गोरखपुर : संघ के गले की हड्डी बना सामाजिक न्याय

योगी आदित्यनाथ के करीब 15 साल के काल में उनके संसद में दिए भाषणों को सुनें तो उनकी प्राथमिकता पर आईएसआई, हिंदू मुस्लिम विवाद अहम रहता था। यहां तक कि वह अपने मसले को लेकर संसद में रोए भी। ...

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हाइलाइट्स

... और अब सामाजिक न्याय नाम की हड्डी भाजपा के गले में अटक चुकी है। दो उपचुनाव जीतने के बाद सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिसकी आबादी सबसे ज्यादा है, उसे संघी लोग कीड़ा मकोड़ा समझते हैं। सपा-बसपा के लोगों को सांप छछूंदर बोला। यादव ने आज घोषणा की कि सामाजिक न्याय विकास में बाधक नहीं है, विकास एजेंडा में रहेगा, लेकिन यह सामाजिक न्याय के साथ होगा।

सत्येन्द्र पीएस

गोरखपुर का मठ धराशायी हो गया। इसकी मठाधीशी 1989 के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संभाल रही थी। यह भारत की राजनीति की बड़ी परिघटना है, जो राजनीति की दिशा तय करने में अहम हो सकती है। ऐसे में इस जीत को लेकर कयास लगाया जाना स्वाभाविक है।

1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। 1991 में पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। 1996 में 13 दिन की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद हरदनहल्ली डोड्डागौड़ा देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। 1998 में आम चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और 2009 में कांग्रेस के कामयाब होने पर फिर से सरदार को भारत का सरदार बनने का मौका मिला। 2014 में कांग्रेस के पिटने के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।

लेकिन गोरखपुर में 1989 सिर्फ और सिर्फ भाजपा, हिंदू महासभा का कब्जा रहा। कोई असर नहीं पड़ा कि जनता दल सरकार बना रही है, कांग्रेस सरकार बना रही है या संयुक्त मोर्चे की सरकार है। पहले लगातार महंत अवैद्यनाथ चुनाव जीतते रहे और 1998 के बाद से योगी आदित्यनाथ चुनाव जीतने लगे। अवैद्यनाथ के निधन के बाद योगी आदित्यनाथ महंत बन गए और 2017 में भाजपा की यूपी में जीत के बाद आदित्यनाथ मुख्यमंत्री भी हो गए।
इसके पहले भी गोरखपुर आरएसएस और दक्षिणपंथियों के हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है। गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा और घोड़ा मय सवार चुनाव चिह्न पर 1967 में सांसद बने थे और बाद में 1970-71 में महंत अवैद्यनाथ सांसद बने। उसके बाद कांग्रेस, भारतीय लोक दल के सांसद हुए। 1989 में मंदिर की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा फिर जागी। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनता दल बनाई तो गठजोड़ में गोरखपुर की सीट जनता दल के खाते में गई और महंत अवैद्यनाथ ने हिंदू महासभा से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। उसके बाद जितने भी लोकसभा चुनाव हुए, मंदिर के महंत भाजपा से चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे।

इसके अलावा गोरखपुर पर गीता प्रेस का भी असर है। वहां से ढेरों धार्मिक पुस्तकें छपती हैं। रामचरित मानस के अलावा तमाम धार्मिक पुस्तकें हैं जो गीता प्रेस छापता है। अत्यंत सस्ती या कहें कि बिल्कुल मुफ्त होने के कारण उन किताबों की पहुंच स्थानीय लोगों तक आसानी से हो जाती है और उससे धार्मिक भावनाएं भी भरपूर पैदा होती हैं।

गीता प्रेस और गोरखनाथ मठ के मठाधीशों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा ने गोरखपुर को हिंदुत्व का अखाड़ा बना दिया और उसका परिणाम यह हुआ कि 1989 से लेकर 2018 के उपचुनाव तक लगातार गोरखपुर संसदीय सीट पर मठ पर कब्जा बना रहा।

