आपातकाल में अंधेरा था तो रोशनी भी थी, अब अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं

​​​​​​​जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी, आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है। दार्जिलिंग जल रहा है और बाकी देश में कोई हलचल नहीं है। किसानों की खुदकशी को फैशन बताया जा रहा है।...

पलाश विश्वास

आज आदरणीय आनंद स्वरूप वर्मा ने समकालीन तीसरी दुनिया में प्रकाशित आपातकाल से संबंधित सामग्री शेयर किया है।

इसके अलावा प्रधान स्वयंसेवक ने अपनी अमेरिका यात्रा के मध्य देश की जनता से मंकी बातें की हैं।

सोशल मीडिया में उनके करोड़ों फालोअर है और समूचा मीडिया उनका माउथ पीस है। इसलिए आपातकाल के बारे में उनकी टिप्पणी का जबाव देने की हैसियत हमारी नहीं है।

शायद यह हैसियत किसी की नहीं है।

स्वयंसेवक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता भारतीय संविधान और लोकतंत्र के बजाय मनुस्मृति व्यवस्था के प्रति होगी

जैसे जर्मनी में सिर्फ हिटलर को बोलने की आजादी थी, आज सिर्फ मंकी बातों की आजादी है।

दो दिन के लिए नजदीक ही अपने फुफेरे भाई के वहां उनके गांव में गया था। इधर मेरे पास अनुवाद का कोई काम भी नहीं है। कल सुबह ही लौट आया।

कल से कोशिश कर रहा हूं कि कुछ लिखूं लेकिन शब्द चूक रहे हैं। लिखना बेहद मुश्किल हो गया है।

कल शेक्सपीअर के मैकबैथ से लेडी मैकबैथ के कुछ संवाद फेसबुक पर पोस्ट किये थे। शेक्सपीअर ने यह दुखांत नाटक महारानी एलिजाबेथ के स्वर्णकाल में तब लिखा था, जब शुद्धतावादी प्युरिटन आंदोलनकारियों ने लंदन में थिएटर भी बंद करवा दिये थे।

 

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लेडी मैकबेथ अब निरंकुश सत्ता का चरित्र है और उसके हाथों पर लगे खून के दाग सात समुंदर के पानी से भी धोया नहीं जा सकता। शुद्धतावादियों का तांडव भी मध्ययुग से लेकर अब तक अखंड हरिकथा अनंत है।

आज मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में पोस्ट किया है।

शेक्सपीअर से लेकर मुक्तिबोध की दृष्टि से इस कटकटेला अंधियारे में रोशनी की खोज कर रहा हूं, लेकिन अफसोस कि रोशनी कहीं दीख नहीं रही है।

दार्जिलिंग जल रहा है और बाकी देश में कोई हलचल नहीं है।

किसानों की खुदकशी को फैशन बताया जा रहा है।

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उत्तराखंड के खटीमा से भी एक किसान की खुदकशी की खबर आयी है, जो मेरे लिए बेहद बुरी खबर है। उत्तराखंड की तराई में किसानों की इतनी बुरी हालत कभी नहीं थी।

इस राष्ट्र की जनता अब जनता नहीं, धर्मोन्मादी अंध भीड़ है। सिर्फ आरोप या शक के आधार पर वे कहीं भी किसी की जान ले सकते हैं। ऐसे लोग नागरिक नहीं हो सकते।

ऐसे लोग मनुष्य भी हैं या नहीं, यह कहना मुश्किल है।

वैदिकी हिंसा की संस्कृति अब संस्थागत है, इस संस्थागत हिंसा को रोक पाना असंभव है।

राष्ट्र भी अब कारपोरेट मुक्त बाजार है।

आपातकाल और ‘आधार’ पहचान संख्या का रिश्ता

जब आपातकाल लगा था, उस वक्त राजनीति कारपोरेट एजंडे के मुताबिक कारपोरेट फंडिंग से चल नहीं रही थी और न ही सर्वदलीय संसदीय सहमति से एक के बाद एक जनविरोधी नीतियां लागू करके जनसंख्या सफाया अभियान चल रहा था।

गौरतलब है कि आपातकाल से पहले, आपातकाल के दौरान और आपातकाल के बाद भी प्रेस सेंसरशिप के बावजूद सूचना महाविस्फोट से पहले देश के गांवों और जनपदों से सूचनाएं खबरें आ रही थी। दमन था तो उसका प्रतिरोध भी था।

अंधेरा था, तो रोशनी भी थी।

खेती तब भी भारत की अर्थव्यवस्था थी और किसान मजदूर थोक आत्महत्या नहीं कर रहे थे।

छात्रों, युवाओं, महिलाओं, किसानों और मजदूरों का आंदोलन कभी नहीं रुका। साहित्य और संस्कृति में भी आंदोलन चल रहे थे।

देश के मुक्तबाजार बन जाने के बाद सूचना महाविस्फोट के बाद सूचनाएं सिरे से गायब हो गयी हैं।

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आम जनता की कहीं भी किसी भी स्तर पर सुनवाई नहीं हो रही है। किसी को चीखने की या रोने या हंसने की भी इजाजत नहीं है।

जिस ढंग से बुनियादी जरूरतों और सेवाओं को आधार कार्ड से नत्थी कर दिया गया है, उससे आपकी नागरिकता दस अंकों की एक संख्या है, जिसके बिना आपका कोई वजूद नहीं है। न आपके नागरिक अधिकार हैं और न मानवाधिकार। आपके सपनों, आपके विचारों आपकी गतिविधियों, आपकी निजी जिंदगी और आपकी निजता और गोपनीयता पर राष्ट्र निगरानी कर रहा है। आपकी कोई स्वतंत्रता नहीं है और न आप स्वतंत्र हैं।

जिस तरीके से नोटबंदी लागू की गयी, संगठित असंगठित क्षेत्र के लाखों लोगों के हाथ पांव काट दिये गये, उनकी आजीविका छीन ली गयी और उसका कोई राजनीतिक विरोध नहीं हुआ, वह हैरतअंगेज है।

जिस तरह संघीय ढांचे को तिलांजलि कारपोरेट वर्चस्व और एकाधिकार के लिए किसानों के बाद अब कारोबारियों और छोटे मंझौले उद्यमियों का सफाया होने जा रहा है, उसके मुकाबले आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी के किस्से कुछ भी नहीं हैं।

 

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