मुलताई गोलीकांड : पुलिस अस्पताल में भी गोली चला रही थी

​​​​​​​मुलताई गोलीकांड की तरह मंदसौर में गोलीकांड दोहरा कर भाजपा सरकार ने बता दिया है कि वह दमन करने में पीछे नहीं रहेगी...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

आज किसानों की हालत बद से बदतर है। प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आय दुगुना करने तथा मुख्यमंत्री द्वारा 14 वर्षों से खेती को लाभ का पेशा बनाने के तमाम दावों के बावजुद किसानों की वास्तविक आय आधी रह गयी है। पिछले 3 वर्षों से सोयाबीन की 80 प्रतिषत से अधिक फसल नष्ट हुई है। 5 हजार रुपये की लागत लगाने के बाद मुष्किल से बीज ही वापस हो पाया है।

मुलताई गोलीकांड के 20 वर्ष

- डा. सुनीलम

आज से 20 साल पहले 12 जनवरी, 1998 के दिन बैतूल जिले के मुलताई तहसील के ग्राम सोनेगांव से साढे ग्यारह बजे हम निकले थे। मुलताई नागपुर नाका आते-आते हजारों किसान जुड़ गये। मुलताई गुड़ बाजार के आसपास अफरा-तफरी का माहौल था। पता चला कि काषीराम जी की सभा जल्दी खत्म हो गयी। वे हैलीकॉप्टर से वापस चले गये। थाने के सामने गोदी में छोटा सा बच्चा लेकर बाडेगांव की एक महिला मिली, जिसके सिर से खून बह रहा था। उसने बताया कि तहसील पर पुलिस वाले पत्थर और गोली चला रहे हैं।

मैं सीधा थाने में गया। थाना प्रभारी ने कहा कि आज हम तुम्हारी नेतागीरी खत्म कर देंगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आया; क्योंकि किसान संघर्ष समिति ने 25 दिसंबर 1997 के गठन के बाद सोयाबीन और गेहूं की फसल लगातार 4 वर्षों तक खराब होने के कारण सरकार से फसली बीमा का लाभ देने, 5 हजार रुपये हेक्टेयर का सोयाबीन का मुआवजा देने, कर्जा माफी, बिजली बिल माफी और जानवरों को चारा उपलब्ध कराने की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था। 9 जनवरी को ऐतिहासिक 75 हजार किसानों की 50 किलोमीटर दूर बैतूल तक रैली निकाली थी, तथा 11 जनवरी को सफल बंद किया था।

सब कुछ पुलिस, प्रशासन की जानकारी में हो रहा था। अधिकारियों की सहमति से ही यह तय हुआ था कि काशाराम जी की सभा के बाद 12 बजे किसान संघर्ष समिति का तहसील की तालाबंदी का कार्यक्रम होगा। लेकिन जब हम मुलताई तहसील कार्यालय के एकदम सामने बस स्टैंड पहुंचे, तब हमने पुलिस गोलीचालन होते हुए देखा। मैं जीप के बोनट पर खड़ा हुआ, लाउडस्पीकर से बार-बार चिल्ला रहा था कि गोलीचालन बंद करो, तभी अचानक मेरे आसपास खड़े दो साथी गिर पड़े। मेरी नजर तहसील कार्यालय की खिड़की पर पड़ी, जहां मैंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जी पी सिंह को गोली चलाते देखा।

मैं समझ गया कि मुझे जान से मारने का इरादा है तथा गलती से बगल के दो साथियों को गोली लग गयी है। मैं बोनट से कूद गया और साथियों की मदद से गोलीचालन में घायल साथियों को जीप में बिठाया।

गाड़ी का स्टेयरिंग सदाशिव गडेकर ने संभाला, जो आज मुलताई जनपद के उपाध्यक्ष हैं। हम 50 मीटर की दूरी पर स्थित शासकीय चिकित्सालय में गये। अस्पताल के सभी कमरे खचाखच भरे हुए थे। सभी कमरों में किसान थे। मुझे अस्पताल की नर्सों ने महिलाओं के प्रसूति वार्ड में अंदर भेज दिया, वहां संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष टंटी चौधरी जी और 10-12 साथी मौजूद थे। बाहर गोलियां चलने की आवाज आ रही थी। पुलिस अस्पताल में भी गोली चला रही थी। शहर में कफर्यू लगा दिया गया। मैंने सभी साथियों को कमरे से निकाल कर गांव भिजवा दिया। चिकित्सा अधिकारी डा. पी के तिवारी ने जिलाधीश रजनीश वैश्य को सूचना दे दी।

