नवसाम्राज्यवादी जुए के नीचे राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की फर्जी जंग

उग्र- पूंजीवाद को चाहिए उग्र-राष्ट्रवाद... गंभीर वैचारिक अंतर्वस्तु नहीं राष्ट्र-भक्ति बनाम राष्ट्र-द्रोह की जंग में... ...

नवसाम्राज्यवादी जुए के नीचे राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की फर्जी जंग

प्रेम सिंह

    भारत का नागरिक जीवन, खास कर पिछले दो दशकों से, राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह के बीच छिड़ी जंग से आक्रांत चल रहा है. लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका सहित चौथा स्तंभ कहा जाने वाला प्रेस-प्रतिष्ठान, शिक्षा एवं शोध-संस्थान, नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) के स्वतंत्र और प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी और अलग-अलग क्षेत्रों के एक्टिविस्ट/जनांदोलनकारी इस जंग में भाग लेते देखे जा सकते हैं. यहां तक कि देश का रक्षा-प्रतिष्ठान भी अक्सर इस जंग में जूझता नज़र आता है. सत्ता-सरंचना में समाज के ऊंचे और मंझोले स्तरों पर दिन-रात जारी यह जंग निचले स्तरों पर अपना का असर न डाले यह संभव नहीं है.   

उग्र- पूंजीवाद को चाहिए उग्र-राष्ट्रवाद

    मौजूदा सरकार के सत्तासीन होने के बाद से यह जंग ज्यादा तेज़ हुई है. यह स्वाभाविक है. राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह का जुड़ाव राष्ट्रवाद से है. राष्ट्रवाद को पूंजीवाद के साथ जोड़ कर देखा जाता है. उग्र- पूंजीवाद को उग्र-राष्ट्रवाद चाहिए. उग्र-राष्ट्रवाद में राष्ट्रीय अस्मिता/चेतना का पूंजीवादी लूट को सुरक्षित बनाने के लिए अंध-दोहन किया जाता है. इस प्रक्रिया में लोगों के सामने राष्ट्र-द्रोही के रूप में एक फर्जी शत्रु बना कर खड़ा कर दिया जाता है. लोग अपने और राष्ट्र के असली शत्रु (वर्तमान दौर में कार्पोरेट पूंजीवाद) को भूल कर फर्जी शत्रु से भिड़ंत में जीने लगते हैं. भारत और दुनिया के कई देशों में उभरा उग्र-राष्ट्रवाद किसी न किसी रूप में उग्र-पूंजीवाद की अभिव्यक्ति (मेनिफेस्टेशन) है.       

गंभीर वैचारिक अंतर्वस्तु नहीं राष्ट्र-भक्ति बनाम राष्ट्र-द्रोह की जंग में

    भारत में छिड़ी राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग के मूल में राष्ट्र को लेकर कोई सुचिंतित और गंभीर वैचारिक अंतर्वस्तु (कंटेंट) नहीं है. यह सिद्ध करने के लिए इस जंग के विभिन्न वैचारिक-रणनीतिक प्रसंगों और आयामों की लंबी तफसील देने की जरूरत नहीं है. जिस तरह से पक्षों, पात्रों, विचारों, आख्यानों, मुद्दों, प्रतीकों, लक्ष्यों, रणनीतियों आदि का पल-पल पाला बदल होता है, उससे राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग की विमूढ़ता स्वयंसिद्ध है. राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-द्रोह की जंग का स्वरुप किस कदर विद्रूप और हास्यास्पद बन गया है, यह महज तीन बिंबों पर नज़र डालने से यह स्पष्ट हो जाता है. एक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में टैंक रखवाया जाना; दो, कश्मीर में फौजी अफसर का एक नागरिक को जीप के बोनेट से बांध कर प्रतिरोधकर्ताओं के सामने घुमाना; तीन, इस बार हज करने मक्का गए भारतीय मुसलामानों का वहां पर राष्ट्र-ध्वज तिरंगे का अजीबोगरीब प्रदर्शन करना.

    कई विद्वान् इस जंग में राष्ट्र के अलग-अलग आख्यान और उनकी टकराहट खोजते हैं. उस बहस पर मैं यहां गहराई में नहीं जाना चाहता. केवल यह कहना है कि आधुनिक भारत में राष्ट्र की अवधारणा का संबंध अनिवार्यत: उपनिवेशवाद विरोध से जुड़ा हुआ है. राष्ट्र का कोई भी आख्यान अगर नवसाम्राज्यवाद को संबोधित नहीं करता है, तो वह खुद अपने फर्जी होने की सच्चाई स्वीकार करता है. राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में राजनीति होती है. राजनीति वास्तविक भी हो सकती है (होनी चाहिए) और फर्जी भी. जहां फर्जी राजनीति समवेत रूप में धड़ल्ले से चलती है, वहां राष्ट्रीय जीवन में सब कुछ फर्जी होता चला जाता है. भारत में पिछले करीब तीन दशकों से यही होता चला आ रहा है. राष्ट्र-द्रोह के आरोपों की बौछार झेलने वाले पक्ष की तरफ से जिस भारतीय-राष्ट्र के तर्क दिए जाते हैं, वे भी प्राय: उतने ही उथले हैं, जितने खुद अपने को राष्ट्र-भक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले हिंदू-राष्ट्र के दावेदारों द्वारा दिए जाते हैं.

