एक हाथ में तिरंगा और दूसरे में हिन्दुत्व ये दो चीजें नहीं चल सकतीं

15 अगस्त महज एक तारीख या जश्न का दिन या इवेंट नहीं है बल्कि इतिहास है।यह इतिहास उन लोगों का जिन्होंने इसको रचा है। जिन लोगों ने रचा है उनमें नेता भी हैं जनता भी है, 

जगदीश्वर चतुर्वेदी
Updated on : 2018-08-13 12:07:08

एक हाथ में तिरंगा और दूसरे में हिन्दुत्व ये दो चीजें नहीं चल सकतीं

पन्द्रह अगस्त और आरएसएस

जगदीश्वर चतुर्वेदी

15 अगस्त आ रहा है तो खुद लिखो कि आपके शहर में 70 साल में क्या नया बना है और बिगड़ा है। शेयर करने की आदत से बाहर निकलो, स्वयं बोलना सीखो, लिखना सीखो, फेसबुक की शक्ति को अपनी ताकत बनाओ, मूक बनकर शेयर करो की मनोदशा से बाहर निकलो।

हम सबके शहर या गांव में आज क्या हालात हैं, लोग कैसे हैं, राजनीति किस तरह करवट बदल रही है, बच्चों, औरतों, मजदूरों, किसानों के क्या हालात हैं, इन सब विषयों पर लिखो, कुछ न सही आपने बाजार पर ही लिखो। अनुकरण करना छोड़ो। स्वाधीनता का अर्थ अनुकरण नहीं आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता है।

सोचो सब नियम के पाबंद हिन्दू हो जाएं, सब संत हो जाएं. यदि ऐसा होगा तो देश का भट्टा बैठ जाएगा। अधिकांश चीजें बंद हो जाएंगी। सोचो क्या खुला रहेगा और क्या बंद हो जाएगा ? इकसार राष्ट्र सबसे बुरी चीज है।

15 अगस्त महज एक तारीख या जश्न का दिन या इवेंट नहीं है बल्कि इतिहास है।यह इतिहास उन लोगों का जिन्होंने इसको रचा है। जिन लोगों ने रचा है उनमें नेता भी हैं जनता भी है, इसमें अनेक रंगत के क्रांतिकारी और उदार विचार भी हैं। लेकिन जो इस इतिहास के निर्माण के विरूद्ध खड़े थे उनको इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता। 15अगस्त का इतिहास जब भी पढ़ा जाएगा, या इस दिन को याद किया जाएगा तो उन लोगों और उन विचारधाराओं पर नजर रखने की जरूरत है जिनके कारण देश टूटा, सामाजिक सद्भाव नष्ट हुआ, जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी की और स्वतंत्रता के मार्ग में बाधाएं खड़ी कीं।

ज्यों ही 15 अगस्त आने को हुआ आरएसएस वालों का सालों-साल चलने वाला हिन्दूवादी राष्ट्रवाद धूम-धड़ाके साथ चरमोत्कर्ष तक पहुँच गया है। मोदी सरकार आने के पहले तक संघ ने कभी तिरंगा को लेकर राष्ट्रीय पदयात्रा नहीं निकाली।

तिरंगा देश भक्ति का प्रतीक है, ये लोग इसे हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रतीक में, उन्माद के प्रतीक में तब्दील करना चाहते हैं। हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं आरएसएस ने क्या अपने पूर्व नेताओं के तिरंगा के बारे में व्यक्त विचारों को अस्वीकार कर दिया है ?क्या कभी भारत की जनता के सामने इस तरह की कोई घोषणा की गयी कि वे अपने तिरंगा के बारे में घोषित विचारों को खारिज करते हैं ?

एक हाथ में तिरंगा और दूसरे हाथ हिन्दुत्व ये दो चीजें नहीं चल सकतीं। तिरंगा का अर्थ है हिन्दुत्व का त्याग, संविधान की सभी धारणाओं को नतमस्तक होकर मानना, संविधान की अब तक जो अवमानना संघ के नेताओं ने लेख लिखकर या भाषण देकर की है उसके लिए भारत की जनता से वे पहले माफी मांगे, वरना उनकी तिरंगा यात्रा मात्र नाटक है और तिरंगा के रीयल अर्थ को विकृत करने की साजिश है।

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