#StandWithAMU : ये मेरा चमन, जिसे उजड़ने से बचाने को वे कलम कागज़ लेकर बन्दूक़ का सामना बखूबी कर रहे हैं

तू इंक़लाब की आमद का इंतज़ार न कर जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर ...

असरार-उल-हक़ मजाज़ के नाम दीपक विद्रोही की पाती

जनाब असरार-उल-हक़ मजाज़ साहब

आपको ये ख़त आपके जाने के कई बरसों बाद लिख रहा हूँ और जानता हूँ कि आप तक नहीं पहुँच सकता, लेकिन इसके बाद भी आप तक पहुँच ही जाएगा।

मामला कुछ ऐसा है कि आप की कुलियात रखी हुई है, जिसे अब तक खोलने की ज़हमत नहीं की। हालांकि जब खरीदी थी तो कुछ पढ़ी थी । इस के अलावा आज ही पता चला कि आप की नज़्म 'ये मेरा चमन' आप ने अलीगढ़ के लिये लिखी थी। अगर साफ अल्फ़ाज़ में कहा जाए तो ये नज़्म मेरी आंखों के सामने से गुज़री थी लेकिन मैं नहीं जानता था कि ये खूबसूरती आप की कलम से झड़ी है। आप की अगली नस्लों ने पिछले कुछ दिनों में अहसास करवाया कि आप के चमन को उजड़ने से बचाने की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर है और वे कलम कागज़ लेकर बन्दूक़ का सामना बखूबी कर रहे हैं। अभी इसी अलीगढ़ की बात कर रहा हूँ जहां मैं कभी गया नहीं लेकिन ये अलीगढ़ रोज़ अखबारों के ज़रिये मेरे पास आ रहा है।

साइंस के लिये प्रेक्टिकल होना ज़रूरी है और उसी के बाद वो साइंस होता है लेकिन ये अलीगढ़ के साथी अब लिटरेचर का प्रेक्टिकल कर उसे साइंस साबित कर रहे है।

यहां हर शे र साइंस की तर्ज पर है। अलीगढ़ से कई लड़कियों के फोटो आ रहे है, जिन में मैं चहरे की खूबसूरती तलाशने की कोशिश कर ही रहा था कि सभी एक साथ खूबसूरत नज़र आने लगी। क्योंकि आँचल से परचम का प्रेक्टिकल मेरी आंखों के सामने था।

'तिरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन

तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था।'

अब जब लड़कियों की खूबसूरती परचम में ही नज़र आ रही है तो अलीगढ़ के नौजवान भी खूबसूरत लग रहे है। और ना ही मैंने इनका चहरा देखा और न ही इन्हें जानता हूँ। तो खूबसूरत इस लिये नज़र आ रहे है क्यों कि दूसरा प्रेक्टिकल

' तू इंक़लाब की आमद का इंतज़ार न कर

जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर'

तो ये भी इंतज़ार नहीं कर रहे हैं।

इस तरह अलीगढ़ रोज़ नये चहरे दिखा रहा है।

ख़त में अपनी बात ख़त्म करने के साथ ही एक सवाल करने वाला था कि 'शराब का शौक रखते हो तो आते आते दो व्हिस्की की बोतल लेते आऊं?' अभी आप से मेरी दोस्ती मंटो या फ़ैज़ या ग़ालिब जैसी नहीं है इस लिये जानता नहीं हूँ कि आप पीने वाले है या नहीं। खैर कुलियात मजाज़ के उड़ते हुए पन्नों से इस्मत चुग़ताई, जनाब जांनिसा अख्तर और प्रकाश पंडित के आर्टिकल भी हैं। उड़ते हुए पन्नों को रोका तो जनाब प्रकाश पंडित के पन्ने पर लिखे एक जुमले 'मजाज़ सही तरक़्क़ी पसन्द है' 'मजाज़ शराबी है।' पर नज़र रुक गई। तो बात यहीं खत्म हो गई क्योंकि मैं हर पल कोशिश करता हूँ तरक़्क़ी पसंद होने की और शराबी मैं भी हूँ। आते-आते दो बोतल ला रहा हूँ। ख़त का जवाब लिखो तो खुशी होगी। बाक़ी मुलाक़ात जल्द ही होगी। एक बार आप के अलीगढ़ घूमने जाने वाला हूँ।

आपका

दीपक विद्रोही

पता - अभी नहीं है

#Aligarh #StandWithAMU

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