भाजपा को इमर्जेंसी याद आना : विपक्ष का ढीला तथा लचीला तालमेल ही संघ-भाजपा के डर का कारण है

उल्टा ही पड़ा भाजपा का यह पैंतरा...तत्कालीन आरएसएस प्रमुख, बालासाहब देवरस की इंदिरा गांधी के लिए माफी मांगू चिट्ठयों से लेकर, संघ के दूसरे कितने ही ‘वीरों’ के माफीनामे तक, लोकस्मृति में ताजा हो गए हैं...

भाजपा को इमर्जेंसी याद आना : विपक्ष का ढीला तथा लचीला तालमेल ही संघ-भाजपा के डर का कारण है                                                                     

भाजपा का इमर्जेंसी दांव और विपक्षी एकता

0 राजेंद्र शर्मा

तेतालीसवीं सालगिरह के मौके पर भाजपा को इमर्जेंसी कुछ ज्यादा ही याद आई है। वैसे यह स्वाभाविक भी है। 1975  की 26 जून को इमर्जेसी लगाकर, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर जो तानाशाही थोपी थी, उसकी यह सालगिरह, नरेंद्र मोदी के राज का पांचवां साल शुरू होने के बाद पड़ रही थी। और इसके प्रबल संकेत सामने हैं कि अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में मोदी राज एक तीखे ढलान पर है। गुजरात जैसे अपने गढ़ में विधानसभाई चुनाव में संघ-भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने के बाद, कर्नाटक में सत्ता हाथ में आकर फिसल जाना तथा अब जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ तीन साल से चल रही गठजोड़ सरकार का टूट जाना और एक के बाद एक लोकसभा तथा विधानसभाई उपचुनावों में भाजपा को तगड़ा धक्का लगने तक, सब उसके नीचे खिसकने के ही इशारे हैं। अचरज नहीं कि पिछले लगभग छ: महीनों में हुए विभिन्न चुनावों के नतीजों के इसी संकेत की पुष्टि और व्यापक स्तर पर, सीएसडीएस-लोकनीति का प्रतिष्ठित जनमत सर्वेक्षण करता है।

राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में भाजपा का हारना तय

                मोदी सरकार की चौथी सालगिरह की पूर्व-संध्या में आए इस सर्वे के अनुसार, न सिर्फ विधानसभाई चुनाव के अगले चक्र में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में भाजपा का हारना तय है बल्कि अगर तुरंत चुनाव हो जाएं तो देश के पैमाने पर भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को सिर्फ 37 फीसद मतदाताओं का समर्थन मिलने जा रहा है, जबकि उसके लिए मुख्य चुनौती बनने वाले कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए को ही 31 फीसद मतदाताओं का। गौर करने वाली बात यह है कि ठीक एक साल पहले, एनडीए के लिए यह समर्थन 45 फीसद था, जो इसी साल जनवरी तक घटकर भी कम से कम 40 फीसद तो था ही। अब उससे भी नीचे खिसक गया है। दूसरी ओर यूपीए के लिए समर्थन एक साल पहले 27 फीसद ही था, जो इसी साल जनवरी तक बढक़र 30 फीसद पर पहुंच गया था और अब वहां से भी कुछ और ऊपर चढ़ गया है। इस तरह, मोदी के नेतृत्व में एनडीए के समर्थन में यह गिरावट न सिर्फ जारी है बल्कि समय के साथ उसकी रफ्तार भी बढ़ रही है। इस निश्चित तथा तीखी गिरावट को रोकने के लिए संघ-भजपा का हाथ-पैर मारना स्वाभाविक है। रमजान के महीने के फौरन बाद और अमरनाथ यात्रा से ठीक पहले भाजपा का जम्मू-कश्मीर की अपनी ही गठजोड़ सरकार को गिराना अगर इस गिरावट को रोकने के लिए गढ़ा गया अपेक्षाकृत लंबी दूरी का हथियार है, तो इमर्जेंसी को अतिरिक्त जोर देकर याद करना, इसी का अपेक्षाकृत तात्कालित हथियार।