फिर आखिर ऐसा क्या बदलाव हो गया, जिसकी वजह से भाजपा का यह मठ ऐसे समय में उजड़ गया, जब यहां के मठाधीश ही राज्य के मुख्यमंत्री हैं? तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। आदित्यनाथ का कैंडीडेट न होना, आदित्यनाथ को कमजोर करने के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कैंडीडेट को हरा दिया जाना, सपा-बसपा गठबंधन आदि आदि। तमाम तर्क हैं, तर्कों की अपनी अपनी व्याख्याएं हैं। यह भी एक तर्क है कि ईवीएम छेड़छाड़ न कर भाजपा सरकार ने उपचुनाव जीत जाने दिया, जिससे कि लोकसभा चुनाव में आसानी से धांधली की जा सके। यह सब तर्क हैं और तर्कों के पक्ष में तमाम तर्क-वितर्क हैं।

गोरखपुर ब्राह्मण बनाम ठाकुर का गढ़ रहा है। पहले भी कभी ठाकुर और कभी ब्राह्मण जीतते रहे हैं। कांग्रेस बारी बारी से ब्राह्मण और ठाकुर कैंडीडेट ट्राई करती रही थी। गोरखनाथ मंदिर ने जब ठाकुरवाद के साथ हिंदुत्व का काक्टेल किया तो उन्होंने अजेय बढ़त बना ली। कई बार मनोज तिवारी से लेकर हरिशंकर तिवारी तक को आजमाने की कोशिश की गई, लेकिन कभी भी सफलता नहीं मिली। इस बीच समाजवादी पार्टी ने पिछड़े वर्ग के निषाद प्रत्याशियों पर दांव खेले। बसपा ने पिछड़े वर्ग के सैथवार प्रत्याशी केदारनाथ सिंह पर दांव खेला, लेकिन कुल मिलाकर असफलता ही हाथ लगी। ठाकुरवाद और हिंदुत्व के कॉक्टेल की तोड़ कोई नहीं तोड़ सका।

इस बीच गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में भी ठाकुर बनाम ब्राह्मण चलता रहा। छात्र संघ चुनाव में कोई प्रत्याशी पंडी जी का होता था और कोई बाऊ साहेब का। और अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह आधे वोटर इधर और आधे उधर बंट जाते थे। करीब सभी पदों पर ब्राह्मण और ठाकुर प्रत्याशी जीत जाते।

पहली बार इस समीकरण को उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी के रूप में मौजूदा बसपा नेता विश्वजीत सिंह ने तोड़ा था और वह विश्वविद्यालय उपाध्यक्ष बनने में सफल रहे थे। हालांकि उसके बाद कुछ वर्षों तक चुनाव नहीं हुआ और कभी हुआ भी तो छात्र फिर से आधे इधर और आधे उधर में बंटते रहे।

2014 की नरेंद्र मोदी सरकार गोरखपुर की छात्र राजनीति में टर्निंग प्वाइंट था, जब पिछड़े और दलित वर्ग के कुछ बच्चे समझने लगे कि यह खेल गड़बड़ है। इतना ही नहीं, आंकड़े भी आने लगे कि 1989 के बाद संसद और राज्य विधानसभाओं में पिछड़े वर्ग के सांसदों और विधायकों के चुनाव में लगातार बढ़ रही थी, लेकिन भाजपा के पूर्ण बहुमत आने के साथ ही उल्टी गंगा बहने लगी। 2014 में संसद में पिछड़े वर्ग के सांसदों की संख्या 1989 के बाद सबसे कम हो गई। गोरखपुर के कुछ छात्र इसे लेकर न सिर्फ चिंतित हुए बल्कि उन्होंने संगठित होने का काम भी शुरू कर दिया।

