचस्प है कि देश में अकेला गुजरात ऐसा सूबा है, जो इज़राइल को ज़रूरत से ज़्यादा तेल मालिश करने में व्यस्त है। अभी मुख्यमंत्री विजय रूपाणी 9 जुलाई को इज़राइल गए, और सूबे में रहनेवाले दो हज़ार यहूदियों को ‘माइनरिटी‘ का दर्ज़ा देने की घोषणा की। यहूदियों की संख्या मणिपुर, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे राज्यों में भी है। मगर, उन सूबों के मुख्यमंत्रियों में रूपाणी जैसी इज़राइल भक्ति क्यों नहीं उमड़ी?

पीएम मोदी की सुरक्षा इज़राइल मॉनिटर कर रहा

तेल अवीव जाकर तेल लगाने की प्रक्रिया में पिछले चार वर्षों में जो तेज़ी आई है, उसे लेकर शक होता है कि सर संचालक की ‘नौकरी‘ कहीं वहीं से तो नहीं चल रही। आज हालत यह है कि पीएम मोदी की सुरक्षा इज़राइल मॉनिटर कर रहा है। अगस्त 2017 में इज़राइल से 60 खोजी कुत्तों का दस्ता एसपीजी में शामिल किया गया। इन कुत्तों के कान में सेंसर वाले चिप लगे हुए हैं। मानिटरिंग का यह एक छोटा सा उदाहरण है।

यों, हिंदू नेताओं द्वारा इज़राइल यात्रा की सूची लंबी है। इनमें महत्वपूर्ण रहे हैं भाऊराव देवरस, तीसरे सरसंघ चालक बाला साहेब देवरस के छोटे भाई! विदेश में संघ की ताक़त का विस्तार इज़राइल की वजह से हुआ है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

आज की तारीख में 39 से अधिक देशों में हिंदू स्वयं सेवक संघ ने अपने पैर पसार लिये हैं। काली पैंट और सफेद शर्ट में स्वयंसेवक ‘भारत माता की जय’ नहीं, ‘विश्व घर्म की जय’ के नारे लगाते हैं।

भारत से बाहर संघ की सबसे पहली शाखा मोंबासा में लगी थी। फिनलैंड में ‘ई शाखा‘ लगती है। विडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये दुनिया के 20 देशों के स्वयंसेवक ई शाखा में शरीक होते हैं। विदेश स्थित स्वयंसेवक संख्या बल में भले ही भारत से कम हो, मगर घनबल के मामले में कई गुना ताक़तवर हैं। पीएम मोदी की विदेश यात्रा में माहौल बनाने में इनकी ज़बरदस्त भूमिका रहती है। शायद, यही वजह है कि सरसंघ चालक मोहन भागवत अपरोक्ष रूप से उस ‘नौकरी’ की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसपर जवाबदेही तय है।

15 से 17 जुलाई तक सोमनाथ में आहूत सम्मेलन में देश के सभी सूबों के प्रांत प्रचारक और पदाधिकारी भाग लेंगे। इस समय चुनावी रणनीति सेट करने में जो तेज़ी दिख रही है, उससे लगता है, रणभेरी 2018 दिसंबर तक बज जाएगी। 21 मार्च 2009 को मोहन भागवत ने यह ‘नौकरी’ ज्वाइन की थी। क्या यह उनके कार्यकाल का आखि़री आम चुनाव है?

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