जिसे हम पढ़ा लिखा कहते हैं क्या वे सच में पढ़े लिखे माने भी जाएँगे?

फिरकी, राँग नम्बर और अगस्त्यमुनि जैसे हालात आम?...

अतिथि लेखक

फिरकी, राँग नम्बर और अगस्त्यमुनि जैसे हालात आम?  

मोहम्मद ज़फ़र

पहाड़ों पर माहौल बहुत अच्छा है। कम से कम नीचे मैदानी इलाकों की तुलना में अपराध, तोड़ फोड़ हिंसा यहाँ आसानी से नहीं हो सकती। सामान्य तौर पर भी लोग एक दूसरे के सहयोग से मिल जुल कर रहते हैं और गाँव गाँव में सज्जनता से अजनबियों के लिए भी यहाँ मुस्कराहट के साथ आदर सत्कार भरा पड़ा है। वैसे तो इंसान जहाँ रहेंगे वहां हर तरह के लोग होंगे मगर मेरे अपने अनुभवों की बात करूं तो मुझे पहाड़ों पे चोरी चकारी या मार-झड़प सी घटनाएँ बहुत ही कम दिखीं। शायद बहुत मेहनत से यहाँ के पूर्वजों ने यह माहौल बनाया है। मगर अभी हाल ही में एक पहाड़ी क्षेत्र में हुई घटना ने सोचने को विवश और परेशान भी किया। बात है उत्तराखंड के अगस्त्यमुनि क्षेत्र की घटना की जहाँ भीड़ ने तोड़ फोड़, आगज़नी और हिंसा को ना सिर्फ भड़काया बल्कि “हम और वे” की राजनीति के तहत युवाओं ने तोड़फोड़ भी की। अखबार और खबरें खंगालने पर पता चला कि सोशल मीडिया की जिस घटना पर बवाल हुआ वह असल में कुछ नहीं महज़ अफवाह थी। यानि 2014 में आई राजकुमार हिरानी की फिल्म “पीके” की भाषा में कहें तो किसी ने फिरकी ली यानि अफवाह उड़ाई और हमारे दिमाग में पहले से बैठे राँग नम्बर यानि किसी समुदाय के खिलाफ भरे पूर्वाग्रह ने हमें अवैज्ञानिक तरह से बिना कुछ जांच पड़ताल किए, बिना खबर को जाँचे उठ खड़े होने को मजबूर कर दिया। पढ़े लिखे लड़के-लड़कियाँ भी तोड़ फोड़ पे उतारू हो गए बिना सच समझे। ऐसा होता रहेगा जब तक पढ़ाई के नाम पर कागज़ का महत्व हावी रहेगा। आप डिग्रियां तो ले लेंगे मगर सोच में से ना अवैज्ञानिकता हटेगी और ना पूर्वाग्रह। ऐसे लोग व युवा आपको हर शहर में मिल जाएँगे जो पढ़े लिखे जाहिल होने का उदाहरण पेश करेंगे। पर ताज्जुब है कि ये युवा सरकार से पहाड़ों की बदहाल सड़क और गाड़ी व्यवस्था को ठीक करने के लिए सड़क पे आधे आक्रोश से भी नहीं आएँगे, इतनी तादात में युवा पहाड़ों की बदहाल सरकारी स्कूली व्यवस्था को ठीक कराने के मुद्दे से सड़क पर नहीं आएगा ना रोज़गार के स्रोत बढ़ाने के मुद्दे पर गुस्सा फूटता है और ना ही सुदूर गावों में बिजली पहुंचाने के मुद्दे से लोग जुड़ेंगे। पर हाँ किसी धर्म, जाति या समुदाय के खिलाफ लोगों को अफवाहों में भी सड़क पे उतारा जा सकता है। ऐसा आज कई उदाहरणों में हम देख सकते हैं। और इस कड़ी में इस घटना के बाद अब पहाड़ों का नाम भी जुड़ गया।  

