मोदी के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व मायावती-अखिलेश या अन्य किसी क्षेत्रीय दल के हाथ में नहीं है

पाँच राज्यों में अपनी सरकारों के अलावा पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडू में समझौते के बाद इस लड़ाई के नेतृत्व में कांग्रेस स्थापित हो चुकी है।...

मोदी के ख़िलाफ़ विपक्ष की एकता (Opposition unity against Modi) अभी राजनीतिक चर्चा (Political discussion) का एक प्रमुख विषय है। कुछ राज्यों की परिस्थिति साफ़ हो चुकी है। लेकिन मूलत: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का मामला उलझा हुआ होने से इसमें भारी असमंजस और आधा-अधूरापन दिखाई दे रहा है।

विपक्ष की एकता की स्थिति पर

The fight against Modi is not in the hands of Mayawati-Akhilesh or any other regional party.

अरुण माहेश्वरी

मन में यह सवाल उठता है कि मायावती (Mayawati) क्यों आगे बढ़-बढ़ के कांग्रेस के साथ कोई समझौता(No agreement with Congress) करने की बातें कह रही है ? इसमें राजनीति (Politics) है या कोई दूसरी गैर-राजनीतिक बात, समझना मुश्किल है। कल ही एक ओर मायावती के वक्त के उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव नेतराम (NetRam) के घर पर आयकर का छापा पड़ा, और दूसरी ओर मायावती का यह बयान आया। 

अब कम से कम तक इतना तो साफ़ है कि मोदी के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व मायावती-अखिलेश या अन्य किसी क्षेत्रीय दल के हाथ में नहीं है। पाँच राज्यों में अपनी सरकारों के अलावा पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडू में समझौते के बाद इस लड़ाई के नेतृत्व में कांग्रेस स्थापित हो चुकी है। वामदल भी केरल में अपनी सरकार और पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में अपनी मज़बूत स्थिति के चलते नई धर्म-निरपेक्ष सरकार के मज़बूत सहयोगी की भूमिका अदा करने के लिये तैयार दिखाई देने लगे हैं। इसीलिये मायावती के इस मत से उन्हें कोई ख़ास राजनीतिक लाभ शायद ही मिलेगा। फिर भी, उत्तर प्रदेश में पिछले उप-चुनावों के परिणामों से यह समझा जा सकता है कि उसे कांग्रेस को छोड़ कर चलने से सीटों के मामले में कोई विशेष नुक़सान नहीं होगा।

वैसे कहने के लिये कह सकते हैं कि अभी की स्थिति का अंतिम परिणाम अस्पष्ट है। लेकिन बीजेपी खुद इतना जान गई है कि उसका अब जीत कर आना असंभव हो चुका है। विभिन्न राज्यों में वह अपनी जीती हुई सीटों को छोड़ कर भी अन्य दलों से जिस प्रकार गठबंधन करने के लिये आकुल-व्याकुल है, उससे यह बात पूरी तरह से प्रमाणित होती है। और, कहना न होगा, यही जमीनी यथार्थ विपक्ष के दलों पर उल्टे रूप में काम कर रहा है। बीजेपी की पराजय का मुद्दा उसके हिसाब के बाहर चला जा रहा है।

आज बीजेपी के अपने सिर्फ पचीस प्रतिशत मत रह गये हैं। पिछले चुनाव में उसे मिले मतों में 10 प्रतिशत की निश्चित सार्विक गिरावट हुई है। इसे हर कोई देख सकता है और इससे उबरने का उसके पास अब कोई उपाय बचा नहीं है। मोदी के कार्यकाल का हर क़दम, बल्कि हर क्षण उसके ख़िलाफ़ काम कर रहा है। दरअसल यह भारत में नव-उदारवाद के सार्विक संकट का भी एक स्वाभाविक परिणाम है। मोदी के पागलपन और ट्रंप के पागलपन में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। दोनों के पास अपने संकट से निकलने का नव-उदारवादी रास्ता अपनी उपयोगिता गंवा चुका है। इसीलिये मोदी राष्ट्रवाद की तरह के वायवीय विषयों से वह सिर्फ अपना मन बहला रहे है। उनकी पराजय को सुनिश्चित जान कर ही सभी विपक्षी दल उस नई परिस्थिति में अब अपने को देखने लगे हैं और अपनी रणनीतियाँ तैयार कर रहे हैं। इसीलिये आपस में इतनी ज़्यादा खींच-तान भी चल रही है।

इन सबके बीच देखना यह है कि जनता विपक्ष के चुनाव में किस प्रकार का निर्णय लेती है। हमारा अनुमान विगत कुछ सालों के चुनाव परिणामों पर टिका हुआ है। गुजरात के चुनाव के बाद के परिणामों पर। हमारे पास ज़मीनी सर्वेक्षण की कोई सुविधा नहीं है, लेकिन मोदी-विरोधी प्रबल जन-भावना को हम महसूस कर सकते हैं। अभी जनता का हर हिस्सा सड़क पर उतरा हुआ है। एनडीटीवी (NDTV) में रवीश कुमार (Ravish Kumar) के कार्यक्रमों से इसे साफ देखा जा सकता है। अन्य चैनल भले लोगों की इन बेचैनियों को न दिखाएं, लेकिन उससे इनका यथार्थ खारिज नहीं हो जाता है। अभी सभी स्तरों पर इसकी जनतांत्रिक अभिव्यक्तियां देखने को मिल रही है। इसके राजनीतिक परिणाम 2019 में पूरी तरह से सामने आयेंगे।

मोदी का पूरा शासन काल जनता के सभी हिस्सों के लिये भारी सांसत से भरा काल रहा है। मोदी की कही हुई किसी भी बात पर लोगों को कोई यक़ीन नहीं रह गया है। लगातार झूठ बोलने की उनकी फ़ितरत ने ही बालाकोट आदि की तरह के मामलों में भी सरकार के दावों को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। मोदी जब विपक्ष को सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने के लिये लताड़ते हैं, तब उनकी तल्ख़ी ही यह बताने के लिये काफ़ी है कि वे आम लोगों को लताड़ रहे होते हैं। मोदी का तूफ़ानी प्रचार अभियान भाजपा की हालत को और ख़स्ता कर रहा है, क्योंकि उसका सब कुछ बदनाम मोदी के आसरे पर ही टिकता जा रहा है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि जो पेशेवर लोग अभी सर्वेक्षण की रिपोर्टें पेश कर रहे हैं, वे सच नहीं कह रहे हैं, वे सिर्फ मोदी-शाह की चाकरी कर रहे हैं।

बहरहाल, इतना साफ़ है कि विपक्ष के बीच अंत तक जितनी भी एकता बनेगी, भाजपा की पराजय का स्वरूप उसी अनुपात में बड़ा होता जायेगा। मोदी की हार तय हो चुकी है।

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