ज्यों ही रात का अंधेरा हुआ, स्वयं पुलिस अधीक्षक और जिलाधीश आकर मुझे मुलताई थाने की हवालात में ले गये। कपड़े उतार कर लात-जूता-बेल्ट और लाठियों से पीटना शुरू किया।

यह अमानवीय यातनाओं का दौर 36 घंटे चला। मैं लहूलुहान था। जो भी पुलिस वाला आता, बेहोशी की हालत में मुझे पीटता था। अगले दिन रात को मुझे पारेगांव रोड पर ले जाया गया। बंदूक के साथ झाड़ियों में बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया। फोटो खींचे गये। तभी आपस में पुलिस अधिकारी झगड़ने लगे, जिसे गोली चलानी थी उसने कहा कि इसने 24 किसानों को मरवा दिया है। यह हमें भी मरवा देगा। हमारे भी बाल-बच्चे हैं। आईजी साहब खुद आकर गोली चलायें, मारें।

मुझे वापस ले जाया गया। खाली कागजों पर अंगूठे लगवाये गये। अगले दिन सुबह मुझे हथकड़ी और बेड़ी लगाकर मजिस्ट्रेट के घर ले जाकर पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने हथकड़ी बेड़ी खोलने को कहा। इंस्पेक्टर ने इन्कार कर दिया। उसने कहा कि यह खूंखार आतंकवादी है।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि मैं जानता हूं कि आतंकवादी कौन है ? पूरा गोलीचालन मैंने अपनी आंखों से देखा है। अगर हथकड़ी-बेड़ी नहीं खोलोगे तो मैं तुम्हारी गिरफ्तारी का आदेश निकाल दूंगा।

फिर उन्होंने आवाज देकर अपनी बेटी को बुला कर कहा कि देखो कभी-कभी देवता इस रूप में भी आते हैं। हल्दी का दूध पिलवाया। डिटॉल से खून साफ करवाया और कहा कि मुझे मालूम है कि पुलिस एन्काउन्टर करना चाहती है। मैं सीधे भोपाल जेल पुलिस वैन में ताला लगवाकर भेज रहा हूं। जेल से 4 महीने बाद जमानत हुई।

जबलपुर उच्च न्यायालय में सरकार ने जमानत देने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यदि डा. सुनीलम मुलताई जाएगा, तो लोग उसे जिंदा जला कर मार डालेंगे; क्योंकि उसने किसानों की हत्या करवायी है। लेकिन जेल से मैं सीधा मुलताई गया। पुलिस दमन झेला। हर 12 तारीख को किसान महापंचायत का सिलसिला जारी रखा। देश भर के किसान संगठनों के बड़े नेता शरद जोशी, नंजुल स्वामी महेंद्र सिंह टिकैत, विजय जांवंधिया, जनसंगठनों के नेता मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, सुनील भाई, राजनैतिक पार्टियों के नेता सुरेन्द्र मोहनजी, मधु दंडवतेजी, शरद यादव, वी पी सिंह, देवेगौडा, जयपाल रेड्डी भी मुलताई पहुंचे। पीयूसीएल के साथ तमाम मानव अधिकार संगठनों ने जनसुनवाई कीं डा. बी डी शर्माजी और सुरेन्द्र मोहनजी ने लगातार किसान संघर्ष समिति के साथ मुलताई आकर संगठन का मार्गदर्षन किया।

