न लगता आपातकाल तो संघी भारत को बना देते पाकिस्तान, जानें संघ ने इंदिरा से माँगी थी माफी

संघ प्रमुख देवरस ने इंदिरा जी के चुनाव संबंधी फैसले को उचित माना था। देवरस ने जेल से इंदिरा जी को अनेक पत्र लिखे थे। इंदिरा जी के अलावा उन्होंने आचार्य विनोबा भावे को भी पत्र लिखे थे।...

हाइलाइट्स

यहां इस बात का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि आपातकाल सिर्फ दो वर्ष रहा। उसके बाद स्वयं इंदिरा जी ने आपातकाल उठाया और चुनाव कराए। शायद इस बात को जानते हुए कि चुनाव में उनकी और कांग्रेस की हार सुनिश्चित है इसके ठीक विपरीत यदि जयप्रकाश के आह्वान पर फौज और पुलिस विद्रोह करके सत्ता अपने हाथ में ले लेती तो देश से लोकतंत्र वैसे ही गायब हो जाता जैसे पाकिस्तान में हो गया था।

एल.एस. हरदेनिया

प्रतिवर्ष के अनुसार भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 25 जून को देशभर में आपातकाल को लेकर शोर मचाया और आपातकाल को भारतीय इतिहास का काला पृष्ठ बताया।

परंतु भाजपा आपातकाल से जुड़े ऐसे तथ्यों को उजागर नहीं करती है जिनके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करना पड़ा था।

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आपातकाल के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान में केन्द्र सरकार को कुछ विशेष परिस्थितियों में आपातकाल लागू करने का अधिकार दिया गया है। यदि केन्द्रीय सरकार यह महसूस करती है कि देश में कानून का राज संचालित करना संभव नहीं है तो वह आपातकाल लागू कर सकती है। इस तरह की परिस्थिति 1975 के जून माह के आते-आते देश में पैदा हो गई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रीमती इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया था। इसके बाद विरोधी पार्टियों ने उनके त्यागपत्र की मांग की थी। मांग मनवाने के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन प्रारंभ कर दिया गया। इस बीच श्रीमती गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के पक्ष में मत दिया और आदेश पारित किया कि वे प्रधानमंत्री के पद पर बनी रह सकती हैं। इसके बावजूद इंदिरा जी के त्यागपत्र की मांग जारी रही और देशव्यापी अभियान भी जारी रहा। अनेक स्थानों में अभियान ने हिंसक रूप भी ले लिया।

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इंदिरा विरोधी अभियान में जनसंघ, समाजवादी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शामिल थे। आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। जयप्रकाश नारायण ने सभी शासकीय कर्मचारियों से अपील की कि वे इंदिरा जी के आदेशों का पालन न करें। यहां तक कि उन्होंने इस तरह का आह्वान फौज और पुलिस से भी किया।

जयप्रकाश नारायण के इस रवैये का उल्लेख करते हुए प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचन्द्र गुहा अपनी किताब "इंडिया आफ्टर गांधी" में लिखते हैं कि ऐसा लगता था कि राज्य सत्ता ही गायब हो जाएगी। जयप्रकाश ने पुलिस और फौज से कहा कि वह "अनैतिक आदेशों को न मानें"। यद्यपि जयप्रकाश नारायण ने 'अनैतिक आदेशों' की परिभाषा नहीं दी थी। पुलिस और फौज को शासन के आदेशों को न मानने का आह्वान अपने आप में एक अनैतिक कृत्य था। शायद इसके चलते इंदिरा जी के सामने कोई अन्य विकल्प नहीं था और अंततः उन्हें आपातकाल लागू करना पड़ा।

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आपातकाल लागू होने के बाद अनेक लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं। जिन लोगों की गिरफ्तारियां हुईं उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस भी शामिल थे। आज संघ का नेतृत्व भले ही कितनी बहादुरी की बात करे, वे भले ही यह कहें कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी इंदिरा जी को प्रधामनंत्री के पद से त्यागपत्र देना था। परंतु जेल में लिखे पत्रों में देवरस ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया था।

देवरस ने पूना स्थित यरवदा जेल से दिनांक 10 नवंबर, 1975 को इंदिरा जी को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में वे लिखते हैं "मैं आपको बधाई देना चाहता हूं कि सर्वोच्च न्यायालय ने आपके चुनाव की वैधता को स्वीकार कर लिया है।"

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इन शब्दों से स्पष्ट है कि संघ प्रमुख देवरस ने इंदिरा जी के चुनाव संबंधी फैसले को उचित माना था। देवरस ने जेल से इंदिरा जी को अनेक पत्र लिखे थे। इंदिरा जी के अलावा उन्होंने आचार्य विनोबा भावे को भी पत्र लिखे थे। देवरस ने इंदिरा जी को संबोधित करते हुए एक पत्र दिनांक 22 अगस्त, 1975 को लिखा था। पत्र निम्न प्रकार थाः

