नया इक रिश्ता पैदा क्यूं करें हम, बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम

बेशक अपनी जीत पर भाजपा जश्न मनाए, लेकिन याद रखे कि… मैं ये मानता हूं मेरे दिए, तिरी आंधियों ने बुझा दिए मगर एक जुगनू हवाओं में, अभी रौशनी का इमाम है ...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

नया इक रिश्ता पैदा क्यूं करें हम, बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूं करें हम

ख़ामोशी से अदा हो रस्मे-दूरी, कोई हंगामा बरपा क्यूं करें हम

ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं, वफ़ादारी का दावा क्यूं करें हम

महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनावों और ओडिशा में पंचायत चुनावों के नतीजों से भाजपा अतिउत्साहित है।

यूं तो महाराष्ट्र में अभी भाजपा की ही सत्ता है, लेकिन शिवसेना के आगे छोटे भाई की भूमिका निभाना अब उसे रास नहीं आता। विशेषकर केंद्र की सत्ता में आने के बाद राज्य में उसके तेवर बदल गए।

उधर शिवसेना को भी यह कतई मंज़ूर नहीं कि मराठी मानुस उसकी जगह किसी और को अपना नेता माने।

बीते कुछ महीनों से भाजपा-शिवसेना के बीच की कड़वाहट खुलकर ज़ाहिर हो रही थी। नगरीय निकाय चुनावों में सीटों के बंटवारे पर भी इसका असर पड़ा। लेकिन अब चुनावी नतीजे आने के बाद समीकरण बदल रहे हैं।

महाराष्ट्र निकाय चुनावों में बीजेपी ने जीत का परचम लहरा दिया है।

शिवसेना हालांकि, बड़ी पार्टी है लेकिन बीजेपी भी पीछे नहीं है, बल्कि उसकी जीत ज़्यादा तगड़ी इसलिए है कि वृहन्नमुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी में 31 से बढ़कर उसकी सीटें 82 हो गई हैं।

पहले चंडीगढ़, गुजरात फिर ओडिशा और अब महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में जीत से गदगद बीजेपी इसे देश के अन्य हिस्सों में भी भुनाने की तैयारी में है। बीजेपी के नेता इसे नोटबंदी के कड़े फ़ैसले को जनता का समर्थन बता रहे हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति लंबे समय से कांग्रेस-एनसीपी के गठजोड़ बनाम शिवसेना-बीजेपी के बीच मुकाबले की गवाह रही है। लेकिन अब स्थिति एकदम बदल गई है। शिवसेना बीजेपी साथ होते हुए भी अब अलग हैं।

शिवसेना बड़े भाई की भूमिका से बाहर निकलने तैयार नहीं है, जबकि आम चुनाव, विधानसभा चुनाव और अब नगरीय निकाय में भी उसे भाजपा के आगे पस्त होना पड़ा है।

शिवसेना और भाजपा क्या अब अपनी भूमिकाओं को बदलकर साथ आएंगे या अलग राहें पकड़ेंगे

हिंदुत्व का एजेंडा दोनों का एक जैसा है, आर्थिक नीतियां भी एक ही हैं, फिर विरोध क्या केवल सत्ता का है?

वहीँ दूसरी ओर भाजपा इन चुनाव परिणामों को विधानसभा चुनावों में भुनाने में लगी है

पिछली बीएमसी चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली मनसे इस बार के चुनाव में 7 सीटों पर सिमट गई। इतना ही नहीं 2009 के विधानसभा चुनाव में 288 में से 13 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली मनसे 2014 के चुनाव में एक सीट पर सिमट गई और 203 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी।

दरअसल मुंबई में बाहर से रोज़ी-रोटी के लिए आए लोगों के खिलाफ़ रणनीति ही मनसे का यूएसपी रहा। लेकिन ऐसी हार क्या इस बात का संकेत है कि निगेटिव पॉलिटिक्स लोगों के बीच अपनी जगह नहीं बना सकती?

इस बीएमसी चुनाव में कांग्रेस का लगभग सफ़ाया हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद से ये सिलसिला जारी है।

बीएमसी में पिछली बार के 52 सीटों के मुकाबले इस बार 31 पर आ गई है। इस नतीजे को लेकर कांग्रेस में घमासान और बढ़ गया है।

नारायण राणे ने मुंबई कांग्रेस चीफ़ संजय निरुपम के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया तो हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए निरुपम ने इस्तीफ़ा तो दिया लेकिन हार के लिए सीनियर नेताओं के भितरघात को ज़िम्मेदार बता दिया।

महाराष्ट्र में मिली करारी हार से कांग्रेस के भीतर चल रही रस्साकशी ज़ाहिर हो गई है।

यह अजीब बात है कि एक ओर कांग्रेस राहुल गांधी की अगुवाई में भाजपा विरोधी गठबंधन कर रही है, दूसरी ओर पार्टी के भीतर जारी गुटीय टकराव को रोक पाने में हर स्तर पर विफल दिखाई दे रही है। मुंबई की कांग्रेस निरुपम, कामत, नारायण राणे और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण के चार गुटों में बुरी तरह विभाजित हो कर बुरी तरह हार का शिकार हुई है। लेकिन कांग्रेस पार्टी इस तथ्य को समझ पाने में विफल हो रही है कि बीजेपी व अन्य क्षेत्रीय दलों की ताकत बढऩे का सबसे बड़ा कारण इन दलों में क्षेत्रीय नेताओं का वजूद है।

एक वक्त था, जब इंदिरा गांधी ने एक सिरे से कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं को कमज़ोर कर अपना आधिपत्य स्थापित किया था, लेकिन तब अन्य दल कांग्रेस को तगड़ी चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे।

दरअसल कांग्रेस के भीतर क्षेत्रीय नेतृत्व के नाम पर चापलूस नेताओं की लंबी कतार लग गई है, ये कमज़ोर नेता पार्टी को मज़बूत करने की बजाय गुटीय संघर्ष में उलझे हैं, जिसका घातक परिणाम मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, उत्तरप्रदेश हर जगह देखने मिला है।

कांग्रेस और राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य अब उत्तरप्रदेश चुनाव के बाद तय होगा। फिलहाल मुंबई पर नज़रें रहेंगी कि वहां भाजपा-शिवसेना किन शर्तों के साथ एक होते हैं, और इनका आपसी तालमेल कैसा होगा।

याद रहे कि हाल ही में शिवसेना ने गुजरात में बीजेपी के विरोधी हार्दिक पटेल को अपना चेहरा बनाया है। विरोध और समर्थन का खेल एक साथ कैसे चलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

फिलहाल उत्तरप्रदेश चुनावों के मद्देनजर भाजपा महाराष्ट्र की जीत से खूब उत्साहित है और 25 फरवरी को विजय दिवस मनाएगी। प्रधानमंत्री ने इस जीत पर कहा कि दिल्ली के एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर राजनीति पर चर्चा करने वालों को अंदाज़ा नहीं होगा कि देश में कैसी आंधी चल रही है। भगवान शिव की तरह देश के लोगों में एक तीसरा नेत्र होता है। वे तीसरे नेत्र से भली-भांति भांप लेते हैं कि सही क्या है, गलत क्या है।

बेशक अपनी जीत पर भाजपा जश्न मनाए, लेकिन याद रखे कि…

मैं ये मानता हूं मेरे दिए, तिरी आंधियों ने बुझा दिए

मगर एक जुगनू हवाओं में, अभी रौशनी का इमाम है

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