सब कुछ बिकता है धड़ल्ले से...मुफ़लिसों को ...मौत ....मोहलत नहीं देती

शोर तो यही है ...बग़ैर तेरी इजाज़त पत्ता नहीं हिलता ....तो क्या मैं ..समझूँ इन तमाशों में ...तू भी शरीक है ?...

सब कुछ बिकता है धड़ल्ले से...मुफ़लिसों को ...मौत ....मोहलत नहीं देती

डॉ. कविता अरोरा

नहीं ...वो मुझे ....पहले कहीं भी कभी ...नहीं मिला ...बस कुछ ही रोज़ हुए ...देख रही हूँ उसे ... अस्पताल  में ...निगाह मिलते ही ...पटर-पटर बोलने लगती हैं ...उसकी आँखें .....कमर से बँधा यूरिन का पॉली बैग ( कैथिटर) ...कह चुका ...उसकी तकलीफ़ का क़िस्सा ...सिकुड़ी शर्ट ..पुरानी चप्पलों  की बद्दियों पे ...साफ़ लिखी थी ...मुफ़लिसी की कैफ़ियत ....चेहरे की लकीरों पे ..इतना कुछ था ...कि हर्फ़ आपस में उलझ रहे थे .......मेरे सामने की बेंच पे ...वो उधेड़ बुन में लगा है ...जोड़ घटाने में ...गिनतियाँ  फिसल रहीं हैं ...आँख ...उँगलियों पे ...झुंझला रही  है ...हिसाब  है कि ..पोरों से सँभलता ही नहीं ....अब तक का जमा ..कब का ..डॉक्टरों की फ़ीस ..निगल गई ..इक ज़मीन की टुकड़ी .. जो कुनबा पालती है ..रहन रहें ....तो इलाज हो ....

तफ़सील से ..जवाब तो चाहती है ..ढाँचे पे चिपकी ...गड्ढों में धँसी  ...वो सहमी आँखें ... मगर लरज़ के ही ...रह जाती हैं ...हलक में ज़बान .... झिड़क दिए जाने का ख़ौफ़  ....कुछ पूछने ही नहीं देता ....चुप्पा राओ की तेज़ आवाज़ ..उसे कुछ बोलने नहीं देती ...

काग़ज़ के पुर्ज़े में ..तफ़सील से ...उसका हाल लिखा था ...मगर अनपढ़ आँख के पल्ले ...कुछ नहीं पड़ा ..बस थरथरा रहे हैं हाथ ....और डबडबा रही हैं आँखें ...पर्चा दवाओं का थामे ....वो दीवार को देखता ...और भीगी आँख को ...घुटनों तक लाकर ...काली पेन्ट से ...रगड़ लेता ...और  ना जाने क्यों... मुझमें मैं ...बिखरने लगती ....चंद रोज़ से हूँ ..मैं इस अस्पताल ..की भीड़ में ...रोज़ दिखते  हैं मुझे ...यूँ ही लाचार ....पिसे हुए आदमी ......बोतलों में ख़ून ... सिलेण्डरों में साँस ...इंजेक्शन में विटामिन .... पेसमेकर में ..दिल की धड़कनें क़ैद हैं ...मशीनें दबोचे हैं ...इंसानों के जिस्म को ...काँच की शीशियाँ ....चढ़ी हैं ...मरीज़ों की चाँद पर ...और ...रबड़ की नली से ....सहमी ...सहमी ...सरके ...जा रहीं है ...ज़िन्दगी .... सब कुछ बिकता है धड़ल्ले से ...मुफ़लिसों को ...मौत ....मोहलत नहीं देती .. सुना तो यही है ....कि ..साँसों का निज़ाम तेरे हाथ है ....तेरी यह कायनात ...तेरी रज़ा से है ...तू हर शय में मौजूद है ....तो यक़ीनन यहाँ भी ...होगा ....दिन रात का यह ...तमाशा ...देखता होगा  ....शोर तो यही है ...बग़ैर तेरी इजाज़त पत्ता नहीं हिलता ....तो क्या मैं ..समझूँ  इन तमाशों में ...तू भी शरीक है ?

 

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