खराब प्रशासन और लापरवाही की वजह से बाढ़

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बाढ़ की समस्या गहराई है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने अपने एक अध्ययन में यह बताया है कि चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु में जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश बढ़ी है....

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

हर शहर में ये नष्ट हो गए हैं. ये जहां थें, वहां इमारतें बन गई हैं. चेन्नई में नवंबर, 2015 में बाढ़ आई थी. लेकिन यहां का हवाई अड्डा उसी जमीन पर बना है जहां बाढ़ का पानी जमा होता था. बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र में ही एक बस अड्डा बना है. बेंगलुरु को पीने का पानी देने वाले और अधिक बारिश होने पर पानी को खुद में समा लेने वाले तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं. मुंबई में भी मैंग्रोव नष्ट करके रिहाइशी इमारतें बन गई हैं. वहीं मुंबई के सॉल्प पैन्स का इस्तेमाल सस्ते घर बनाने के लिए किया जा रहा है. इन पर बाढ़ की आशंका बनी रहेगी.

बाढ़ और भ्रम

खराब प्रशासन और लापरवाही की वजह से भारतीय शहरों को बाढ़ से जूझना पड़ना रहा है

भारतीय शहरों को भारी बारिश की वजह से बाढ़ नहीं झेलना पड़ रहा. ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्योंकि सालों से प्रशासन खस्ता हाल है और शहरी नियोजन की स्थिति बुरी है. 29 अगस्त को 12 घंटे के अंदर मुंबई में 300 मिलीमीटर बारिश हुई. यह असामान्य है. लेकिन शहर सिर्फ वजह से नहीं थमा बल्कि खराब प्रशासन और शहर का प्रबंधन संभालने वालों की वर्षों की लापरवाही से ऐसा हुआ. 26 जुलाई, 2005 को इससे तीन गुना बारिश हुई थी. कई लोगों की जान गई थी. संपत्तियों का नुकसान हुआ था. फिर भी कोई सबक नहीं लिया गया.

मुंबई कोई अकेला शहर नहीं है जिसने इस साल सामान्य से अधिक बारिश देखा. 26 और 27 जुलाई का अहमदाबाद में सामान्य से 11 गुना अधिक बारिश हुई. 21 अगस्त को चंडीगढ़ में सामान्य से 23 गुना अधिक बारिश हुई. 15 अगस्त को बेंगलुरु में सामान्य से 37 गुना अधिक बारिश हुई. मुंबई में पानी नहीं निकलने की समस्या लंबे समय से बनी हुई है.

इन सभी शहरों की कहानी एक जैसी ही है. प्रशासन को जो करना चाहिए, वह हुआ नहीं. अधिक पानी की निकासी की कोई कारगर व्यवस्था नहीं खड़ी हो पाई. अधिक पानी की समस्या से निपटने वाले प्राकृतिक माध्यम जैसे तालाब, टैंक, मैंग्रोव आदि बचे नहीं.

हर शहर में ये नष्ट हो गए हैं. ये जहां थें, वहां इमारतें बन गई हैं. चेन्नई में नवंबर, 2015 में बाढ़ आई थी. लेकिन यहां का हवाई अड्डा उसी जमीन पर बना है जहां बाढ़ का पानी जमा होता था. बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र में ही एक बस अड्डा बना है. बेंगलुरु को पीने का पानी देने वाले और अधिक बारिश होने पर पानी को खुद में समा लेने वाले तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं. मुंबई में भी मैंग्रोव नष्ट करके रिहाइशी इमारतें बन गई हैं. वहीं मुंबई के सॉल्प पैन्स का इस्तेमाल सस्ते घर बनाने के लिए किया जा रहा है. इन पर बाढ़ की आशंका बनी रहेगी.

अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आप अगर शहर को पाटते जाएंगे और पानी निकलने का रास्त नहीं छोड़ेंगे तो बाढ़ तो आएगी ही. इसमें बारिश का कोई कसूर नहीं है. हर शहर में यह दिख रहा है राजनीतिक संरक्षण के साथ काम कर रहे बिल्डरों के फायदे के हिसाब शहरों के विकास की योजना बन रही है. भारत में समस्या संसाधनों की कमी नहीं बल्कि प्राथमिकता की है. मुंबई में पानी निकासी को ठीक करने की योजना 1980 के दशक में बनी. इसका क्रियान्वयन कुछ साल बाद शुरू हुआ लेकिन अब तक यह ठीक नहीं हुआ. लेकिन इसके बावजूद लगातार पैसे खर्च किए जा रहे हैं कुछ खास और अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों की जिंदगी बेहतर करने के लिए. इसमें अधिकांश लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सार्वजनिक परिवहन को ठीक करने के बजाए निजी सड़कों का निर्माण शामिल है. यह सब तक अधिक दिखने लगता है कि बाढ़ जैसी समस्याओं से सबसे अधिक गरीब लोग ही प्रभावित होते हैं. गरीब लोग उन निचली जगहों पर रहते हैं जहां बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है. उन्हें तो बाढ़ का सामना आम बारिश वाले दिनों में भी करना पड़ता है.

इसके अतिरिक्त कुछ अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बाढ़ की समस्या गहराई है. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने अपने एक अध्ययन में यह बताया है कि चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु में जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश बढ़ी है. समुद्र तटों पर बसे शहरों पर अधिक खतरा है. क्योंकि सुनामी जैसी स्थिति यहां कहर बरपा सकती है.

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि शहरों को जलावयु परिवर्तन का असर कम करने के लिए जरूरी काम करने होंगे. इसमें जमीन के इस्तेमाल की नीति की समीक्षा, भवन निर्माण के स्पष्ट नियम, मैंग्रोव का बचाव और पर्याप्त खाली जगह छोड़ना शामिल है. यह कोई पर्यावरणीय सिद्धांत नहीं बल्कि सामान्य बुद्धि है जो उन लोगों में नहीं दिख रही जो शहरों का प्रशासन चला रहे हैं. इस सोच के साथ बन रही योजनाओं की कीमत चुका रहे आम लोगों के लिए आगे की राह यही है कि वे सुरक्षित और टिकाउ शहरी वातावरण के अपने अधिकार की मांग को और मजबूती से उठाएं.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय

(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः 35, 2 सितंबर, 2017

 

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