चिखलीकला की महापंचायत में डा. बी डी शर्माजी, मेधा पाटकरजी तथा मेरे बार-बार मना करने के बावजूद किसान महापंचायत ने मुझे चुनाव लड़ाने का फैसला किया। चुनाव हुआ। कुल वोट के 50 प्रतिषत वोट देकर मुझे किसानों ने विधायक बनाया। 5 साल बाद भी 60 प्रतिशत वोट देकर फिर एक बार विधायक चुना। इस बीच मेरे सहित 250 किसानों पर 67 मुकदमे चलते रहे। हालांकि मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा मुकदमे वापस लेने, शहीद स्तंभ बनवाने, शहीद किसानों के परिवारों को स्थाई नौकरी दिलवाने की घोषणा सदन के भीतर और बाहर लगातार होती रही, लेकिन मुकदमे चलते रहे। साजिशपूर्वक पहले बैतूल लोकसभा क्षेत्र को आरक्षित कर दिया गया। बाद में मुलताई क्षेत्र का परिसीमन कर, करोड़ों रुपये खर्च कर जातिगत समीकरण बनाकर मुझे हराया गया।

चुनाव हारते ही सभी केस तेजी से चलने लगे। हर हफ्ते हमें पेशी पर जाना पड़ता था, मुझ पर एवं सभी किसानों पर दर्ज किये गये सभी 135 प्रकरणों में एड. आराधाना भार्गव ने शुक्ल पैरवी की। 3 प्रकरणों में षडयंत्रपूर्वक मुझे और तीन साथियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। मुझे कुल 54 वर्ष की सजा हुई। 4 महीने जेल काटने के बाद मैं जमानत पर रिहा हुआ।

गत 19 वर्षों से किसान संघर्ष समिति के स्थापना दिवस 25 दिसंबर से 12 जनवरी तक हम लगभग 100-150 गांवों का दौरा करते हैं। इस वर्ष भी 100 गांवों का दौरा करने के बाद यह लेख लिख रहा हूं। आज किसानों की हालत बद से बदतर है। प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की आय दुगुना करने तथा मुख्यमंत्री द्वारा 14 वर्षों से खेती को लाभ का पेशा बनाने के तमाम दावों के बावजुद किसानों की वास्तविक आय आधी रह गयी है। पिछले 3 वर्षों से सोयाबीन की 80 प्रतिषत से अधिक फसल नष्ट हुई है। 5 हजार रुपये की लागत लगाने के बाद मुष्किल से बीज ही वापस हो पाया है। 2001 में इसी प्रदेश में सोयाबीन 4500 से 5000 रुपये क्विंटल बिका था। इस वर्ष सरकार ने 3050 रुपये का समर्थन मूल्य घोषित किया है लेकिन किसानों को 1500 रुपये से 2500 रुपये तक के रेट में व्यापारियों को सोयाबीन बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 100 गांवों में किसानों से पूछने के बाद यह दावा किया जा सकता है कि किसी भी किसान को गत तीन वर्षों में फसल बीमा का मुआवजा नहीं मिला है। क्षेत्र में मक्का की फसल बहुत अच्छी हुई है। 1 हेक्टेयर में 60 क्विंटल तक मक्का पकी है। लेकिन 1425 रुपये समर्थन मूल्य होने के बावजूद व्यापारी 600 से 800 रुपये प्रति क्विंटल पर मक्का खरीद रहे हैं। सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करने की बजाय किसानों के साथ छलावा करते हुए भावांतर योजना लागू की है। लेकिन हवा यह बनायी है कि जो किसान अच्छा उत्पादन दिखाएंगे, उन्हें फसल बीमा नहीं मिलेगा। जबकि फसलें अलग-अलग हैं। पंजीयन के समय 1 हेक्टेयर पर औसत 19 क्विंटल 54 किलो मक्का मंडी में खरीदी जा रही है। अर्थात 40 क्विंटल मक्का भावांतर योजना के तहत ही व्यापारियों को 600 से 800 रुपये क्विंटल बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

क्षेत्र में पानी का नितांत अभाव है। मेरी विधायकी के कार्यकाल में बिजली विभाग एक महीने के 1 हार्स पावर का भी अस्थाई कनेक्शन देता था लेकिन अब बिजली कंपनी तीन माह से कम का कनेक्शन किसानों को देने को तैयार नहीं हैं जबकि कुओं में 15 दिन का भी पानी नहीं है। क्षेत्र में मैंने अपने कार्यकाल में 72 जलाशय बनवाये लेकिन उनमें पानी नहीं है फिर भी किसानों से स्थाई कनेक्षन के पैसे वसूल किये जा रहे हैं