इस कसरत से भाजपा को कुछ खास हासिल नहीं

                खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अतिम शाह, अरुण जेटली आदि से लेकर, मीडिया तथा सोशल मीडिया में संघ ‘सैनिकों’ तक के जोर-शोर से ‘काला दिन’ मनाने के जरिए, वैसे तो तीन-तीन निशाने साधने की कोशिश की जा रही थी। देश के पैमाने पर अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी तथा मुख्य विपक्षी पार्टी, कांग्रेस के मुकाबले अपने ‘जनतंत्रवादी’ होने का प्रचार करना; ‘अच्छे दिन लाने’ से लेकर ‘सब का साथ , सब का विकास’ तथा साल में दो करोड़ नये रोजगार तक के अपने नारों/ वादों के जुम्ला बनकर रह जाने को देखते हुए, अगले चुनाव में बहस को खुद अपने प्रदर्शन के बजाए, अपने विरोधियों के अतीत की ओर मोड़ने की कोशिश करना; और अपने खिलाफ बढ़ती तथा ज्यादा से ज्यादा डराने लगी विपक्षी एकता को रोकने की कोशिश करना। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस के निकट मगहर में, कबीर स्मारक पर चादर चढ़ाने के बाद, अपने संबोधन में बाकायदा इसकी शिकायत की कि इमर्जेंसी के समर्थक और उसका विरोध करने वाले, कंधे से कंधा भिड़ाकर चल रहे हैं। अब भाजपा अपनी इन कोशिशों में कितनी कामयाब होती है या कामयाब नहीं होती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन, भाजपा के इमर्जेंसी के जाप पर आम तौर पर विपक्षी पार्टियों की और खासतौर पर इंदिरा गांधी के इमर्जेंसी निजाम का विरोध करने वाली पार्टियों ने जो प्रतिक्रिया की इै, उससे भाजपा को इस कसरत से कुछ खास हासिल होता नजर नहीं आता है।

एक हद तक उल्टा ही पड़ा भाजपा का यह पैंतरा

                वास्तव में भाजपा का यह पैंतरा एक हद तक उल्टा ही पड़ा लगता है। इसकी वजह यह है कि अन्य विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने चार दशक पहले की इमर्जेंसी में भूमिकाओं के आधार पर, भाजपा को ‘मित्र’ तथा कांग्रेस को ‘शत्रु’ मानने से ही इंकार नहीं किया है बल्कि मोदी राज को ही ‘अघोषित इमर्जेंसी’ राज घोषित कर दिया है, जिसका आज मुकाबला करना जरूरी है। सीपीएम तथा अन्य वामपंथी पार्टियों ने तो मोदी राज को ‘सांप्रदायिक तानाशाही’ का राज करार देकर, देश व जनता की एकता के लिए इंदिरा गांधी की इमर्जेसंी से भी बड़ी चुनौती ठहराया है। इस तरह, विपक्ष ने मजबूती से फोकस मोदी सरकार के रिकार्ड तथा उसका मुकाबला करने पर ही बनाए रखा है।

इतना ही नहीं, संघ-भाजपा को इमर्जेंसी के खिलाफ संघर्ष का मुख्य ‘‘नायक’’ बनाने की अपनी हड़बड़ी में, भाजपा नेताओं ने इमर्जेंसी में खासतौर पर आरएसएस की ‘माफी मांगू’ भूमिका को उघाड़ा कर दिया है। नतीजतन तत्कालीन आरएसएस प्रमुख, बालासाहब देवरस की इंदिरा गांधी के लिए माफी मांगू चिट्ठयों से लेकर, संघ के दूसरे कितने ही ‘वीरों’ के माफीनामे तक, लोकस्मृति में ताजा हो गए हैं।

संघ-भाजपा का ‘गोदी मीडिया’

