बाढ़ : एक ऐसा सालाना तमाशा, जिसके दर्शक हजारों में और झेलने वाले लाखों-करोड़ों में

वो पानी में, इनमें पानी नहीं... इतने विशाल पैमाने पर बाढ़ को इतने सारे लोगों के झेलने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज नहीं कराया जा सकता है क्या...

हाइलाइट्स

भूखे-प्यासों का रोना-बिलखना बदस्तूर चलता है क्योंकि उनका दिन चारों ओर लहलहाते पानी को देख दहशत से भरा होता है, पेट में अन्न का दाना नहीं, मां बच्चों को चिपकाए बैठी है कि कहीं वह सरक कर पानी में न चले जाएं, बाप बस ऊपर ही ताके जा रहा है। दिन कट जाता है तो रात पिचाशिनी बन सिर पर तैयार रहती है। पांच दिन पांच रातें या इससे भी ज्यादा समय मौत के पहलू में गुजरता है।

( इतने विशाल पैमाने पर बाढ़ को इतने सारे लोगों के झेलने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज नहीं कराया जा सकता है क्या)

 

वो पानी में, इनमें पानी नहीं

बाढ़नामा......2

राजीव मित्तल

यह एक ऐसा सालाना तमाशा है, जिसके दर्शक हजारों में और झेलने वाले लाखों-करोड़ों में होते हैं। बाढ़ भी नाचती-कूदती थक-थका कर पैर सिकोड़ लेती है, पर तमाशा देखने वालों का मन नहीं भरता। यही वक्त कुछ करने का नहीं बल्कि कर दिखाने का होता है। सो, प्रशासन की गाड़ियां सर्र-सर्र दौड़ती हैं और नेता-मंत्री आकाश में टंगे होते हैं।

भूखे-प्यासों का रोना-बिलखना बदस्तूर चलता है क्योंकि उनका दिन चारों ओर लहलहाते पानी को देख दहशत से भरा होता है, पेट में अन्न का दाना नहीं, मां बच्चों को चिपकाए बैठी है कि कहीं वह सरक कर पानी में न चले जाएं, बाप बस ऊपर ही ताके जा रहा है। दिन कट जाता है तो रात पिचाशिनी बन सिर पर तैयार रहती है। पांच दिन पांच रातें या इससे भी ज्यादा समय मौत के पहलू में गुजरता है।

( इतने विशाल पैमाने पर बाढ़ को इतने सारे लोगों के झेलने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज नहीं कराया जा सकता है क्या)

और प्रशासन का काम उनकी तरफ देख उंगली उठाना है कि मना किया था न, वहां घर बना कर मत रहो अब हमारी जान खा रहे हो कि नहीं! पहले से बचने का इंतजाम नहीं कर सकते थे? साथ में आटा-दाल-आलू लेकर नहीं बैठ सकते थे घर छोड़ कर भागते समय? कम से कम पेट में कुछ तो जाता भले कच्चा ही। अब हम यहां से क्या करें, जब बाढ़ अपना कारोबार समेटेगी, तब हम राहत पहुंचा पाएंगे।

तभी एक आवाज आयी, साहब जी बच्चा बहुत बीमार है एक नाव तो भिजवा दीजिये।

मूरख, नाव कहां से लाएं, सरकार ने नाविकों को पिछले कई बाढ़ बचाव कार्यों का उनका पैसा नहीं दिया है इसलिये सब अपनी नाव सिर पर रख कर भाग गए हैं।

फिर आवाज आयी-तो खाने को ही कुछ भिजवा दीजिये।

देखो भई, ज्यादा परेशान मत करो-राहत शिविर खोल दिये हैं ऊपर वाले ने चाहा तो वहां से भरपेट मिलेगा, लो परची अभी काटे देता हूं, दिखा कर गैस का सिलेंडर, शक्तिभोग आटा, लालकिला बासमती चावल, टाटा टी, शुगर क्यूब और ब्रिटेनिया का क्रीम का बिस्कुट फ्री मिलेगा।

चलो ड्राइवर अब गाड़ी भगाओ, कहीं मत रोकना, मंत्री जी पहुंचने ही वाले होंगे, उन्हें दूसरी जगह बाढ़ दिखानी है। कार में बैठते ही सेल फोन के कुछ बटन दबा कर कान से लगाया-हलो, सारा इंतजाम कर दिया है न! थर्मस में चाय, चार-पांच पैप्सी की बोतलें और हल्दीराम का नमकीन रखवा देना। मैं बस पहुंच ही रहा हूं।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।