आपने सुना मी लॉर्ड ! दलित मित्र योगी के राज में पुलिस की दबंगई से दहशत में है गोरखपुर की दलित बस्ती

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्म भूमि गोरखपुर में पुलिस के अत्याचार से दलितों की एक बस्ती में भयानक भय और अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है। ...

Vidya Bhushan Rawat

विद्या भूषण रावत

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्म भूमि गोरखपुर में पुलिस के अत्याचार से दलितों की एक बस्ती में भयानक भय और अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है। गाँव के दलित ये आरोप लगा रहे है कि पुलिस ने गाँव के पूर्व प्रधान के साथ मिलकर गाँव समाज की जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश करने वाले दबंग के प्रयासों के खिलाफ खड़े हुए ग्रामीणों पर जमकर अत्याचार किया और जब लोगों ने प्रतिरोध किया तो फायरिंग की जिसमें चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी गाँव में पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियां लगातार दहशत पैदा कर रही हैं।

घटना की पृष्ठभूमि

गोरखपुर जिले के गगहा थाना अंतर्गत अस्थौला गाँव में गाँव समाज की जमीन पर अवैध कब्जे के प्रयास का विरोध करने पर ये घटना घटी। गाँव की दलित बस्ती में लगभग तीन सौ परिवार रहते हैं और बस्ती के सामने गाँव समाज की जमीन है, जिस पर कब्जे के उद्देश्य से ही एक प्रभावशाली व्यक्ति ने वहाँ पक्की दीवार खड़ी करने की कोशिश की तो गाँव वालों ने उसका विरोध किया। थोड़ी ही देर में वीरेंद्र चंद जो मुख्य आरोपित हैं, अपने और भाइयो रंणधीरचंद और गुड्डू चंद के साथ वहाँ आ धमका और उसने गाँव वालों को बहुत धमकाया।

ये घटनाक्रम 14 मई का है। वीरेंद्र और अन्य लोगों ने मामला थाने पहुँचा दिया जहाँ से फरमान आया कि सभी लोग सुबह 10 बजे तक वहाँ पहुँचे। 15 मई 2018 को गाँव के प्रमुख लोग बातचीत के लिए थाने पहुँचे जहाँ ये बताया जा रहा है कि आरोपित वीरेंदर थानेदार सुनील कुमार सिंह के बगल में ही बैठा था। इससे पहले कि कोई बातचीत होती वीरेंदर ने वहाँ आए लोगों को पुलिस की लाठी से मारना शुरू किया। उसके बाद पिटाई में दरोगा और अन्य पुलिस वाले भी शामिल हो गए।

थाने में बातचीत के नाम पर बुलाए गए लोगों की बेरहमी से पिटाई से माहौल बदल गया और 20-25 लोगों में से एक दो साथी चुप चाप थाने से खिसक लिए ताकि गाँव वालों को पूरी बात बताई जा सके। गाँव वापस आने पर लोगों में इस बात को सुनकर बहुत गुस्सा हुआ और वे थाने की ओर चल दिए। गाँव से करीब डेढ़ दो किलोमीटर दूर स्थित थाने की ओर आती भीड़ से पुलिस की हालत ख़राब हुई। बिना किसी चेतावनी के पुलिस ने भीड़ पर फायरिंग कर दी जिसमें चार लोगों के घायल होने की खबर है।

घायल होने वालों में श्री जित्तू प्रसाद, उम्र 65 वर्ष को पैर में गोली लगी है, 18 वर्षीय भोलू को कंधे और पैर में गोली लगी है, दीपक 12 वर्ष को पैर में गोली लगी है। राहुल नमक युवक भी लाठियों की मार से घायल हुआ है। सभी घायलों को गोरखपुर मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया है।

घटनाक्रम के बाद से पुलिस गाँव वालों को परेशान कर रही है और उनके साथ मार पिटाई कर रही है। ऐसा बताया जा रहा है के लगभग 30-40 लोगों को गिरफ्रतार किया गया है।

गोरखपुर स्थित बहुजन समाज पार्टी के जिलाअध्यक्ष श्री घनश्याम राही के नेतृत्व में एक तीन सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल ने पुलिस के आला अधिकारियो से बात की और इस सन्दर्भ में कार्यवाही की बात की है। इस प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य और बांसगांव विधान सभा के प्रभारी श्री श्रवण कुमार निराला ने फोन पर मुझे बताया कि क्षेत्र के दलितों में बहुत आक्रोश है क्योंकि गगहा थाने के इंचार्ज सुनील सिंह भी दबंगों से मिले हुए हैं और अभी तक दलितों की और से कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं कर रहे हैं। प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है।

कुछ ज्वलंत प्रश्न

गाँव समाज की जमीनों पर अधिकांशतः दबंगों का कब्ज़ा है। दबंगों से अभिप्राय गाँव की ताकतवार जातियों से है, जिसमें ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार आदि प्रमुख हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले एक वर्ष के योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ठाकुरों में मौजूद दबंग और राजनैतिक तौर पर प्रभावशाली लोगों ने गाँवों में अपनी दबंगई दिखाना शुरू की है और इसमें उन्हें प्रशासन का पूर्ण सहयोग है। आखिर एक गाँव के खलिहान पर कब्ज़ा करने का प्रयास करने वाले को पुलिस अपनी बगल में बैठकर बाकी गाँव वालों को उसके साथ मिलकर पीटे तो ये उत्तर प्रदेश के प्रशासन की जातिवादी चरित्र की पोल खोलता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि गाँव की भीड़ को नियंत्रण करने के लिए पुलिस ने सीधे गोलाबारी क्यों की। क्या गाँव वालों से बातचीत नहीं हो सकती थी। क्या पुलिस को लगता है दलित बस्ती में सारे गुंडे बैठे हैं।