देश के संविधान में शायद इसीलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले नागरिक बनाने और जाँच पड़ताल विकसित करने की बात संविधान निर्माताओं ने लिखी क्योंकि वे जानते थे कि देश में धर्म सम्प्रदाय के नाम भड़काना बहुत आसान है। पर ये सब संवैधानिक मूल्य विकसित करना इतना आसान नहीं है जब हमारे स्कूल कॉलेज लोगों को तथ्यों को रटाने में लगे हों और युवाओं के पढ़ने का एकमात्र लक्ष्य नौकरी हासिल करने तक सीमित हो। इसमें भी उन्हें हर कदम की लूट से आगे बढ़ना हो जैसे स्कूलों की फीस, तथ्य और इम्तिहानों के पैटर्न रटाने वाले कोचिंग संस्थानों की फीस और फिर चुने जाने के बाद भी दौड़ धूप। इन सब चिंताओं और तनाव का फायदा धर्म की राजनीति करने वाले राजनैतिक दल आराम से करते हैं और हमारे युवा “हम बनाम वे” की राजनीति में अपना बचा खुचा विवेक भी अवैज्ञानिकता के नाम कर देते हैं। ऐसा होना बहुत आसान है जब ऐसी राजनीति करने पर आपको संसद या विधान सभा पहुँचने में मदद मिले तो फिर इसमें कोई बड़ी बात नहीं कि छात्र राजनीति भी स्टूडेंट्स के ज़रूरी मुद्दे ना उठाकर इन मुद्दों के बहाने अपनी साख बनाए। और जब धीरे धीरे एक समुदाय के खिलाफ नफरत रोज़ भरी जाए तो फिर ऐसा नतीजा निकालना उन राजनैतिक या धार्मिक गुंडों के लिए आसान सा काम है।

अब सवाल ये आता है कि जिसे हम पढ़ा लिखा कहते हैं क्या वे सच में पढ़े लिखे माने जाएँगे? थोड़ी भी वैज्ञानिकता और विवेक बचा होगा तो आइना देखते हुए लोगों को शर्म आएगी कि हम अफवाहों पर तोड़ फोड़ कर आए। हमने सच को जानने समझने की कोशिश भी नहीं की। कहाँ गया हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण? मान लेते हैं कि अगर किसी ने अपराध किया भी तो क्या बाकी लोगों की सम्पत्ति पर तोड़ फोड़ का हक़ एक लोकतंत्र में बनता है क्या? क्या एक का बदला पूरे समुदाय से लेना हमारे पढ़े लिखे समाज का नया तर्क है। इन बातों को समझने के लिए हमें यह भी जानना होगा कि धर्म और संस्कृति के नाम पर खुले बहुत से स्कूल व संस्थाएँ युवाओं में “हम बनाम वे” की राजनीति विकसित करने में लगे हुए हैं और धीरे धीरे ये ज़हर इतना घुल जाता है कि हम ठीक हैं और वे बुरे, की अवधारणा आम हो जाती है और हम हर काम में दूसरे समुदाय का दोष निकालने लगते हैं। फिर चाहे वह अफवाह ही क्यों न हो। और यह “हम बनाम वे” किसी भी रूप में हो सकता है यह हिन्दू व मुसलमान में हो सकता है, शिया, सुन्नी में हो सकता है, दलित, ब्राह्मण में हो सकता है, पहाड़ी और मैदानी में हो सकता है, मराठी और बिहारी में हो सकता है। दरअसल ऐसी सोच का कोई अंत नहीं होता यह ले जाता है तो सिर्फ बर्बादी की ओर क्योंकि यह आपके तर्क को कुतर्क में बदल देता है। शक को पूर्वाग्रह में बदल देता है और फिर कोई भी एक फिरकी लेगा और हमारे दिमाग में बैठा राँग नम्बर हमें अतार्किक काम की ओर ले जाएगा। लोगों को सोचना होगा कि उनके पूर्वजों ने जो सद्भाव इतने सालों से बनाया है उसे मूर्खों का मोहरा बनकर मखौल में ना बदलें। सोशल मीडिया पर आँख मूंद के यकीन तो ना ही करें। विवेक का इस्तेमाल करें और खुद के इंसान होने को समझें।  

मोहम्मद ज़फ़र

स्वतंत्र टिप्पणीकार

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