यरवदा सेन्ट्रल जेल, पुणे

 

22.08.1975

 

श्रीमती इंदिरा गांधी

 

प्रधानमंत्री,

 

भारत, नई दिल्ली

 

सम्मान से भरा नमस्कार,

मैंने जेल में आपका संदेश रेडियो में बड़े ध्यान से सुना। 15 अगस्त को राष्ट्र के नाम आपका यह संदेश आल इंडिया रेडियो से दिनांक 15 अगस्त को प्रसारित किया गया था।

आपका संदेश समयानुकूल और संतुलित था। इसलिए मैंने आपको यह पत्र लिखना उचित समझा।

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इस पत्र में देवरस संघ के कार्यक्रम और उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हैं। साथ ही वे ऑफर करते हैं कि वे इंदिरा जी द्वारा अपनाए कार्यक्रम के क्रियान्वयन में सहयोग देने को तैयार हैं। यहां उल्लेखनीय है कि इंदिरा जी ने देश के विकास के लिए एक बीस सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की थी। देवरस ने अपने पत्र में लिखा था कि संघ के कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करते हैं।

आपातकाल के दौरान संघ की गतिविधियां प्रतिबंधित कर दी गईं थीं। देवरस कहते हैं कि हमारे संगठन की शक्ति का उपयोग देश के विकास में किया जाना चाहिए। पत्र के अंत में देवरस अनुरोध करते हैं कि वे हमारे तर्कों पर विचार करेंगी और संघ के बारे में जो गलतफहमियां हैं उन्हें भूलकर संघ पर से प्रतिबंध उठाएंगी। उन्होंने पत्र में प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए समय भी मांगा था।

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देवरस ने कुछ पत्र आचार्य विनोबा जी को भी लिखे। इन पत्रों में वे विनोबा जी से अनुरोध करते हैं कि वे इंदिरा जी के मन में संघ के बारे में जो गलतफहमियां हैं उन्हें दूर करने में मदद करें। देवरस ने यह पत्र बंबई के सेन्ट जार्ज अस्पताल के वार्ड क्रमांक 14 से लिखा था।

अपने इस पत्र में देवरस लिखते हैं "समाचारपत्रों से यह ज्ञात हुआ है कि प्रधामनंत्री आपसे मिलने दिनांक 24 को आने वाले हैं। यह भी बताया गया है कि विनोबा जी और आपके बीच में देश की वर्तमान स्थिति पर विचारविमर्श होगा। मेरा आपसे निवेदन है कि प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान इंदिरा जी के मन में संघ के बारे में जो गलतफहमियां हैं उन्हें आप दूर कर सकेंगे। मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि संघ के स्वयंसेवक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में घोषित कार्यक्रम के क्रियान्वयन में भाग लेंगे ताकि देश की प्रगति और विकास सुनिश्चित किया जा सके"।

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देवरस के इन पत्रों से यह स्पष्ट होता है कि वे इंदिरा जी के कार्यक्रम और उनके नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार थे बशर्ते वे संघ पर लगा प्रतिबंध हटा दें। इन पत्रों से यह भी स्पष्ट होता है कि उन्हें "आपातकाल" से जो आपत्ति थी वह सिर्फ इसलिए थी कि संघ को प्रतिबंधित कर दिया गया था। इन पत्रों से यह भी स्पष्ट है कि देवरस को इंदिरा जी द्वारा घोषित 20 सूची कार्यक्रम स्वीकार था।

इंदिरा जी को लिखे पत्र में वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि जो आंदोलन जयप्रकाश नारायण ने गुजरात व बिहार में किया था उसका संघ से कुछ लेना देना नहीं है। इस तरह एक प्रकार से संघ ने जयप्रकाश से भी किनारा काट लिया था।

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यहां इस बात का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि आपातकाल सिर्फ दो वर्ष रहा। उसके बाद स्वयं इंदिरा जी ने आपातकाल उठाया और चुनाव कराए। शायद इस बात को जानते हुए कि चुनाव में उनकी और कांग्रेस की हार सुनिश्चित है इसके ठीक विपरीत यदि जयप्रकाश के आह्वान पर फौज और पुलिस विद्रोह करके सत्ता अपने हाथ में ले लेती तो देश से लोकतंत्र वैसे ही गायब हो जाता जैसे पाकिस्तान में हो गया था।

National emergency periods in India

इंदिरा विरोधी संगठनों ने आपातकाल के दौरान एक और गंभीर नुकसान किया था। इन संगठनों ने यह अफवाह फैलाई थी कि परिवार नियोजन के कार्यक्रम पर जोर-ज़बरदस्ती से अमल हो रहा है। परिवार नियोजन को बदनाम करके देश की जनसंख्या को नियंत्रण करने के कार्यक्रम को गंभीर ठेस पहुंची थी। इस तरह आपातकाल के इस दूसरे पक्ष की जानकारी होना भी आवश्यक है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)  

 

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July 2,2017 04:37

 

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