जब लोगों को थाने बुलाया गया था मारपीट क्यों की गयी। क्या बातचीत से मामला नहीं सुलझ सकता था। अगर पुलिस को इस बात का पता है कि गाँव समाज की जमीन का मसला है तो क्या पुलिस राजस्व विभाग के अधिकारियों को बुलाकर मामले को सुलझाने का पर्यास नहीं कर सकती थी।

क्या गाँव समाज की जमीनों पर कब्ज़ा राजस्व विभाग के लोगों की जानकारी के बिना संभव है ?

क्या सरकार कार्यवाही करेगी

इस घटना के कई पहलू निकलते हैं। पहले ये कि वीरेंद्र चन्द्र द्वारा दलितों को धमकाने और गाँव समाज की जमीन पर अवैध कब्जे का प्रयास। क्या सरकार वीरेंदर और उसके अन्य साथियो के खिलाफ कार्यवाही करेगी ? अगर सुप्रीम कोर्ट की मानें तो थानेदार की प्राथमिक जांच का बाद ही सच्चाई सामने आएगी कि घटना घटी या नहीं, लेकिन यदि थानेदार स्वयं ही अपराधियों के साथ बैठे हो तो क्या उम्मीद करें। इसलिए जरूरी है कि पुलिस के आला अधिकारी इस घटना को गंभीरता से लें और पुलिस को दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों में मामले में सवेंदनशील बनाएं। ये काम राजनैतिक नेतृत्व तो नहीं करेगा क्योंकि ऐसे लोगों को अगर शह नहीं होती तो ऐसी घटना नहीं होती।

दूसरे क्या पुलिस की लापरवाही पर सरकार कोई कार्यवाही करेगी ? क्या घटना इतनी बड़ी थी कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी?

तीसरे, क्या राजस्व विभाग को इस बात की जानकारी थी कि गाँव के खलिहान पर दबंग कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे हैं?

क्या पुलिस की गोली से घायल लोगों के इलाज का खर्चा प्रशासन को नहीं वहन करना चाहिए? आखिर लोग अपनी वाजिब मांगों के लिए आन्दोलन कर रहे थे और थाने पर केवल पुलिस के रवैये के कारण गए थे, जब उनके साथियो को मारा पीटा जा रहा था।

गाँव समाज की जमीन पर से दबंगों का कब्ज़ा हटाने की मुहीम चलाई जाए

जैसे हर मामले में हो रहा है कि दबंग आराम से घूम रहे हैं और अपनी बात को उठाने वालों पर कार्यवाही हो रही है, क्योंकि जिन गुंडों ने दलितों की बस्ती को धमकाया वो तो आराम से हैं और जिन दलितों ने कानूनी तौर पर थाने पर अपनी बात रखी वे जेल में हैं। क्या ये सहारनपुर मॉडल नहीं है कि दलितों के घर जलाने वाले आराम से हैं और उस पर अपना विरोध जताने वाले रासुका में।

उत्तर प्रदेश में प्रशासन अगर बिरादरीवाद से हट कर कार्य कर सके तो लोगों का भरोसा उस पर होगा और सभी समुदायों में भाई चारा होगा लेकिन यदि राजनैतिक नेतृत्व ऐसे तत्वों को बढ़ावा देता है जिसकी योग्यता मात्र उसकी जाति है तो ये बहुत खतरनाक होगा और प्रदेश में हमेशा अव्यवस्था बनी रहेगी। गाँव समाज के संसाधन गाँव की सामूहिक सम्पति हैं और उस पर जनता का हक़ है। तालाब, पोखरी, चारागाह, जंगल, खलिहान सार्वजानिक सम्पति हैं और उस पर किसी भी प्रकार के कब्जे की कोशिश को प्रशासन हटाए। यदि वहाँ कोई भूमिहीन अस्थाई तौर पर रह रहे हों तो उन्हें रहने हेतु जमीन का आवंटन होना चाहिए।

सरकार को चाहिए कि गाँव समाज की जमीनों का सर्वे कराकर पता करे कि उनकी वास्तविक स्थिति क्या है और उस पर से दबंगों और राजनीतिक पहुँच वाले लोगों के कब्जे से उनको मुक्त कराया जाए। लेकिन कब्ज़ा हटाओ मुहीम के नाम पर भूमिहीन दलितों को परेशान करने के प्रयासों से भी सावधान होना पड़ेगा क्योंकि दबंगों की एक बहुत बड़ी ताकत हर आन्दोलन को नकारात्मक तरीके से इस्तेमाल कर गरीब लोगों को ही परेशान करती है।

फिलहाल जनता गोरखपुर में दलितों पर हुए इस पुलिसिया और सामंती जुर्म पर उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यवाही का इंतज़ार कर रही है।

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