गोरखपुर मेडिकल कॉलेज : माफ़ कीजिए हत्याएं अभी और होंगी........

राज्य बेकाबू हो गया है और हम लगाम लगाने के लायक ख़ुद को साबित नहीं कर पा रहे. वाकई समाज सिर्फ शिकायती रह जाए तो बड़ी-बड़ी समस्याएं उसका पीछा नहीं छोड़ती....

अतिथि लेखक

 

गोरखपुर मेडिकल में हत्या की गई है. यह हत्या राजनैतिक हत्या है और यह हत्या भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से लेकर उसकी सांगठनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है

संजीव ‘मजदूर’ झा.   

हत्याओं पर शोक मनाने का अभ्यस्त समाज प्रायः ऐसी जमीन तैयार करता है जहाँ हम कब और कैसे मध्य्युगीनता बोध के आदि हो जाते हैं इसका पता तक नहीं चलता है. विकल्प की आवश्यकता और उसकी निर्मिति से अधिक हम उपलब्ध विकल्पों को ख़ारिज करने तक ही सीमित संवाद की सीमा में रह जाते हैं. ऐसी स्थिति में यह विश्लेषण करना जटिल हो जाता है कि ये सभी क्रियाएँ एक षड्यंत्र के तहत की जा रही हैं या अनजाने में. दोनों स्थिति भयानक हैं.

शोकाकुल समाज की अंतिम परिणति यह होती है कि वह सिर्फ़ हत्याओं की गिनती ही नहीं भूलता बल्कि साथ ही अंततः एक शोक-पर्व मनाता समाज भर रह जाता है.

ऐसी स्थितियां दो बातों की ओर इशारा करती हैं. पहला यह कि बदलाव या परिवर्तन हमसे मीलों दूर हो जाता है और दूसरा यह कि परिवर्तन या बदलाव तक पहुँचने के रास्ते से हम हट चुके होते हैं. भारतीय समाज इन दोनों रास्तों के बेहद नजदीक है. भगत सिंह इन्हीं संदर्भों में धमाके की बात करते हैं. लेकिन हिंसा और क्रांति के बीच बहस की उपेक्षा इन संदर्भों को ख़ारिज कर देता है. इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इन हत्याओं की सिर्फ़ हम आलोचना ही करते रह जाते हैं लेकिन कभी भी  ‘स्ट्रक्चरल चेंजेज’ पर बहस की जरुरत को हम महसूस तक नहीं कर पाते.

कुछ मार्क्सवादी-समाजवादी विद्वानों को छोड़ दिया जाए तो ऐसे बहसों का अभाव साहित्य से लेकर मीडिया तक बड़ी मात्रा में देखी जा सकती है. रही बात इन विद्वानों की तो इन्हें विदेशी और चीनी होने के दंश से शायद ही कभी एलीट राजनीति मुक्त होने देगी. यह समस्या रविश कुमार जैसे समाज-सुधारकों में भी बड़ी मात्रा में है इसलिए ये विद्वान अक्सर उनके यहाँ भी रिक्त ही मिलेंगे.

राजकिशोर सही कहते हैं कि हम शिकायती समाज के हिस्सा भर हैं.

वाकई समाज सिर्फ शिकायती रह जाए तो बड़ी-बड़ी समस्याएं उसका पीछा नहीं छोड़ती.

गोरखपुर मेडिकल में हत्या की गई है. यह हत्या राजनैतिक हत्या है और यह हत्या भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से लेकर उसकी सांगठनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है. 1947 से अब तक देखा जाए तो भारतीय राजनैतिक व्यवस्था की सबसे बड़ी दुर्बलता उसके सत्ता पक्ष की आतंरिक राजनीति के कारण है. जहाँ 5 वर्ष की सीमा की शुरुआत के साथ ही अगले 5 वर्ष की तैयारी में समय और ध्यान खर्च किया जाता है. इसलिए जब देश में हत्याएं हो रही होती है, प्राइवेट कंपनियों के मालिक मनमानी कर रहे होते हैं, भ्रष्टाचार बढ़ता है, किसान आत्म-हत्या कर रहे होते हैं तब देश के प्रधानमंत्री बिहार-यू.पी.-पंजाब-बंगाल चुनाव में व्यस्त रहते हैं.

