राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव क्यों?

राष्ट्रपति पद पर आने वाले व्यक्ति की आरएसएस के प्रति अटूट वफादारी बहुत ही समस्यापूर्ण है। ...

0 राजेंद्र शर्मा

अगर चुनाव से अर्थ कांटे की टक्कर है, तो नीतीश कुमार के भाजपा-नीत एनडीए के उम्मीदवार, रामनाथ कोविंद के समर्थन की घोषणा करने के बाद, अब राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं होगा। एनडीए से बाहर, तेलुगू देशम्, टी आर एस, जगनमोहन रेड्डी की पार्टी और तमिलनाडु में सत्ताधारी अन्नाद्रमुक के बड़े धड़े द्वारा एनडीए उम्मीदवार के समर्थन  का एलान कर, एनडीए की गिनती की कमी को पहले ही पर्याप्त से ज्यादा भरा जा चुका था। इसे सत्ताधारी गठजोड़ में बेचैन शिव सेना के अंतत: कोविंद का समर्थन करने के फैसले ने और पुख्ता कर दिया। पीडीपी, चौटाला की आइएनएलडी आदि के एनडीए उम्मीदवार के समर्थन का एलान करने के बाद, नितीश कुमार की घोषणा ने मुकाबले को कम से कम इतना इकतरफा जरूर कर दिया है कि 17 जुलाई के मतदान के बाद, वोटों की गिनती अब एक औपचरिकता ही होगी।

भाजपा औपचारिक रूप से नामजदगी के पर्चे भरे जाने से पहले ही राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में 60 फीसद से ज्यादा वोट का जुगाड़ कर चुकी है

इतना ही सही यह भी है कि अगर आरएसएस-भाजपाविरोधी ताकतों को एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ गोलबंद करने की कोशिश के पीछे, राष्ट्रपति चुनाव के माध्यम से विपक्ष की एकता को आगे बढ़ाने का कोई विचार था, तो नीतीश कुमार के फैसले से उसे धक्का ही लगा है। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद, 17 विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त रूप से श्रीमती मीराकुमार को अपना उम्मीदवार बनाया है।

इतना तो पहले ही स्पष्ट था कि तमाम गैर-एनडीए पार्टियों को एकजुट कर पाना कोई आसान नहीं है। तब तो और भी नहीं जब मुकाबला आरएसएस-भाजपा जैसी सर्वसाधन संपन्न तथा सर्व-तिकड़म समर्थ ताकत से हो।

इसी तरह, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक दलित, रामनाथ कोविंद को अपनी ओर से उम्मीदवार बनाकर, भाजपा ने विपक्ष के लिए कुछ न कुछ दुविधा तो पैदा की ही थी।

बहरहाल, विपक्ष ने भी दलित उम्मीदवार उतारकर, एक हद तक भाजपा के इस पैंतरे का तोड़ तो निकाल ही लिया है।

इन हालात में यह सवाल उठना स्वाभाविक है और आने वाले दिनों में सत्ताधारी गठबंधन द्वारा इसे जोरों से उछाला जा रहा होगा कि जब नतीजा पहले से तय है, फिर चुनाव भी क्यों कराया जा रहा है? जब विपक्ष भी दलित राष्ट्रपति के पक्ष में है तो क्यों न बिना मुकाबले के सर्वसम्मति से राष्ट्रपति का चुनाव हो?

एनडीए के उम्मीदवार, रामनाथ कोविंद से वैसे भी किसी को शायद ही कोई शिकायत हो। राज्यपाल के नाते उनके आचरण पर नीतीश कुमार का सार्टिफिकेट इसका गवाह है। विडंबना यह है कि खुद नितीश कुमार भी एक प्रकार से चुनाव क्यों का सवाल उठा रहे हैं। यह दूसरी बात है कि सवा चतुराई दिखाते हुए उन्होंने यह सवाल उठा दिया है कि ‘‘बिहार की बेटी’’ को हारने वाले मुकाबले में उम्मीदवार क्यों बनाया जा रहा है?

बहरहाल विपक्ष के बड़े हिस्से का, जिसमें वामपंथ की भूमिका खास है, यह कहना है कि समस्या कोविंद के व्यक्तित्व में या उनके दलित नेता होने में नहीं है। समस्या कोविंद के उस एनडीए का उम्मीदवार होने से है, जो भाजपा का मुखौटा है, जो खुद आरएसएस का मुखौटा है। और सब कुछ के बावजूद, कोविंद के सदा आरएसएस के प्रति वफादार बना रहने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। कोविंद के जरिए आरएसएस राष्ट्रपति भवन में ‘अपना आदमी’ बैठाना चाहता है। इस संभावना के प्रतिरोध ही इस संदर्भ में वैचारिक संघर्ष का मूर्त रूप से, जिसकी जरूरत की ओर से दुर्भाग्य से नीतीश कुमार आंखें मूंदना चाहते हैं और एक प्रकार से यह विचित्र तर्क दे रहे हैं कि जीत की गारंटी के बिना संघर्ष का कोई अर्थ नहीं है।