दर्शन शास्त्र के छात्र रहे हितेश सिंह ने यह पहल की। उन्होंने न सिर्फ गोरखपुर विश्वविद्यालयों के छात्रों की जातीय स्थिति और उनकी सोच को देखा, बल्कि उन्होंने बताना शुरू किया कि अगर कोशिश की जाए तो चुनाव जीता भी जा सकता है। शुरुआत हुई फूलन देवी की जयंती मनाने से। गोरखपुर के आसपास निषाद बड़ी संख्या में हैं और ओबीसी आरक्षण के बाद विश्वविद्यालय में भी ठीक ठाक संख्या में पहुंचते हैं। उसके बाद शाहू जी जयंती, अंबेडकर जयंती, फुले जयंती के माध्यम से दलितों पिछड़ों की एका बनाने की कवायद विश्वविद्यालय में हुई। मुस्लिम छात्रों को जोड़ने की भी कवायद हुई, जो 1991 में हुए दंगों के बाद से अलग कट चुके थे। गोरखपुर में स्थिति यह हुई थी कि 1991 के बाद से जो भी हिंदू मुस्लिम मिक्स कॉलोनियां थीं, वहां अगर मुस्लिम कम हैं तो उन्होंने घर और जमीन बेचकर मुस्लिम बहुल इलाके में अपना आशियाना बसा लिया और जिन इलाकों में हिंदू कम संख्या में थे, उन्होंने अपने मकान बेचकर हिंदू बहुल इलाके में घर खरीद लिए। ऐसे में हिंदू मुस्लिम पूरी तरह से अलग अलग टापू पर बस चुके हैं। इन अलग टापू पर बसे विद्यार्थियों को भी दलित पिछड़े छात्रों ने जोड़ना शुरू किया।

इसका परिणाम भी आया। सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय चुनाव आते आते अपने प्रत्याशी उतार दिए। प्रत्याशी उतारे जाने तक किसी को कोई भान नहीं था कि गोरखपुर की राजनीति किस तरह बदल रही है। वजह यह थी कि न तो इसका कोई औपचारिक नाम था, न कोई गठजोड़, न कोई पार्टी कार्यालय, न किसी का वरदहस्त। बस इतना ही था कि विद्यार्थी उदा देवी पासी, फूलन देवी, सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले, भीम राव अंबेडकर, शाहू जी महराज की जयंती मनाते। उन्हें याद करते। उन पर चर्चा करते और सामाजिक न्याय के सपने देखते। लेकिन 2016 के चुनाव में सामाजिक न्याय अघोषित प्रत्याशी अरविंद कुमार उर्भ अमन यादव अध्यक्ष पद पर विजयी रहे। मंत्री पद पर पवन कुमार अपने एक हमनाम पवन कुमार पांडेय के चलते बहुत मामूली मत से हारे। मंत्री पद पर स्वतंत्र उम्मीदवार ऋचा चौधरी जीतने में कामयाब रहीं।  वहीं पुस्तकालय मंत्री के पद पर आमिर खान जीत गए। उपाध्यक्ष पद के लिए सामाजिक न्याय वालों ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था, जिसका फायदा सपा छात्र सभा के अमित यादव को मिला और वह एक स्वतंत्र प्रत्याशी अखिल देव त्रिपाठी से महज 20 मतों से हार गए। गोरखपुर की छात्र राजनीति के इतिहास में पहली बार अध्यक्ष और मंत्री पद पर पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी जीतने में कामयाब हुए। पिछड़े वर्ग के सैंथवार जाति से ताल्लुक रखने वाले हितेश सिंह को साथ मिला अनुसूचित जाति में चमार जाति के युवा नेता धीरेंद्र प्रताप का। धीरेंद्र प्रताप बहुजन राजनीति करते हैं। अच्छे बॉडी बिल्डर हैं। अन्य विद्यार्थियों को शारीरिक शैष्ठव में निपुण बनाते हैं। साथ ही बुद्धलैंड की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बुद्धलैंड राज्य निर्माण आंदोलन समिति बना रखी है।

चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशियों का बहुत बुरा हाल हुआ। भारतीय जनता पार्टी भले ही विधानसभा चुनाव जीत गई, लेकिन शहर से लेकर गांव तक लोगों को यह सताने लगा कि विश्वविद्यालय से निकले विद्यार्थी गोरखपुर की ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीति और मठ व हिंदुत्व के कॉक्टेल से अलग संकेत दे रहे हैं।

2017 में जब सामाजिक न्याय के ग्रुप ने गोरखपुर में आक्रामक तरीके से प्रचार शुरू किया तो चुनाव स्थगित करने के माहौल बनाए जाने लगे। विद्यार्थियों का आंदोलन अद्भुत एका पैदा कर रहा था। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा खुद गोरखपुर आए। उन्होंने कुछ मानकों का हवाला देकर चुनाव कराने से ही इनकार कर दिया।     