किसी भी प्रधानमंत्री की यह व्यस्तता न हो सबसे पहले इस मसले को कैसे सुनिश्चित की जाए इस पर बहस होनी चाहिए. भले इसके लिए सभी राज्यों के और केंद्र के चुनावों के एक साथ करने से हल निकाला जाए या अन्य तरीकों से. इसके साथ ही कठोर नियमों का प्रयोग अथवा कानून राजनेताओं पर जिम्मेदारियों के आधार पर तय किए जाएँ. जिससे कोई राज्य मंत्री यह कहकर न बच निकले की गोधरा या अयोध्या में तो मैं था ही नहीं. यह जिम्मेदारी का मसला है जिसके आधार पर कानूनन कारवाई की व्यवस्था हो.

हद तो तब हो जाती है जब राज्य अधीन पुलिस किसानों पर गोलियां चलाती है और राज्य अनशन पर बैठ जाता है. इन दोनों परस्पर विरोधाभासी क्रियाएं तभी संभव है जब देश सैनिकों के हवाले हो. लेकिन इस मुद्दे पर हम बड़े गर्व से कहने लग जाते हैं कि ‘हम पकिस्तान नहीं हैं’ पर आप उससे अलग भी तो नहीं दिखते हैं? एक सरकारी अस्पताल में इतने लोगों की जान जाने के बाद भी वहां का मुख्यमंत्री कैसे बचेगा?

इस बचाव के नियमों को बदलने पर बहस की आवश्यकता है. मैंने ‘सिंहासन खाली करो’ लेख में पहले भी इस पर विस्तार से मांग की थी कि आंदोलन के स्वरुप पर, उसके विकल्प पर गहराई से बात की आवश्यकता है. लेकिन इस मांग को अक्सर यह कहकर ख़ारिज किया जाता रहा कि –‘हम हिंसा के पक्ष में नहीं हैं’. हिंसा के पक्ष में मैं भी नहीं हूँ लेकिन क्रांति की जरुरत और उसके औचित्य को नकार भी नहीं सकता हूँ.

संजीव ‘मजदूर’ झा
संजीव ‘मजदूर’ झा

बहरहाल रास्ते जो भी हों लेकिन अलग-अलग रास्तों से न तो मंजिल अलग होने की पुष्टि ही मिलती है और न ही टकराव का कोई अन्य मजबूत कारण ही. बावजूद इसके इस बात को स्वीकारने में क्या हर्ज है कि ‘अलग-दृष्टि-बोध’ के नाम पर हम जितने बंटे हुए हैं उस बंटे हुए दस्ते से तो राज्य काबू में नहीं आने वाला है. यही कारण भी है कि राज्य बेकाबू हो गया है और हम लगाम लगाने के लायक ख़ुद को साबित नहीं कर पा रहे.

लगाम लगाना मुश्किल जरुर लग रहा है लेकिन यह असंभव भी तो नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे अलग-अलग टुकड़ों में हो रहे भिन्न-भिन्न मतों के आंदोलन दस्तों का एक होना असंभव नहीं है. लेफ्ट किसी खास नीतिओं के तहत जब कोंग्रेस की सरकार बना सकती है तो किसी खास नीति के तहत सभी प्रतिरोधी दस्ते एक क्यों नहीं हो सकते? मैं नहीं समझता कि सिर्फ दृष्टियों के अलगाव का बहाना बनाकर समाजवादी-मार्क्सवादी-अम्बेडकरवादी जैसे वैचारिक संगठनें इस संदर्भ में विचार न करे. वे सारे तत्व किनारे किए जा सकते हैं जिससे आपसी ताल-मेल बने. यह विचारों का विलय होगा संगठनों का नहीं. फिलहाल इस विलय के अलावा कोई मार्ग भी तो नहीं है और यदि है तो उसपर भी गहराई से विचार की आवश्यकता है.

बढ़ती समस्याओं में शोक-गीत गाने से तो अच्छा ही है कि प्रयोग और तरीकों को बार-बार बदलकर देखा जाए. क्योंकि शोक गीतों को तो अंततः संगीत के किसी व्याकरण में ही दबकर रह जाना है.

हत्याओं की दिन-ब-दिन गहराती सूचियों के दौर में हम चाहे जो कुछ लिख-पढ़कर खुद को उनके विरोध में होने का प्रमाण देते रहें लेकिन यह तब तक सार्थक नहीं होगा जब तक कि हम कोई एक कदम बदलाव का नहीं उठाते. फिलहाल कविता-लेख-कहानी-शांति दूत बने आन्दोलन और सोशल मीडिया पर कहने-सुनने को बदलाव का एक कदम तब तक नहीं माना जा सकता जब तक कि यह मुकम्मल होकर एक ठोस निर्णय तक नहीं पहुँचता है. अन्यथा हमें शोक-गीतों के संग्रहों को अपने-अपने दराजों में रख लेना चाहिए क्योंकि हत्याएं तो अभी और होनी है.

   

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