ऐसी विकट स्थिति में मुलताई क्षेत्र के किसानों को केवल दूध का ही सहारा है। हर किसान परिवार एक दो गाय-भैंस पाले हुए है। लेकिन दूध, जो पिछली गर्मियों में 45 रुपये लीटर तक बिकता था वह आज 15 रुपये लीटर बिक रहा है, यानी पानी के रेट पर दूध खरीदा जा रहा है।

भोपाल दुग्ध संघ की दूध समितियां हर गांव में बनी हुई हैं लेकिन कई बार इनके द्वारा दूध की खरीद बीच बीच में बंद कर दी जा रही है। क्षेत्र में चारे का भी नितांत अभाव है। किसान अपने पशुओं को गौशालाओं में छोड़ना चाहते हैं लेकिन संचालक पहले चारे की व्यवस्था का इंतजाम किसान से करने को कहते हैं। मुलताई के क्षेत्र में किसान सब्जी पैदा करते हैं तथा नागपुर में बेचते हैं लेकिन 2 माह से पैसेंजर भी बंद कर दी गयी है। बस से नागपुर जाकर सब्जी बेचना घाटे का सौदा है। इस कारण किसानों की आर्थिक हालत चरमरा गयी है। इसका असर खेतिहर मजदूरों पर पड़ा है। उन्हें महीने में 5 से 10 दिन भी काम 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से नहीं मिल पा रहा है। बाजार सूने पड़े हैं। छोटे व्यापारियों को भी जीविकोपार्जन में दिक्कत आ रही है। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले ग्रामीणों को पहले प्रति कार्ड महीने का 5 लीटर 14 रुपये की दर से कैरोसिन का तेल मिलता था अब वह घटकर 2 लीटर रह गया है, दाम बढ़ाकर 25 रुपये लीटर कर दिया गया है।

शक्कर मिलनी बंद हो गयी है। जो शक्कर 15 रुपये प्रति राशन की दुकान से मिल जाती थी वह अब बाजार से 40 रुपये प्रति किलो खरीदनी पड़ रही है।

जन वितरण प्रणाली का हाल यह है कि मुलताई से नजदीक बलनी गांव में 100 गरीबों के कार्ड बने हुए हैं लेकिन उन्हें राशन के कूपन नहीं दिए गये हैं। अंगूठों के निशान और आधार कार्ड से राषन दिये जाने के चलते बहुत सारे ग्रामीण वंचित हो गये हैं। सोसाइटियों द्वारा खाद भी आधारकार्ड से दी जा रही है। ग्रामीणों के घर के बिजली के बिल 8000 से 26000 रुपये तक आ रहे हैं। ज्यादातर गांवों की दलित बस्ती बिजली काटे जाने के कारण गांव में केबल लगा दिये जाने के बाद अंधेरे में डूबे हुए हैं। उनके स्कूल और कालेज में जाने वाले बच्चों को दीये से आज भी पढ़ाई करनी पड़ रही है। पीने के पानी का संकट अभी से गांव-गांव में शुरू हो गया है। लगभग 90 प्रतिशत गांवों की स्ट्रीट लाइट ग्राम पंचायत द्वारा बिजली का बिल न भरे जाने के कारण काट दी गयी है।

इस विकराल परिस्थिति के बावजूद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से सभी अखबारों में नये साल में पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन कराये जा रहे हैं जिनमें दावा किया जा रहा है कि मध्य प्रदेश की कृषि विकास दर विश्व में सर्वाधिक 20 प्रतिशत है। सभी किसानों को फसल बीमा और भावांतर योजना का लाभ दे दिया गया है। गांव-गांव में बिजली पहुंचा दी गयी है। किसानों का विकास ऊँचाईयां छू रहा है।

किसानों की इस दुर्दशा पर राजनैतिक दल, मीडिया और न्यायपालिका मौन है। फिर से मुलताई की तरह प्रदेशव्यापी किसान आंदोलन की जरूरत है। हालांकि कांग्रेस के मुलताई गोलीकांड की तरह मंदसौर में गोलीकांड दोहरा कर भाजपा सरकार ने बता दिया है कि वह दमन करने में पीछे नहीं रहेगी।

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