जाहिर है कि विपक्ष की और सबसे बढ़कर वामपंथ की नजर में, राष्ट्रपति पद पर आने वाले व्यक्ति की आरएसएस के प्रति अटूट वफादारी बहुत ही समस्यापूर्ण है। समस्यापूर्ण इसलिए है कि अपने नियंत्रण में चल रही मौजूदा सरकार के माध्यम से आरएसएस, तमाम जनतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने में लगा हुआ है, जिनमें राज्यसभा जैसी संसदीय संस्थाएं भी शामिल हैं। इन संस्थाओं को कमजोर करने का मकसद, देश को धीरे-धीरे आरएसएस की कल्पना के बहुसंख्यकवादी ‘हिंदू राष्ट्र’ को स्वीकार करने की ओर धकेलना है, जो भारतीय राष्ट्र की हमारे संविधान की बुनियाद में निहित एक धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक, संघीय राष्ट्र की परिकल्पना को कमजोर तथा अंतत: नष्ट करने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं है। एक बहुधार्मिक, बहुजातीय, बहुभाषाभाषी तथा बहुसांस्कृतिक राष्ट्र की जनतांत्रिक कल्पना पर आधारित हमारे संविधान के तकाजों और आरएसएस के ‘‘हिंदू राष्ट्र’’ के प्रोजैक्ट का यह टकराव हालांकि भाजपा के जरिए आरएसएस के हाथों में राजसत्ता आने से शुरू नहीं हुआ है, लेकिन उसके हाथ में राजसत्ता आने ने इस टकराव को बहुत तेज कर दिया है।

            इस तीखे होते टकराव के संदर्भ में राष्ट्रपति की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। बेशक, विपक्ष की और खासतौर पर वामपंथ की यह कल्पना हर्गिज नहीं है कि राष्ट्रपति के पद को, कार्यपालिका के खिलाफ किसी तरह के तख्तापलट के लिए या उसके जनादेश को किसी तरह से नकारने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, किया जाना चाहिए।

वास्तव में वामपंथ ने राष्ट्रपति पद के ऐसे संविधान विरोधी उपयोग का हमेशा विरोध किया है, जिसका उदाहरण राजीव गांधी की सरकार को अस्थिर करने के लिए ज्ञानी जैल सिंह का इस्तेमाल किए जाने का उसका सार्वजनिक विरोध था। लेकिन, राष्ट्रपति से विपक्ष की यह अपेक्षा जरूर होगी कि वह मौजूदा संदर्भ में ‘‘हिंदू राष्ट्र’’ के प्रोजैक्ट के हमलों से देश के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए, बेशक अपनी संवैधानिक शक्तियों के दायरे में ही, हस्तक्षेप करे। एक प्रकार से यह राष्ट्रपति से ‘राष्ट्र की अंतरात्मा के रखवाले’ की यानी सचमुच राष्ट्रपति की भूमिका निभाने की मांग है।

            जाहिर है कि आरएसएस के प्रति वफादार राष्ट्रपति से यह भूमिका अदा करने की उम्मीद कोई नहीं कर सकता है। रामनाथ कोविंद से ऐसी भूमिका अदा करने की उम्मीद कोई नहीं कर सकता है। ऐसे मामलों में उनके रुख को लेकर सामने आए दो उदाहरण यह बात बिल्कुल साफ कर देते हैं। पहला तो यह कि भाजपा के दलित मोर्चा के अध्यक्ष के नाते कोविंद ने, मुस्लिम तथा ईसाई दलितों को दलितों के रूप में मान्यता दिए जाने का जोरदार विरोध किया था, जो इस मुद्दे पर आरएसएस के रुख का ही प्रस्तुतीकरण था। दूसरे, विकीलीक्स के अनुसार उसी पद पर रहते हुए अमरीकी दूतावास के एक अधिकारी से लंबी बातचीत में उन्होंने न सिर्फ दलितों के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग का विरोध किया था बल्कि जाति पर आधारित भेदभाव बहुत कम रह जाने और रोजगार के मामले में जातिगत हैसियत के बजाए आर्थिक हैसियत ही प्रधान होने का भी दावा किया था, जो जाति के बजाए  आर्थिक आधार पर आरक्षण आदि के आरएसएस के बुनियादी आग्रह का ही प्रतिबिंबन है। खुद दलित नेता होने के अपने दावे के बावजूद, जो कोविंद आरएसएस की बुनियादी ब्राह्मणवादी सोच से खुद को अलग नहीं कर सकते हैं, उनसे धर्म और संस्कृति की आड़ में संवैधानिक व्यवस्थाओं पर हमलों के मामले में, आरएसएस के खिलाफ खड़े होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

            इन हालात में धर्मनिरपेक्ष विपक्ष का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस चुनाव के जरिए राष्ट्रपति के पद पर कब्जे की आरएसएस की कोशिश का प्रतिरोध करे। हार तय हो तब भी प्रतिरोध करे। आत्मसमर्पण नहीं संघर्षपूर्ण हारों से होकर ही जीत का रास्ता बनता है। फिर यहां हार का कम से कम नीतीश कुमार के समर्पण से ज्यादा सम्मानजनक होना तय है। यह भी याद रहे कि हार पक्की होते हुए भी सबसे ज्यादा राष्ट्रपति चुनाव लडऩे-लड़ाने का भी रिकार्ड भाजपा का ही है।                                                                                                            0

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