    एक उदाहरण पर्याप्त होगा. पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय में भाषण देने जाने पर काफी विवाद हुआ. जब उन्होंने भाषण दे दिया तो उनके जाने का विरोध करने वाले तुरंत पाला बदल कर उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगे. कहा गया कि श्री मुखर्जी ने आरएसएस को उसके मुख्यालय में जाकर भारतीय-राष्ट्र का पाठ अच्छी तरह से पढ़ा दिया है. यह कहते वे मगन हो गए कि भारतीय-राष्ट्र का विचार और उसके प्रणेता कितने महान हैं! और, ज़ाहिर है, उस विचार तथा उसके प्रणेताओं को मानने वाले हम भी!

    यह सवाल उठाया ही नहीं गया कि भारतीय-राष्ट्र के महान विचार और प्रणेताओं के रहते हिंदू-राष्ट्र का इस कदर उभार कैसे हो गया? जबकि वह पिछले 80 सालों, डॉ. लोहिया के 'हिंदू बनाम हिंदू' निबंध का हवाला लें तो हजारों साल से हवा में तैर रहा था. यह सवाल उठता तो यह भी पूछा जाता कि देश के समस्त अकादमिक, शैक्षिक, साहित्यिक, कलात्मक, सांस्कृतिक संस्थानों और बड़े-बड़े एनजीओ की जिम्मेदारी लिए होने के बावजूद देश का साधारण सहित शिक्षित-संपन्न तबका भारत से लेकर विदेशों तक हिंदुत्ववादी-फासीवादी मानसिकता के साथ क्यों चला गया?

अपनी जिम्मेदारी का सवाल बहस में आने ही नहीं देना चाहते भारतीय-राष्ट्र के दावेदार

दरअसल, भारतीय-राष्ट्र के दावेदार अपनी जिम्मेदारी का सवाल बहस में आने ही नहीं देना चाहते. जिम्मेदारी का सवाल बहस में आने से उन्हें आत्मालोचना करनी होगी. आत्मालोचना वही करता है, जो अपने को आलोचना से परे नहीं मानता. भारतीय-राष्ट्र के खास कर मार्क्सवादी, आधुनिकतावादी और इच्छा-स्वातंत्र्यवादी (लिबरटेरीयंस) दावेदार नहीं चाहेंगे कि इस बात पर खुले में चर्चा हो. वे भारतीय-राष्ट्र का हिंदू-राष्ट्र के बरक्स रणनीतिक इस्तेमाल भर करते हैं. वह रणनीति आरएसएस को एक अकेला शत्रु चित्रित करने की है. (यह आरएसएस को माफिक आता है, क्योंकि उसकी भी वही रणनीति है.)

    उपनिवेशवादी वर्चस्व के दौर से लेकर आजादी हासिल करने तक जो भारतीय-राष्ट्र का स्वरूप बना, और जो अपनी खूबियों-कमियों के साथ अभी भी क्षीण रूप में निर्माणाधीन है, मार्क्सवादी, आधुनिकतावादी और इच्छा-स्वातंत्र्यवादी उस स्वरूप को लेकर  स्पष्टता नहीं बरतना चाहते. शायद उनमें से ज्यादातर की निष्ठा उसमें नहीं है. उनका सरोकार अपने बौद्धिक दाव-पेचों से है, जिनके बल पर वे राष्ट्रवाद का खटराग चलाए रखना चाहते हैं, जिसमें एक तरफ भारतीय-राष्ट्र के दावेदार हों और दूसरी तरफ हिंदू-राष्ट्र के दावेदार. ज्यादातर अंग्रेजी में पगे ये बौद्धिक अभिजन यह समझने को तैयार नहीं हैं कि भारत की मेहनतकश जनता ने उनके इन बौद्धिक दाव-पेचों की भारी कीमत चुकाई है; और वह अब तरह-तरह की भ्रांतियों का शिकार हो चुकी है.

आरएसएस जानता है भाजपा की सरकार हमेशा नहीं रहनी है

    श्री मुखर्जी के भाषण के संदर्भ में भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों की ओर से यह सवाल उठाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि ये दोनों राष्ट्र ख़ुशी-ख़ुशी नवसाम्राज्यवाद का जुआ खींचने में एक साथ जुते हुए हैं. आरएसएस विरोधी कितना ही लोकतंत्र का वास्ता देकर फासीवाद विरोध का आह्वान करते हों, आरएसएस जानता है भाजपा की सरकार हमेशा नहीं रहनी है. उसने राहुल गांधी को अपने मुख्यालय में आने का निमंत्रण दे दिया है. भारतीय-राष्ट्र के दावेदारों के समर्थन से जब कारपोरेट के किसी और प्यादे की पूरी मज़बूती बन जायेगी, तो आरएसएस उसे भी अपने यहां बुला लेगा. यह अप्रोप्रिएसन नहीं है. नवसाम्राज्यवाद के समर्थन में दो फर्जी पक्षों का एका है, जो 1991 के बाद से अंदरखाने उत्तरोतर मज़बूत होता गया है.

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