विद्यार्थियों को तो गोरखपुर में चुनाव नहीं लड़ने दिया गया, लेकिन भाजपा पर इसका खौफ भरपूर हुआ। छात्रों ने राजनीतिक स्तर पर संगठन और तेज किया। पहले सपा में रहे काली शंकर यादव ने अपने नाम के सामने काली शंकर ओबीसी लगा दिया। हितेश सिंह की कवायद के बाद गोरखपुर में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले त्रिशक्ति सम्मेलन हुआ, जिसमें ओबीसी से जुड़ी तमाम जातियों ने हिस्सा लिया और कहा कि जो भी दल हमारी भागीदारी बढ़ाने की मांग करेगा, हम उसे समर्थन करेंगे।

इस बीच गोरखपुर से सपा ने निषाद पार्टी से गठजोड़ कर प्रवीण कुमार निषाद को सपा प्रत्याशी घोषित कर दिया। उसके दूसरे दिन काली शंकर ने प्रेस कान्फ्रेंस कर प्रवीण कुमार को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके अलावा चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल ने भी सपा के प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा कर दी। भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले सैंथवार जाति के गंगा सिंह सैंथवार ने प्रवीण कुमार के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता करके समर्थन की घोषणा की, जो लोकदल के पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख हैं। इसके अलावा बसपा अध्यय मायावती की ओर से हरी झंडी मिलते ही बसपा के कार्यकर्ता भी समर्थन में आ गए। गोरखपुर में बसपा के नेता शिवांग सिंह बताते हैं कि बहन जी की घोषणा के बाद ही हम लोग सड़कों पर आ गए और सपा के प्रत्याशी का प्रचार करना शुरू कर दिया गया।

डॉ हितेश सिंह कहते हैं कि विद्यार्थियों का जागरूक होना बहुत मायने रखता है। महज 4 साल में दलित पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों में गांव गांव में यह अलख जगा दी कि मठ के महंत आदित्यनाथ के सांसद रहने से गोरखपुर रसातल में जा रहा है।

हितेश कहते हैं,

“अगर योगी आदित्यनाथ के करीब 15 साल के काल में उनके संसद में दिए भाषणों को सुनें तो उनकी प्राथमिकता पर आईएसआई, हिंदू मुस्लिम विवाद अहम रहता था। यहां तक कि वह अपने मसले को लेकर संसद में रोए भी। वहीं गोरखपुर में पिछले 30 साल से औसतन हर साल 700 बच्चे दिमागी बुखार से मर जाते हैं, गोरखपुर रेलवे मुख्यालय कई भागों में विभाजित हुआ, रोजगार छिन गया, फर्टिलाइजर बंद हो गया, मेडिकल कॉलेज को हर साल बंद करने की धमकी मिलती रही। यह सब मुद्दे आदित्यनाथ के लिए गौड़ रहे।”

गोरखपुर में भाजपा की हार ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा का छात्र राजनीति से भय नाहक नहीं है। चाहे जेएनयू हो, चाहे हैदराबाद हो, चाहे इलाहाबाद। भाजपा के एजेंडे पर लगातार छात्र राजनीति रहती है। दिलचस्प है कि भाजपा को वहां कोई दिक्कत नहीं हो रही है, जहां कांग्रेस के छात्र संगठन हैं। कम्युनिस्ट छात्र संगठन भाजपा को असहज करते हैं। और अगर कहीं सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले छात्र नेता उभरने लगते हैं तो वह भाजपा के लिए गले की हड्डी है।

और अब सामाजिक न्याय नाम की हड्डी भाजपा के गले में अटक चुकी है। दो उपचुनाव जीतने के बाद सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिसकी आबादी सबसे ज्यादा है, उसे संघी लोग कीड़ा मकोड़ा समझते हैं। सपा बसपा के लोगों को सांप छछूंदर बोला। यादव ने आज घोषणा की कि सामाजिक न्याय विकास में बाधक नहीं है, विकास एजेंडा में रहेगा, लेकिन यह सामाजिक न्याय के साथ होगा।

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