                बहरहाल, ‘विपक्षी एकता’ के विचार की वैधता पर ही सवाल खड़े करने की संघ-भाजपा तथा उनके ‘गोदी मीडिया’ की कोशिशें रुकने वाली नहीं हैं। वास्तव में ये कोशिशें विपक्षी एकता की वैधता को वैचारिक स्तर पर प्रश्नांकित करने में चाहे बहुत कामयाब न हों, फिर भी उसकी व्यावहारिकता पर सवाल खड़े करने में जरूर कामयाब हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी अखिल भारतीय पार्टियों की मौजूदगी के बावजूद, हमारे देश की राजनीति महत्वपूर्ण तरीके से बहुध्रुवीय बनी हुई है। हमारे देश की समृद्घ विविधता की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में यह बहुध्रुवीयता महत्वपूर्ण भी है और काम्य भी। अपनी केंद्रीयतावादी तथा एकात्मकतावादी सोच के चलते संघ-भाजपा बेशक बुनियादी तोर पर इस बहुध्रुवीयता के विरोधी हैं, फिर भी इस सचाई से एडजस्ट करते हुए उन्हें भी गठबंधन का रास्ता अपनाना पड़ा है।

बहरहाल, भारतीय राजनीति की यही बहुध्रुवीयता यह सुनिश्चित करती है कि मोदी निजाम का विरोध करने वाली ताकतों का भी, ‘एक के मुकाबले एक’ के आधार पर चुनाव में एकजुट होना आसान नहीं होगा।

                बेशक! ‘सांप्रदायिक तानाशाही’ का खतरा, मोदी राज का विरोध करने वाली ताकतों पर जमीनी स्तर पर एक साथ आने के लिए जैसा दबाव बना रहा है, उससे निकलने वाली संभावनाओं का पूरा अनुमान लगाना आसान नहीं है। मिसाल के तौर पर गोरखपुर, फूलपुर के उपचुनाव से पहले तक कौन सोच सकता था कि सपा-बसपा साथ आ सकती हैं और देश के इस सबसे ज्यादा लोकसभा सदस्य चुनने वाले राज्य में, भाजपा की राह बहुत मुश्किल कर सकती हैं।

विपक्ष का यह ढीला तथा लचीला तालमेल वास्तव में संघ-भाजपा को इसी का डर है।                                                                     

बहरहाल, भाजपाविरोधी विपक्षी कतारबंदियों के इस तरह के सारे विस्तार तथा सुदृढ़ीकरण के बावजूद, इसकी संभावना करीब-करीब नहीं ही है कि भाजपा के मुकाबले समूचे विपक्ष की कोई पूरी तरह से एकीकृत कतारबंदी मैदान में होगी। लेकिन, संघ-भाजपा के पैरोकारों के प्रचार के विपरीत, भाजपा के नेतृत्व वाले छीजते हुए गठजोड़ को पराजित करने के लिए, विपक्ष की ऐसी मुकम्मल कतारबंदी जरूरी भी नहीं है। ज्यादा संभावना इसी की है कि मोदी निजाम के विरोध के मुद्दे पर एकजुट विपक्ष में भी, जहां देश के एक हिस्से में कांग्रेस के गिर्द एक न्यूनतम गठबंधन सत्ताधारी गठजोड़ का मुकाबला कर रहा होगा, वहीं अन्य अनेक राज्यों में अलग-अलग राज्यस्तरीय गठबंधन यही भूमिका संभालेंगे। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने इसे ‘अलग-अलग मार्च करने और एक साथ प्रहार करने’ की रणनीति का नाम दिया है।

विपक्ष का यह ढीला तथा लचीला तालमेल, न सिर्फ भाजपा के नेतृत्ववाले गठजोड़ को बहुमत से दूर रख सकता है बल्कि मोदी राज का विकल्प प्रस्तुत करने के लक्ष्य की एकता के आधार पर, चुनाव के बाद वैकल्पिक गठबंधन/ सरकार का रास्ता भी तैयार कर सकता है। वास्तव में संघ-भाजपा को इसी का डर है।                                                                     0

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